ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाधकमें अमानित्व गुण । जानना है ऐसा सु-लक्षण ।
कहूंगा अदंभका लक्षण । तुझसे अब ॥ १ ॥
२ अदंभका विवेचन—
अदंभत्व यह ऐसा । लोभीका धन हो जैसा ।
न कहता ठाव जैसा । प्राणांतमें भी ॥ २ ॥
उस पर मानो सुभट । आया यदि प्राण-संकट ।
किंतु न करता प्रकट । सत्कर्म अपना ॥ ३ ॥
सहज आयी दुग्धाद्रता । सोखती गायकी दुष्टता ।
या छिपाती वेश्या प्रौढता । वैसे ही धनंजय ॥ ४ ॥
या श्रीमंत श्री-मानता । अरण्यमें है छिपाता ।
या तनकी सुंदरता । कुलांगना ॥ ५ ॥
बोया हुवा बीज छिपाता । उसपे है माटी डालता ।
ऐसे ही सत्कर्म छिपाता । पुण्यके वह ॥ ६ ॥
देहकी पूजा नहीं करता । लोक-रंजन नहीं करता ।
स्वधर्मको न बांध सकता । वाग्ध्वजमें कभी ॥ ७ ॥
परोपकार नहीं कहता । न करें साधनाकी वाच्यता ।
पाया हुवा पुण्य न बेचता । वैभवार्थ कभी ॥ ८ ॥
देख उसके अंग-भोग । लगता कृपण अभाग ।
धर्म-कर्ममें महा-भाग । न कम या अधिक ॥ ९ ॥
घरमें सदा तंग । रहता कृष अंग ।
दानमें आगे पग । सुर-तरु-सा ॥ २१० ॥
या स्वधर्ममें महान । स-समय देता दान ।
आत्म-चर्चामें निपुण । वैसे मूढ ॥ ११ ॥
कदलीका अंग छिलकेडार । लगे हलका थोथा धनुर्धर ।
होता है रसाल पकनेपर । वैसा ही जान ॥ १२ ॥
४४७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग