ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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कर्म जो होता है तुझे प्राप्त । न मान तू अल्प या बहुत ।
चुपचाप कर तू अर्पित । मुझको सदा ॥ २३ ॥
ऐसी ही मद्भावना । तन त्यागमें अर्जुना ।
तू सायुज्य सदन । पायेगा मेरा ॥ २४ ॥
कर्म-रत रहकर कर्म फल समर्पण—
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥ ११ ॥
न तो यह भी तुझे । न दे सके कर्म मुझे ।
तब तू सतत मुझे । भजते जा ॥ २५ ॥
बुध्दिके पेट पीठमें । कर्मके आदि अंतमें ।
मुझको जोड़ देनेमें । यदि है दुस्तर ॥ २६ ॥
तो यह भी रहने दो । मदर्पणकी जाने दो ।
किंतु निग्रही होने दो । बुध्दि तेरी ॥ २७ ॥
और जैसे जिस काल । कर्म होते हैं सकल ।
उसके वे सब फल । तजते जा ॥ २८ ॥
जैसे वृक्ष अथवा वेल । गिरा देते हैं पक फल ।
वैसे त्यज दे फल सकल । कर्म सिद्धिके ॥ २९ ॥
मनमें मेरा करना स्मरण । अथवा मुझे करना अर्पण ।
यदि है तुझे यह अग्रहण । जाने दे शून्यमें ॥ ३० ॥
जैसे पत्थर पे पड़ी वर्षा व्यर्थ । तथा आगमें हुई बुवाई व्यर्थ ।
अथवा देखा हुआ स्वप्न है व्यर्थ । वैसा कर्म-फळ ॥ ३१ ॥
अजी ! जैसे आत्मजामें । जीव निष्काम मनमें ।
वैसे सकल कर्ममें । अकाम होना ॥ ३२ ॥
ऐसा कर्म न होता तो मुझमें योग साधके ।
यत्नसे छोड़ तू सारे कर्मके फल अर्जुन ॥ ११ ॥
(53) ४१७ भक्तियोग
जैसे उठती अग्नि-ज्वाल । आकाशमें व्यर्थ सकल ।
वैसे लय हो कर्म-फल । शून्यमें ही ॥ ३३ ॥
अर्जुन यह जो फल त्याग । दीखता है अति असंग ।
योगमें है यह महायोग । सर्वोत्कृष्ट ॥ ३४ ॥
फल-त्याग यह अविकार । जिससे न हो कर्म विस्तार ।
अंकुरता वेणु एक बार । उसी भांति ॥ ३५ ॥
इस शरीरसे ही शरीर । पाना है रुकता बार बार ।
पुनरागमनपे पत्थर । पड़ता मानो ॥ ३६ ॥
अभ्यासकी महत्ता—
फिर अभ्यासका सोपान । सौंपता है ज्ञानका स्थान ।
ज्ञानसे ध्यानका मिलन । सहज होगा ॥ ३७ ॥
ध्यानका तब आलिंगन । करते हैं भाव संपूर्ण ।
रहते तब दूर जान । कर्म-जात ॥ ३८ ॥
जहां कर्म ही दूर है । फल-त्याग सरल है ।
त्यागका जो सहज है । शांति-सुख ॥ ३९ ॥
शांतिके लिये है तब । अभ्यास करना अब ।
क्रमागत ही है सब । सुभद्रापति ॥ १४० ॥
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।
ध्यानात् कर्मफलत्यागः त्यागाच्छान्तिरनंतरम् ॥ १२ ॥
अभ्याससे भी गहन । अर्जुन फिर है ज्ञान ।
ज्ञानसे भी है जो ध्यान । महत्वका ॥ ४१ ॥
फिर है कर्म-फल-त्याग । जो है ध्यानसे भी सुभग ।
उससे श्रेष्ठ है जो भोग । शांति सुखका ॥ ४२ ॥
मिलता यज्ञसे ज्ञान होती तन्मयता फिर ।
तब पूर्ण फल-त्याग देता है शांति सत्वर ॥ १२ ॥
ज्ञानेश्वरी ४१८
अध्याय ९: राजविद्याराजगुह्ययोग
यह है ऐसा पथ । इस पथसे पार्थ ।
शांतिका ही मध्यस्थ । प्राप्त करता है ॥ ४३ ॥
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुणा एव च ।
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३ ॥
भक्तकी स्थिति-गुण-विकास—
अजी प्राणि मात्रमें कहीं । द्वेषका जो नाम भी नहीं ।
आप-पर-भाव भी नहीं । चैतन्यका-सा ॥ ४४ ॥
उत्तमका करना स्वीकार । अधमका करें अस्वीकार ।
नहीं जानती ऐसा प्रकार । जैसे धरणी ॥ ४५ ॥
राजाके तनको चलाना । रंक-शरीरको हनना ।
न सोचता कृपालु प्राण । वैसा ही वह ॥ ४६ ॥
करें गायका तृषा-निवारण । विष बन व्याघ्रको दे मरण ।
न जानता ऐसा एक भी क्षण । नदी-नीर ॥ ४७ ॥
वैसे हैं सभी भूत-मात्र । उसके समान जो मित्र ।
जैसे धात्रीको है सर्वत्र । सम-भाव ॥ ४८ ॥
मैं तूकी भाषा बोलना । सुख-दुःखको जानना ।
“मेरा” ऐसा भी कहना । नहीं है उसे ॥ ४९ ॥
क्षमामें वैसी ही क्षमता । धरित्री समान योग्यता ।
संतोष नित है बढ़ता । उसकी गोदमें ॥ १५० ॥
संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १४ ॥
किसीका न करे द्वेष दया मैत्री बना क्षमा ।
मैं मेरा सब भूला जो सहके सुख दुःखको ॥ १३ ॥
सदा संतुष्ट जो योगी संयमी दृढ निश्चयी ।
मन-बुद्धि मुझे देता भक्त है मुझको प्रिय ॥ १४ ॥
४१९ भक्तियोग
वर्षा-ऋतुके बिना सागर । पूर्ण रहता आत्म-निर्भर ।
वैसा ही वह निरुपचार । सदा-संतुष्ट ॥ ५१ ॥
देकर अपनी सौगंध । देता है हृदयको बोध ।
इससे निश्चयमें बाध । न आता कभी ॥ ५२ ॥
हृदय-भुवनमें जिसके । एक ही आसन पे बैठके ।
शासन करते विराजके । जीव-परमात्मा ॥ ५३ ॥
ऐसी योग समृद्धि । पाकर निरवधि ।
चढाके मन-बुद्धि । मुझपे ही ॥ ५४ ॥
बाहर भीतर योग । शुद्धतामें भी सुबग ।
फिर भी ममानुराग । जिसे सप्रेम ॥ ५५ ॥
अर्जुन ऐसे जो भक्त । वही योगी तथा मुक्त ।
वह वल्लभा मैं कांत । ऐसे जान ॥ ५६ ॥
उससे मुझे जो प्रेम है । जीवनसे भी अधिक है ।
यह बात भी अपूर्ण है । कहूं कैसे ॥ ५७ ॥
अजी ! भक्तोंकी जो कहानी । मुझपे मोहके मोहिनी ।
अकथनीय है कथनी । कहलाती श्रद्धा ॥ ५८ ॥
इसीलिए जी हम । कह गये उपमा ।
वैसे तो वह प्रेम । रहता मौन ॥ ५९ ॥
रहने दो यह किरीटी । प्रिय जनोंकी यह जो गोष्टि ।
प्रेमसे जो पुलक उठी । अति वेगसे ॥ १६० ॥
उसपर भी हे पार्था । सकल संवाद-कर्ता ।
उसको यहां यथार्थ । उपमा भला ॥ ६१ ॥
इसीलिए पांडुसुता । प्रिय तू औ' तू ही श्रोता ।
फिर प्रियकी ही वार्ता । प्रसंग आया है ॥ ६२ ॥
तभी मैं अब बोलता । बोलका सुख भोगता ।
कहके हरि डुलता । आनंद मगन ॥ ६३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४२०
फिर कहता यह सुन । उस भक्तके ये लक्षण ।
उसको मैं अंतःकरण । आसनार्थ देता हूं ॥ ६४ ॥
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५ ॥
भक्त भय-उद्वेग रहित—
जैसे सागरके भीतर । भीत न होता जलचर ।
या जलचरोंसे सागर । उकताता नहीं ॥ ६५ ॥
वैसे ही उन्मत्त जगत । न करता उसे दुखित ।
तथा न ऊबता जगत । उससे कभी ॥ ६६ ॥
अथवा मान तू पांडव । जैसे तनको अवयव ।
नहीं ऊबते वैसे जीव । औ' जीवोंसे वह ॥ ६७ ॥
विश्व ही जैसे देह हो गया । इसलिए प्रिया-प्रिय गया ।
हर्ष शोकादि द्वन्द्व भी गया । द्वैत मिटनेसे ॥ ६८ ॥
ऐसा द्वन्द्वसे जो मुक्त । भय उद्वेग रहित ।
फिर भी अनन्य भक्त । वह मेरा ॥ ६९ ॥
तभी है वह मेरा प्रिय । दिखाऊँ कैसा मेरा हिय ।
वह है मुझमें तन्मय । इससे जीता हूं ॥ १७० ॥
जो है निजानन्दमें तृप्त । मानो ब्रह्मको जन्म प्राप्त ।
पूर्णताका वह है आप्त । वल्लभ जैसा ॥ ७१ ॥
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६ ॥
ऊबता जो न लोगोंसे न ऊबे उससे जन ।
हर्ष-शोक भय क्रोध न जाने जो मुझे प्रिय ॥ १५ ॥
नहीं व्यथा उदासीन दक्ष निर्मल निस्पृह ।
तजे आरंभ जो सारे भक्त है मुझको प्रिय ॥ १६ ॥
४२१ भक्तियोग
संतका पावन चरित—
न है उसमें अपेक्षा । वैसी ही नहीं उपेक्षा ।
जीवन बिन आकांक्षा । केवल आत्मोत्कर्ष ॥ ७२ ॥
मोक्ष देनेमें उदार । काशी नामका आदर ।
किंतु उसमें शरीर । त्यजना होगा ॥ ७३ ॥
पाप हरता हिमवंत । भयभीत कर जीवित ।
संतका पावन चरित । वैसा नहीं ॥ ७४ ॥
पावन है गंगोदक । पाप तापका शामक ।
किंतु उसमें है एक । डूबनेका भय ॥ ७५ ॥
गहराई जिसकी अपार । किंतु डूबनेका है डर ।
रोकड़ मोक्षका है घर । जीवनमें ही ॥ ७६ ॥
संतोंके चरण स्पर्शसे । मुक्त है गंगा भी पापसे ।
ऐसे संत-संगके कैसे । कहना शुचित्व ॥ ७७ ॥
अजी ! यह रहने दो अब । बना तीर्थोंका आश्रय सब ।
धोकर मनका मल शुभ- । शुचित्वसे ॥ ७८ ॥
होता तन मनसे निर्मल । सूर्यके समान है उज्ज्वल ।
तत्त्वार्थिथोंमें है पायल । ब्रह्म-धनका ॥ ७९ ॥
व्यापक तथा उदास । रहता जैसे आकाश ।
वैसे उसका मानस । सदा-सर्वत्र ॥ १८० ॥
जो है संसार-व्यथासे मुक्त । निरपेक्षाळंकार-भूषित ।
मानो व्याध-बाणसे विमुक्त । विहंगमसा ॥ ८१ ॥
सुखमें जो है लीन सतत । न होती कभी टीस प्रतीत ।
न जाने जैसे लज्जाको प्रेत । उसी भांति ॥ ८२ ॥
तथा कार्यारंभका है नहीं । अहंकार तनिक भी कहीं ।
जैसा निर्इंधन होके वह्नि । बुझ जाता है ॥ ८३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४२२
ऐसा हुआ जब उपशम । मोक्ष-सत्रमें लिखाया नाम ।
हुआ है वह निष्काम-काम । धनंजय ॥ ८४ ॥
अर्जुन वह यहीं पर । सोऽहं भावसे भरकर ।
पहुंच चुका उस पार । द्वैत-भावके ॥ ८५ ॥
किंतु भक्ति-सुखके कारण । कर अपना दो विभाजन ।
सेवा धर्मका अंगीकरण । करता आप ॥ ८६ ॥
अन्यको है मैं कहता । फिर स्तोत्र नहीं होता ।
भक्तिका मार्ग दिखाता । योगी वह ॥ ८७ ॥
हमें है उसका व्यसन । उसका ही निज-ध्यान ।
या उसमें ही समाधान । मिलता हमको ॥ ८८ ॥
उसके लिये रूप-धारण । इस विश्वमें अवतरण ।
न्योछावर है उसपे प्राण । सर्व-भावसे ॥ ८९ ॥
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न कांक्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः ॥ १७ ॥
जो आत्म लाभके समान । सुन्दर कछु नहीं आन ।
तभी भोगमें न दें मन । न हो आनंदित ॥ ९० ॥
आप ही है विश्व बन गया । भेद भाव सहज धो गया ।
तब द्वेश भी है मिट गया । उस पुरुषका ॥ ९१ ॥
जो है अपना संतत्व । कल्पांतमें है अस्तित्व ।
तभी भूतका है स्वत्व । कभी न सोचता ॥ ९२ ॥
तथा उसके परे कुछ भी नहीं । अपना जो है अपने पास यहीं ।
तभी उसकी आकांक्षा है ही नहीं । कुछ भी कभी ॥ ९३ ॥
न उल्लास न संताप न चाह सोच भो नहीं ।
भला बुरा सभी छोडा भजता जो मुझे प्रिय ॥ १७ ॥
