ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 515, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंजल-धरोंके मंडल । कहलाते हैं बादल ।
अनेक लोक सकल । कहलाता जगत ॥ ५३ ॥
या तेल बात अगिन । आते जब एक स्थान ।
दीप कहते हैं जान । धनंजय ॥ ५४ ॥
ये जो छत्तीस ही तत्व । मिलते हैं हो एकत्र ।
वह समूह-परत्व । कहलाता क्षेत्र ॥ ५५ ॥
बोआईके व्यवहारसे । पाप-पुण्य पक जानेसे ।
हमने कहा कौतुकसे । क्षेत्र है यह ॥ ५६ ॥
अनेकोंका है मत । देह है यह पार्थ ।
इसके हैं अनंत । यहां नाम ॥ ५७ ॥
इस ओर परतत्वके । औ' उस ओर स्थावरके ।
होता जाता है जो उसके । नाम क्षेत्र है ॥ ५८ ॥
किंतु सुर-नर-उरग । आदि होते योनि-विभाग ।
सब गुण-कर्मके संग । भिन्न हैं पार्थ ॥ ५९ ॥
यह गुण-विवेचन । आगे आता है अर्जुन ।
प्रस्तुत है यहां ज्ञान- । रूप दिखाऊं ॥ १६० ॥
ज्ञानकी महानता, ध्यानकी विविधता—
तुझे क्षेत्र सविस्तर । मैंने कहा स-विकार ।
सुन अब तू उदार । ज्ञानका रूप ॥ ६१ ॥
जिस ज्ञानार्थ योगी-जन । स्वर्गका कर उल्लंघन ।
निगलते सदा गगन । धनंजय ॥ ६२ ॥
सिधिकी आस न करते । ऋद्धिका ध्यान न धरते ।
योगके कष्ट हैं सहते । तुच्छ मानके ॥ ६३ ॥
तप-दुर्गोंको पार करते । यज्ञादि अनुष्ठान करते ।
तथा उलटाकर छोड़ते । कर्म-वल्ली ॥ ६४ ॥
४४३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग