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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 508

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥
इस शरीरके मूल-भूत छत्तीस तत्व—
है महा-भूत पंचक । तथा अहंकार एक ।
बुद्धि अव्यक्त दशक । इंद्रियोंका ॥ ७२ ॥
और भी है एक । विषय-दशक ।
द्वेष सुख दुःख । संघात इच्छा ॥ ७३ ॥
तथा चेतना धृति । एवं है क्षेत्र वृत्ति ।
कही तुझसे अति । अल्प-रूपसे ॥ ७४ ॥
कौन है महा भूत । विषय क्या है पार्थ ।
औ' इंद्रिय महित । कहता हूं सब ॥ ७५ ॥
पृथ्वी जल अगिन । वायु तथा गगन ।
ये हैं पांच अर्जुन । महा-भूत ॥ ७६ ॥
अहंकारका रूप—
जागृतिमें जैसे स्वप्न । आंखोंमें रहता लीन ।
या अमावासके दिन । चंद्र होता गुप्त ॥ ७७ ॥
बालकोंमें जैसे अर्जुन । छिपा रहता है यौवन ।
या कलिमें होता प्रसन्न । सुगंध गुप्त ॥ ७८ ॥
अथवा जैसे इन्धनमें । अग्नि होता सुप्तावस्थामें ।
वैसे होता है प्रकृतिमें । गुप्त-रूपसे ॥ ७९ ॥
अथवा धातु गत ज्वर । कुपध्यामिष देखकर ।
होता है अंदर बाहर । व्याप्त अर्जुन ॥ ८० ॥
ऐसे पांचोंसे मिल कर । देहका आकार लेकर ।
नचाता तब अहंकार । दश-दिशामें ॥ ८१ ॥
इच्छा द्वेष सुख-दुःख धृति संघात चेतना ।
विकार-युक्त है क्षेत्र अल्पमें तुझसे कहा ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४३६