४२३ भक्तियोग
बीभत्स है या सुंदर । न जाने वह अंतर ।
जैसे जाने ना भास्कर । दिन औ' रात ॥ ९४ ॥
ऐसे बोधसे केवल । रहता है जो निष्कल ।
फिर भी भजनशील । मुझमें वह ॥ ९५ ॥
उसके समान और । नहीं हमें प्रियकर ।
कहता हूं धनुर्धर । सौगंध तेरी ॥ ९६ ॥
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः संगविवर्जितः ॥ १८ ॥
भक्तकी सम-भावना—
जिसके मनमें पार्था । नहीं वैषम्यकी वार्ता ।
रिपु-मित्रकी समता । रहे सदा ॥ ९७ ॥
अपनोंको प्रकाश देना । परायोंको अंधेरा देना ।
जैसा दीप यह सोचना । जानता नहीं ॥ ९८ ॥
करता जो वृक्ष-छेदन । या करता गाछ-पालन ।
दोनोंको दे छाया समान । जैसा वृक्ष ॥ ९९ ॥
मालीको देता मीठा रस । पेरकको न खट्टा रस ।
सबको है मधुर रस । देता ईख-सा ॥ २०० ॥
शत्रु-मित्रमें तैसा । उसका भाव ऐसा ।
रहता है एकसा । मानापमानमें ॥ १ ॥
तीनों ऋतुओंमें समान । रहता है जैसा गगन ।
वैसा ही एक समान । शीतोष्ण जिसे ॥ २ ॥
दक्षिण उत्तर मारुत । जैसा है मेरु पांडुसुत ।
तैसा सुख दुःख हो प्राप्त । मध्यस्थ है जो ॥ ३ ॥
सम जो शत्रु-मित्रोंमें मानापमानमें सम ।
शीतोष्ण सुख दुःखोंमें क्लिप्त सम-भावसे ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ४२४
चंद्रिकाकी शीतलता । राजा रंककी समता ।
वैसे जो सकळ भूत । है सामान ॥ ४ ॥
संपूर्ण जगत एक । जैसे सेवन उदक ।
वैसे उसकी त्रिलोक । करते चाह ॥ ५ ॥
अंतर बाह्य संग । करके सब अंग ।
शून्य हो अन्तरंग । वस्तुलीन ॥ ६ ॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी संतुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १९ ॥
विश्व ही मेरा घर ऐसी जिसकी मति--
निंदासे जो न खिन्न । स्तुतिसे न प्रसन्न ।
रहे जैसा गगन । निर्लेप ॥ ७ ॥
जो निंदा और स्तुति । रखके एक पांति ।
रमता प्राण-वृत्ति । सदा-सर्वत्र ॥ ८ ॥
सत्यासत्यको जो समान । बोलकर रहता मौन ।
भोगता है सदा उन्मन । अतृप्त भावसे ॥ ९ ॥
लाभसे जो न हरषाता । न अलाभसे कुम्हलाता ।
वर्षाके बिन ना सूखता । समुद्र जैसा ॥ २१० ॥
जैसा वायुका इक ठौर । रहता नहीं है आधार ।
वैसा ही न उसका घर । कहीं रहता ॥ ११ ॥
संपूर्ण आकाश स्थिति । वायुकी नित्य-वसति ।
वैसे है विश्व विश्रांति- । स्थान उसका ॥ १२ ॥
विश्व ही यह मेरा घर । ऐसी मति जिसकी स्थिर ।
या हुआ जो सचराचर । अपनेमें आप ॥ १३ ॥
स्तुति-निंदा तजे मौनी संतुष्ट प्राप्त-भोगमें ।
स्थिर-बुद्धि निराधार भक्त जो है मुझे प्रिय ॥ १९ ॥
४२५ भक्तियोग
(54)
इस पर भी हे पार्थ । मेरे भजनमें आस्था ।
उसको करू मैं माथा । पर मुकुट ॥ १४ ॥
उत्तमको मस्तक । नमाना क्या कौतुक ।
मान देता त्रिलोक । पद रेणुको ॥ १५ ॥
श्रद्धा वस्तुका आदर । करना जानो प्रकार ।
होता है यदि शंकर । श्री गुरु ॥ १६ ॥
रहने दो यह भाषा । करनेमें है प्रशंसा ।
शंभुकी होती सहसा । आत्म-स्तुति ॥ १७ ॥
रहने दो यह उक्ति । कहता है रमापति ।
लेकर करता स्तुति । माथेपे उसे ॥ १८ ॥
अपने भक्तके अलिंगनके लिये दो हाथ कम पडे—
सिद्धि चौथा पुरुषार्थ । लेकर अपने हाथ ।
चला है जो भक्ति-पंथ । देते विश्वको ॥ १९ ॥
कैवल्यका ले अधिकार । करे मोक्षका व्यवहार ।
रहता नम्र जैसा नीर । स्वभावसे ॥ २२० ॥
उसको करूंगा नमस्कार । मुकुट धरूंगा सिरपर ।
चरण हृदय पीठ पर । पूजूंगा मैं ॥ २१ ॥
उसके गुणका भूषण । होगा मेरी वाणीका गान ।
उसकी कीर्तिका श्रवण । प्रेमसे करूंगा ॥ २२ ॥
उसके दर्शनका प्रलोभन । बने मुझ अचक्षुके नयन ।
करूं लीला सुमनसे पूजन । उसका मैं ॥ २३ ॥
अजी ! दो पर दो और । कर लेकर मैं चार ।
आलिंगनार्थ आतुर । आया उसके ॥ २४ ॥
उसके संगके सुखके लिये । आया हूं विदेही मैं देह लिये ।
उसके प्रेम बखानके लिये । वाणी है असमर्थ ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ४२६
उसका मैं हूं मित्र । उसमें क्या विचित्र ।
सुनता जो चरित्र । उसका वह ॥ २६ ॥
करता है गुणगान । उससे भी मैं प्रसन्न ।
वह है प्राण समान । मुझको प्रिय ॥ २७ ॥
अजी ! यह सांगत । कहा है जो प्रस्तुत ।
भक्तियोग समस्त । योग-रूप ॥ २८ ॥
करता उसका आदर । धरता उसे सिरपर ।
उस स्थितिकी है अपार । श्रेष्ठता सुन ॥ २९ ॥
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ २० ॥
भक्त क्या ? मुझे अत्यधिक मधुर है—
गोष्ठि है यह रम्य । अमृत धारा धर्म्य ।
करें प्रतीति-गम्य । सुनकर ॥ २३० ॥
श्रद्धाका जिसमें आदर । उरमें इसका विस्तार ।
होता है चितमें सत्वर । अनुष्ठान सुलभ ॥ ३१ ॥
जैसे किया है निरूपण । वैसे ही मनका धारण ।
तभी सुक्षेत्रमें रोपणं । हुआ मानो ॥ ३२ ॥
मुझे मानकर परम । इसीलिये करके प्रेम ।
यही सर्वस्व सर्वोपम । मान लेते जो ॥ ३३ ॥
विश्वमें अजी पार्थ । वही योगी औ' भक्त ।
उत्कंठा है तदर्थ । मुझको सदा ॥ ३४ ॥
वही तीर्थ वही क्षेत्र । विश्वमें हैं वे पवित्र ।
भक्ति कथाका हैं मित्र । सदैव ही ॥ ३५ ॥
——————
जो धर्म-सार है नित्य मुझमें लीन होकर ।
सेते श्रद्धालु जो भक्त अत्यंत प्रिय है मुझे ॥ २० ॥
४२७ भक्तियोग
करता म उनका ध्यान । मेरा यह देवतार्चन ।
उस बिना माने ना मन । दूसरा भला ॥ ३६ ॥
उसका है मुझे व्यसन । मेरा वह निधि निधान ।
अथवा मेरा समाधान । उनके मिलनमें ही ॥ ३७ ॥
ऐसी प्रेमकी वार्ता । जो है अनुवादता ।
है परम देवता । हमारी वह ॥ ३८ ॥
ज्ञानदेवका सगुण कृष्ण—
जो है निज-जनानंद । तथा जगदादिकंद ।
कहता है श्री मुकुन्द । बोला संजय ॥ ३९ ॥
होता है जो निर्मल । निष्कल लोक कृपाल ।
शरणागत प्रतिपाल । शरण्य वह ॥ ४० ॥
वह है धर्म-कीर्ति धवल । अगाध-दातृत्वमें सरल ।
तथा अतुल बल प्रबल । बलि बंधन ॥ ४१ ॥
सुर-सहायशील । लोक-लालन-लील ।
प्रणत-प्रतिपाल । खेल जिसका ॥ ४२ ॥
भक्त-जन-वत्सल । प्रेमी-जन-प्रांजल ।
सत्य-केतू सरल । कला निधि ॥ ४३ ॥
वह कृष्ण वैकुंठका । चक्रवर्ति अपनोंका ।
कहता बोल प्रेमका । सुनता पार्थ ॥ ४४ ॥
संजय कहता श्रीकृष्ण । अब करेंगे निरूपण ।
कीजिये आप श्रवण । धृतराष्ट्रसे ॥ ४५ ॥
ज्ञानदेव कहता तुम । संत सेवा करना हम ।
सिखाया है महा-महिम । निवृत्तिनाथने ॥ ४६ ॥
गीता श्लोक ५५
ज्ञानेश्वरी ओवी ७०८.
१३
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
आत्म-रूपी गणेश वंदन—
आत्म-रूप गणेश स्मरण । जो सकल विद्याधिकरण ।
नमन करें वे श्रीचरण । श्रीगुरुके ॥ १ ॥
करनेसे जिसका स्मरण । शब्द-सृष्टि होती स्वाधीन ।
चढ़ता सारस्वत संपूर्ण । जिह्वा पर ॥ २ ॥
तब है वक्तृत्वकी मधुरता । हठाती अमृतकी मधुरता ।
नव-रस है चूता ही रहता । अक्षरोंसे ॥ ३ ॥
भावोंका अवतरण । स्पष्ट करता है चित्र ।
हस्तामलकसा पूर्ण । होता तत्व-भेद ॥ ४ ॥
श्रीगुरुके जब पाय । पकडता है हृदय ।
महा-भाग्यका समय । उन्मेषका वह ॥ ५ ॥
उनको करके मैं वंदन । पितामहका पिता महान ।
कहता जो श्रीलक्ष्मीरमण । कहूंगा वह ॥ ६ ॥
भगवान उवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १ ॥
श्रीभगवानने कहा
इस शरीरको पार्थ कहते क्षेत्र जान तू ।
जानता यह जो क्षेत्र क्षेत्रज्ञ कहते उसे ॥ १ ॥
आत्मानात्म विचार-
सुन तू अब यह पार्था । देह है क्षेत्र कहलाता ।
इसको जो सही जानता । वह है क्षेत्रज्ञ ॥ ७ ॥
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ २ ॥
यहां है जो क्षेत्रका पालक । मुझको जान क्षेत्रज्ञ एक ।
बन सभी क्षेत्रका रक्षक । रहता हूं मैं ॥ ८ ॥
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञको मान । जानना है यहां ज्ञान ।
समझें हम अर्जुन । इस समय ॥ ९ ॥
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ ३ ॥
तभी हमने है क्षेत्र कहा । किस भावसे देहको यहां ।
कहता हूं प्रयोजन सह । सुन तू पार्थ ॥ १० ॥
इसको क्षेत्र क्यों कहना । इसका पैदा कैसा होना ।
किन विकारोंसे बढ़ना । कहता हूं यही ॥ ११ ॥
यह क्या तीन अर्ध हाथका है । या इससे भी अधिक बड़ा है ।
यह बंजर है या उर्वरा है । तथा है किसका ॥ १२ ॥
इत्यादि इसके सर्व । जो जो हैं वे सभी भाव ।
कहूंगा यह अपूर्व । सुन तू सावधान हो ॥ १३ ॥
शरीरके विषयमें भिन्न भिन्न विचार-
क्षेत्रज्ञ मुझको जान बसा मैं सब क्षेत्रमें ।
क्षेत्र क्षेत्रज्ञका ज्ञान उसे मैं ज्ञान मानता ॥ २ ॥
क्षेत्र क्या उसमें कैसे विकार रहते कहो ।
कैसा क्षेत्रज्ञ कौन कहवा सुन तू यह ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४३०
अजी ! इसी स्थलके कारण । श्रुतिका चलता है भाषण ।
तर्ककी वाद वैखरी तीक्ष्ण । इसके लिये है ॥ १४ ॥
छाननेमें यह स्थान । थक गये हैं दर्शन ।
मिटे नहीं जो घर्षण । उनके कभी ॥ १५ ॥
अजी ! शास्त्रोंका भी नाता । इससे ही है टूटता ।
तथा इसीसे जुड़ता । झगडा जगतका ॥ १६ ॥
बातसे बात न मिलती । एक-वाक्यता नहीं होती ।
बनके वाचालता युक्ति । हुई समर्थ ॥ १७ ॥
न जाने किसका है यह स्थल । किंतु कैसी अभिलाषाका बल ।
घर घरमें है यह कपाल- । मोक्ष गाथा ॥ १८ ॥
नास्तिकोंसे करने मुठभेड़ । वेदोंने किया विद्रोह प्रचंड ।
उसको देख कर हैं पाखंड । बकवाद करते ॥ १९ ॥
कहते तुम निर्मूल । झूठा तुम्हारा वाग्जाल ।
प्रण हमारा है सबल । बीडा उठाकर ॥ २० ॥
पक्ष है जो पाखंड । नग्न लुंचित-मुंड ।
नियोजित वितंड । आते भानपे ॥ २१ ॥
मृत्यूके कसे हुए पाशमें । जायेगा यह इस भयमें ।
चले योगी-जन निर्णयमें । इस क्षेत्रके ॥ २२ ॥
मृत्यूसे हैं जो भयग्रस्त । करते वनमें एकांत ।
यम-दम-अभ्यास-रत । हो पाते पूर्ण ॥ २३ ॥
इस क्षेत्राभिमान मगन । कैलास तजता है ईशान ।
बसता है जाकर स्मशान । उलझन भयसे ॥ २४ ॥
इस प्रतिज्ञासे शंकर । सिकुडकर सभी ओर ।
करता राख घूस-खोर । मन्मथकी भी ॥ २५ ॥
तथा सत्य-लोक-नाथ । वदन चार वादार्थ ।
किंतु वे नहीं सर्वथा । जानते कुछ ॥ २६ ॥
३३१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वर द्वारा क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विषयमें भिन्न भिन्न मतोंका विवेचन—
आत्मानात्म विवेक जीववादी दृष्टिसे-
एक कहता यह स्थल । जीवका ही है सहमूल ।
फिर प्राण है यह कुल । उसका यहां ॥ २७ ॥
घरमें उस प्राण के । चार भाई जो उसके ।
तथा मन-सा जिसके । प्रबंधक है ॥ २८ ॥
इन्द्रिय-बैलोंका जो समूह । नहीं देखता काल प्रवाह ।
करता है श्रम बिना आह । विषय-खेतमें ॥ २९ ॥
खोकर विहित-कर्म अवसर । अन्याय-बीजकी बुवाई कर ।
कुकर्मार्थ सब परिश्रम कर । फसल काटता ॥ ३० ॥
तभी उसीके समान । पाता है पाप जो मन ।
भोगता दुःख महान । जन्म-कोटि ॥ ३१ ॥
या विधिवत कर उद्यान । किया सत्कर्म-बीजारोपण ।
शत शत है जन्मानुदिन । सुख-भोग ॥ ३२ ॥
प्रकृतिवादियोंकी दृष्टिसे—
कहते हैं तब कुछ औ । जीवका न कहो यह ठौर ।
हमसे जानो इसका विचार । पूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥
अजी ! है यहां जीव पथिक । चलती राहमें रहा रुक ।
प्राण है जो यहां मालिक । जग रहा है ॥ ३४ ॥
यहां जो अनादि प्रकृति है । सांख्य जिसके गीत गाते हैं ।
खेत यह उसकी वृत्ति है । जान तू यह ॥ ३५ ॥
गाया विविध मंत्रोंमें ऋषियोंने इसे पृथक् ।
कहा है ब्रह्म-सूत्रोंमें सप्रमाण सुनिश्चित ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वरी ४३२
इसके पास है साधन । घरका ही है बारदान ।
तब बनती है किसान । अपने आप ॥ ३६ ॥
झमेलेमें नित चतुर । इसके हैं तीन कुमार ।
करते सब कारोबार । गुण हैं जो ॥ ३७ ॥
रजो-गुण बुवाई करता । सत्व जो उसको संभालता ।
तमोगुण फसल काटता । अकेला ही ॥ ३८ ॥
महत्तत्वका रच खलिहान । काल-सांडसे कराके मांडन ।
अव्यक्तका वहां ढेर महान । होता रहता है ॥ ३९ ॥
संकल्प वादियोंकी दृष्टिसे-
तब कहते कुछ बुद्धिमान । प्रकृति वादियोंसे बुरा मान ।
यह है अति आर्वाचीन । आप लोगोंका ॥ ४० ॥
अजी ! चित देकरके हो स्वस्थ । सुनो तुम यह क्षेत्र-वृत्तांत ।
तत्वमें कहां प्रकृतिकी बात । कहते हैं यह ॥ ४१ ॥
वह शून्य शय्यागृहमें । पूर्णावस्थाकी लीनतामें ।
शक्त-संकल्पने शय्यामें । निद्रा की थी ॥ ४२ ॥
जगा जो वह अकस्मात । उद्योगमें था भाग्यवंत ।
मिली है पूंजी अमानत । इच्छ-मात्रसे ॥ ४३ ॥
निराकारके उद्यानमें । त्रिभुवनकी समतामें ।
आया जो है व्यक्त रूपमें । उससे यह ॥ ४४ ॥
महा-भूतोंकी जो ऊसर । कसके उसे उर्वर ।
भूतग्रामके बांधे चार । सीमा-मेड़ें ॥ ४५ ॥
अजी ! प्रारंभ किया फिर । पंच तत्वात्मक शरीर ।
समुचित मिश्रण कर । पंच-भूतका ॥ ४६ ॥
कर्माकर्मके पत्थर । रख बांधे दोनों ओर ।
किया है अति उर्वर । ऊसर था जो ॥ ४७ ॥
