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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 518

न देखना आंखोंसे पूजना । स्वकीर्ति कानोंसे न सुनना ।
लोगोंको स्मरण नहीं होना । अपना कभी ॥ ८८ ॥
वहां सत्कारकी गोष्ठि । न आदर न है भेटी ।
मनमें होता है कष्टी । नमस्कारसे ॥ ८९ ॥
वाचस्पतिकी भांति । सर्वज्ञताकी प्राप्ति ।
होके भी है छिपाती । भीति कीर्तिकी ॥ १९० ॥
चातुर्यको छिपाता । महत्त्वको भुलाता ।
बावला हो रहता । प्रेमसे जो ॥ ९१ ॥
लौकिकका उसे उद्वेग । शास्त्रार्थका भी है उबग ।
मनमें है नाम सुभग । रहता स्वस्थ ॥ ९२ ॥
लोगोंसे हो अनादर । आप्तोंसे न अंगीकार ।
ऐसी लालसा अपार । रहती उसकी ॥ ९३ ॥
नम्रताका व्यवहार । अल्पत्व हो अलंकार ।
करना ऐसे आचार । उसका स्वभाव ॥ ९४ ॥
रहता है या नहीं । ऐसा रहना कहीं ।
मनमें आशा यही । जीवनमें सदा ॥ ९५ ॥
चलता है या नहीं वहां । हवासे उडता है कहां ।
ऐसा भ्रम हो जहां तहां । सहज रहे ऐसा ॥ ९६ ॥
मेरा अस्तित्व हो लोप । मिट जाये नाम-रूप ।
जिससे भय हो लोप । प्राणि-मात्रका ॥ ९७ ॥
उसकी ऐसी मनौति । एकांतमें होती प्रीति ।
एकांतसे नित्य-रति । उसको सर्वत्र ॥ ९८ ॥
हवासे उसका पटता । गगनसे बोलना भाता ।
वृक्षोंसे मैत्री है करता । जीव-भावसे ॥ ९९ ॥
अथवा है इस भांतिके । लक्षण दीखते जिसके ।
सह-शय्यामें ही उसके । रहता ज्ञान ॥ २०० ॥
ज्ञानेश्वरी ४४६