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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 511

तथा-शुक्रशोणित मिलन । देता है पंच-तत्वको चिह्न ।
एक वायु-तत्व अर्जुन । बनता दस रूप ॥ ६ ॥
फिर यह दस प्रकार । देहका सामर्थ्य लेकर ।
अपने निज स्थान पर । हुए प्रतिष्ठित ॥ ७ ॥
वहां चांचल्य चपल । रहा जो एक केवल ।
इससे रजका बल । लिया उसने ॥ ८ ॥
बुद्धिके वह बाहर । अहंताके डर पर ।
ऐसे मध्य-स्थान पर । दृढ हो बैठा ॥ ९ ॥
व्यर्थ है उसका नाम मन । जो मात्र कल्पना मूर्तिमान ।
उसके संगसे मिला जान । वस्तुको जीव भाव ॥ ११० ॥
प्रकृतिका है जो मूल । कामको जिसका बल ।
चेतता है जो प्रबल । अहंकार ॥ ११ ॥
इच्छाको वह बढ़ाता । आशाको वह चढ़ाता ।
रक्षण नित करता । भयका जो ॥ १२ ॥
द्वैतका जो उगम-स्थान । अविद्या करे बलवान ।
इन्द्रियोंका करे पतन । विषयोंमें ॥ १३ ॥
संकल्पोंसे है सृष्टि रचता । विकल्पोंसे उसको तोड़ता ।
मनोरथोंका ढेर चढा था- । उतराता वह ॥ १४ ॥
भ्रांतिका जो भंडार । वायु तत्व्-अंतर ।
तथा बुद्धिका द्वार । करता बंद ॥ १५ ॥
यह कहलाता मन । अन्य कछु नहीं जान ।
अब विषयाभिदान । बताता हूं ॥ १६ ॥
विषयोंका स्पष्टीकरण-
स्पर्श तथा शब्द । रूप रस गंध ।
हैं ये पंच-विध । ज्ञानेंद्रियोंके ॥ १७ ॥
४३९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग