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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 513

पानेसे जिसे अर्जुन । शिथिल होता है प्राण ।
दूना होता है सत्व-गुण । पहलेसे भी ॥ २९ ॥
इन्द्रिय-वृत्तियोंको संपूर्ण । हृदयमें ला एकांत स्थान ।
करता है शांत निद्राधीन । पुचकारकर ॥ १३० ॥
कहूं क्या इससे अधिक । जीव होता आत्मासे एक ।
उस स्थितिका नाम सुख । पांडुकुमार ॥ ३१ ॥
तथा ऐसी अवस्था । न पाके जीना पार्थ ।
तुम जानो सर्वथा । नाम दुःखका ॥ ३२ ॥
मनोरथ जो संगसे नहीं । वैसे वह स्वयं-सिद्ध है ही ।
इन दोनोंके कारणसे ही । सुख है औ' दुःख ॥ ३३ ॥
चेतनाका विवेचन—
अब है असंग औ' साक्षी-भूत । जिसकी सत्ता देहमें सतत ।
नाम उसका यहां पांडुसुत । चेतना है ॥ ३४ ॥
नखसे जो शिख पर्यंत । तन पे सर्वत्र जागृत ।
नहीं होता परिवर्तित । अवस्थात्रयमें ॥ ३५ ॥
मन-बुद्धि आदि प्रफुल्लित । औ' प्रवृत्ति-वनमें वसंत ।
खिला रहता जिससे पार्थ । सदैव ही ॥ ३६ ॥
जडाजड़से समान । करता है जो वर्तन ।
कहता हूं मैं चेतन । यह नहीं मिथ्या ॥ ३७ ॥
राजा परिवार नहीं जानता । आज्ञासे पर-चक्र दूर होता ।
पूर्ण-चंद्र देख उमड़ आता । महा-सागर ॥ ३८ ॥
या चुंबकका सन्निधान । करता लोहेको चेतन ।
सूर्य-संगसे होते जन । कार्य-प्रवृत्त ॥ ३९ ॥
मुख लगाये बिन । पिल्लोंका है पोषण ।
करती है अर्जुन । कूर्मी जैसे ॥ १४० ॥
(56) ४४१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग