ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउसी भांतिसे अर्जुन । आत्म-संगसे है तन ।
प्राप्त करता जीवन । जड़ है जो ॥ ४१ ॥
इसको है चेतन । कहते हैं अर्जुन ।
धृतिका विवेचन । सुन तू अब ॥ ४२ ॥
धृतिका विवेचन—
पंच तत्वमें परस्पर । जाति-स्वभावसे है वैर ।
डुबोता है पृथ्विको नीर । प्रकट रूपसे ॥ ४३ ॥
पानीको तेज सोखता । वायु तेजसे लड़ता ।
वायुका नाश करता । गगन सहज ॥ ४४ ॥
कभी किसीमें न मिलकर । किसीसे मिलन न होकर ।
पैठकर भी भिन्न भीतर । रहता आकाश ॥ ४५ ॥
पंच-भूत ऐसे परस्पर । करते रहते सदा वैर ।
किंतु एक बनके शरीर । रूप होता प्रकट ॥ ४६ ॥
शत्रुता छोड भीषण । रहते कर संघटन ।
परस्पर कर पोषण । अपने गुणसे ॥ ४७ ॥
जिनमें स्वभावसे शत्रुता । रहती है वे कर मित्रता ।
जिस गुणसे है यह होता । धृति उसका नाम ॥ ४८ ॥
संघात और क्षेत्र-विवेचन—
तथा जीव सह साथ । छत्तीस है यहां साथ ।
वह है यहां संघात । तत्व जान ॥ ४९ ॥
ऐसे छत्तीस ही भेद । किये तुझसे विशद ।
इसको जान प्रसिध्द । क्षेत्र है यह ॥ १५० ॥
जैसे रथांगोंका समुदाय । रथ कहलाता धनंजय ।
या शरीरावयव इंद्रिय । कहलाता शरीर ॥ ५१ ॥
करि तुरंगादिका समाज । कहलाता है सैन्य सहज ।
वाक्य कहलाते हैं जो पुंज । शब्दोंके ॥ ५२ ॥
ज्ञानेश्वरी ४४२