ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअपने शरीरके रोम हिलेंगे । इसलिये हाथ न सहलायेंगे ।
नखोंके लपट लिपट जायेंगे । उंगुलियों पर ॥ ८५ ॥
करनेको है जहां अभाव । बन गया है ऐसा स्वभाव ।
हाथोंका है तब निज-भाव । जुड़ जाते वे ॥ ८६ ॥
या उठते हैं अभय देने । आर्त दीनकी सेवा करने ।
गिरनेवालोंको संभालने । कभी कभी ॥ ८७ ॥
यह भी वह बलसे करता । आर्तका भय दुख हरता ।
उस हस्त-स्पर्शकी शीतलता । न जाने चंद्रमा भी ॥ ८८ ॥
उसका वह स्पर्श पाकर । लगे मलयानिलय कठोर ।
सहलाता हो प्रेम विभोर । पशुको भी ॥ ८९ ॥
हाथ जो रीता सदा खुला । चंदनांग जैसे निर्मल ।
न फलनेपे भी निष्फल । कह सकते नहीं ॥ २९० ॥
रहने दो यह वाग्जाल । जाने उसके करतब ।
जैसे है सज्जनोंका शील । स्वभाव वैसे ॥ ९१ ॥
ज्ञानीके अहिंसक मनका स्वरूप—
अब कहूंगा मनका लक्षण । यह कहना भी है विलक्षण ।
अब तक किया जो निरूपण । किसका विलास ॥ ९२ ॥
शाखा नहीं हैं क्या तरूवर । जल बिन होता क्या सागर ।
या तेज बिन क्या तेजाकार । संभव है क्या ॥ ९३ ॥
अवयव और शरीर । नहीं क्या एक ही आधार ।
अथवा रस और नीर । भिन्न है क्या ॥ ९४ ॥
इसीलिये यहां सर्व । कहे हैं जो बाह्य भाव ।
मन ही वे सावयव । ऐसे जानना ॥ ९५ ॥
जिस बीजका किया रोपन । फैला वही शाखा रूप बन ।
वैसे इंद्रियोंसे प्रसरण । होता मनका ही ॥ ९६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४५४