ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविविध रोगसे पीडित । देख उसमें जर्जरित ।
हिंसा कर निवारणार्थ । कहा चिकित्सा ॥ २५ ॥
देखो उस चिकित्साको । खोदा किसीके जड़को ।
उखाड़ा किसी वृक्षको । समूल-पत्र ॥ २६ ॥
किसीका गाभा निकाल । किसीकी खाल छील ।
किसीका तोड़ा कोंपल । पकाने पुट देने ॥ २७ ॥
अजात-शत्रु वे तरुवर । सर्वांग उनका चीरकर ।
ऐसा जीव लेके धनुर्धर । किया नीरस ॥ २८ ॥
तथा जंगमको भी हाथ । लगाकर निकाला पित्थ ।
फिर किये रोग-पीडित । भले चंगे ॥ २९ ॥
व्यावहारिक अहिंसा-
अजी ! तोड वसति घर । बांधे जाते मंदिर-द्वार ।
व्यवहारमें लूट कर । बांधा अन्न-छत्र ॥ २३० ॥
पगडी बांधी सिरपर । अपनी धोती खोलकर ।
या तोडके अपना घर । डाला मंडवा ॥ ३१ ॥
अपनी रजाई जलाकर । ताप लिया जैसे रात-भर ।
जैसे स्नान करता कुंजर । मृत्तिकासे ॥ ३२ ॥
गोठा बांधा बैल बेच कर । या तोता दे लिया पंजर ।
ऐसी करणी देख कर । हंसी आती है ॥ ३३ ॥
कोई धर्म धर्म कहते । पानीको छानकर पीते ।
उसी तापसे हैं मरते । जीव असंख्य ॥ ३४ ॥
न पकाके खाते धान । हिंसाके भयसे जान ।
जिससे तडपे प्राण । यही है हिंसा ॥ ३५ ॥
एवं हिंसाको अहिंसा । कर्म-कांडमें है ऐसा ।
सिद्धांत है सुमन-सा । जान ले तू ॥ ३६ ॥
४४९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
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