आवागमनार्थ यहां फिर । जन्म मृत्युके बांधे गन्हर ।
रक्षाका ऐसा प्रबंध कर । संकल्पने तब ॥ ४८ ॥
४३३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
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अहंकारसे हो एक । वह भी पूर्णायुतक ।
बुद्धिसे कार्य कृषक । कराया चराचर ॥ ४९ ॥
इस भांति है निराली । बडी संकल्पकी डाली ।
इसीलिये है वह मूली । यहां प्रपंचकी ॥ ५० ॥
ऐसे हैं यह मत-मुक्तक । व्यक्त हुए हैं जब शाब्दिक ।
जी ! आप हैं बडे विचारक । कहते हैं और ॥ ५१ ॥
स्वभाव-वादियोंकी दृष्टिसे--
अजी ! गांवमें पर-तत्वके । पर्यंकको देखें संकल्पके ।
तो क्यों प्रकृति-वादियोंके । तर्क नहीं माने ॥ ५२ ॥
किंतु ऐसा नहीं कहना । इसमें तुम्हें न पडना ।
कहा जायेगा यह पूर्ण । हमसे अब ॥ ५३ ॥
आकाश कहो है कौन । भरता मेघोंसे पूर्ण ।
अधरमें तारा-गण । कौन रखता ॥ ५४ ॥
गगनका यह वितान । किसने ताना महान ।
होता वायुका संचालन । किसकी आज्ञासे ॥ ५५ ॥
रोमोंकी बुवाई करता कौन । समुद्रको सदा भरता कौन ।
पर्जन्य धाराको गिराता कौन । कहो यहां ॥ ५६ ॥
यह क्षेत्र है ऐसा स्वाभाविक । न है कोई इसका मालक ।
पाता है जो करता देखरेख । अन्य नहीं कोई ॥ ५७ ॥
कालवादिकी दृष्टिसे--
कहता है तब और एक । तुम कहते हो बडा नेक ।
कहो कैसे भोगता है एक । केवल काल ॥ ५८ ॥
यह क्रोधी मृत्यु-सिंहका । गह्वर अपना उसका ।
नहीं क्या व्यर्थ प्रलापका । सही उत्तर ॥ ५९ ॥
सभी हैं इसकी मार । देखते हैं अनिवार ।
किंतु स्व-मतपे भार- । वे बोलते हैं ॥ ६० ॥
ज्ञा.-
नेश्वरी
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महा कल्पके उस ओर । यकायक झपट्टा मार ।
प्रहार भद्र जाती पर । किया सत्य लोकके ॥ ६१ ॥
नित-नव नव लोकपाल । तथा दिग्गजोंको यह काल ।
स्वर्ग-काननमें जा विपुल । तोड़ता रहता ॥ ६२ ॥
शरीर-समीरसे इसके । गर्तमें जनम-मरणके ।
भूमिष्ठ पडे निर्जीव होके । जीव-मृग हैं ॥ ६३ ॥
फैला है इसका पंजा । मानो यह है शिंकजा ।
बनाके आकर गज- । करता है ग्रास ॥ ६४ ॥
इसीलिये कालकी सत्ता । कहते हैं हम निश्चित ।
ऐसा वाद है पांडुसुत । इस क्षेत्रका ॥ ६५ ॥
इस क्षेत्रके विषयमें सभी अज्ञानमें हैं—
कर चुका है वाद विपुल । नैमिशारण्यमें ऋषि-कुल ।
पुराण इसके अनुकूल । आधार रूप हैं ॥ ६६ ॥
हैं अनुष्टुप आदि छंद । इस विषयमें विविध ।
होते हैं आधार स-श्रध्द । आज भी लोगोंके ॥ ६७ ॥
वेदोंके बृहत्साम-सूत्र । जो हैं अतिशय पवित्र ।
उसको भी है यह क्षेत्र । अज्ञात-रूप ॥ ६८ ॥
अन्य और अगणित । महा-कवि बुद्धिमंत ।
इसपे अपना मत । देते रहते हैं ॥ ६९ ॥
किंतु यह किसका है । किसके स्वामित्वमें है ।
समझमें न आता है । किसीक भी ॥ ७० ॥
अजी ! यह है जैसे । अब क्षेत्र है कैसे ।
कहता मैं तुझसे । सुन सायन्त ॥ ७१ ॥
महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥
पंच भूत अहंकार बुद्धि अव्यक्त मूल जो ।
एकादश इंद्रियोंको खींचे विषय पंचक ॥ ५ ॥
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क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग