सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

उसका तथा मोहका मिलन । है यह व्यर्थ-बातका कथन ।
मृगजलसे होगा क्या शमन । वडवानलका ॥ ६६ ॥
तथा जो मैं हूं तब श्रीकृष्ण । पाके कृपाका अंतःकरण ।
करता हूं सानंद भोजन । ब्रह्म-रसका ॥ ६७ ॥
इससे हुवा मेरा मोह निवारण । इसमें क्या भला विस्मयका कारण ।
इससे हुवा मेरा उद्धार श्रीकृष्ण । तेरे चरणोंकी सौगंध ॥ ६८ ॥
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २ ॥
अर्जुनकी आंतरिक द्विविधा—
अजी ! हे कमल-नयन । कोटि-सूर्य-तेज वदन ।
मैंने तुझसे जनार्दन । सुना है आज ॥ ६९ ॥
प्रकृतिसे उत्पन्न भूत-जात । वैसे प्रकृतिमें उसका अंत ।
कैसा होता है जो प्राकृत । कहा है देवने ॥ ७० ॥
प्रकृतिका दिया संपूर्ण-ज्ञान । बताया ब्रह्मका वसति-स्थान ।
जिसको ओढ करके महान् । हुए हैं वेद ॥ ७१ ॥
ज्ञान-राशीको जो बढाता । धर्म-रत्नोंको प्रसवता ।
वेद है आश्रय करता । तेरे स्वरूपका ॥ ७२ ॥
ऐसा अगाध है महात्म्य । जो सकल मार्गैक्य-गम्य ।
तथा है स्वानुभव रम्य । दिखाया मुझे ॥ ७३ ॥
हटाकरके सब बादल । दिखाते जैसे सूर्य-मंडल ।
सेवार हटाकर निर्मल । जल दिखाते हैं ॥ ७४ ॥
छुडानेसे सांपकी जकडन । होता जैसे चंदन-दर्शन ।
या करनेसे पिशाचोच्चाटन । मिलती भूमिस्थ निधि ॥ ७५ ॥
उत्पत्ति नाश भूतोंका सुना मैंने सविस्तर ।
अभंग महिमा वैसे तेरे ही मुखसे प्रभु ॥ २ ॥
ज्ञानेश्वरी ३३८

वैसे थी प्रकृतिकी अडचन । हटाया तूने उसे जनार्दन ।
पर-तत्वमें की है फिर लीन । बुद्धि मेरी ॥ ७६ ॥
इस विषयमें मेरा देव । हुवा संदेह रहित जीव ।
किंतु और एक संकल्प-भाव । हुआ उत्पन्न ॥ ७७ ॥
रहने दिया इसे संकोचकर । किससे पूछें कहो चक्रधर ।
तेरे बिना नहीं अन्य आधार । जानता मैं ॥ ७८ ॥
जलचर माने जलका आभार । या बालक स्तन्यका संकोच कर ।
जीनेका वह दूसरा क्या आधार । ढूंढेगा देव ! ॥ ७९ ॥
तो संकोच नहीं करना । मनकी जो बात कहना ।
कहे तब कृष्ण अर्जुन । कह तू चाह ॥ ८० ॥
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥
स-संकोच विश्व-रूप दर्शनकी प्रार्थना -
तब कहता किरीटी । कही थी तूने जो गोष्टि ।
उससे प्रतीति दृष्टि । शांत हुई मेरी ॥ ८१ ॥
संकल्प जहांसे है निकलता । लोक-क्रमका उदयास्त होता ।
जिस स्थानको है तू 'मैं कहता । जनार्दन ॥ ८२ ॥
वह वास्तविक रूप है तेरा । जहांसे आता तू ले अवतार ।
सुर-कार्यार्थ तू है चक्रधर । द्विभुज या चतुर्भुज हो ॥ ८३ ॥
क्षीर-शयनाभिनय समाप्त कर । मत्स्य-कूर्मका अलंकार छोड़कर ।
लीला-साधन सबको तू छिपाकर । रखता लपेटके ॥ ८४ ॥
उपनिषद करते गायन । योगी-जन हृदयमें दरशन ।
सनकादिक नित आलिंगन । करते जिसके ॥ ८५ ॥
, तेरा जो ईश्वरी रूप मानना हूँ यथार्थ है ।
वही मैं देखना चाहूँ प्रत्यक्ष पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥
३३९ विश्व-रूप-दर्शनयोग

ऐसा तेरा असीम जनार्दन । विश्व-रूप कथा सुनके मन ।
देखना चाहते वही नयन । प्यासे होकर ॥ ८६ ॥
मेरा संकोच करके दूर । स-स्नेह पूछी चाह श्रीधर ।
यही एक चाह चक्रधर । पूर्ण करना ॥ ८७ ॥
तेरा विश्व-रूप संपूर्ण । देखना चाहता स-तृष्ण ।
होकर तन-मन प्राण । एकमात्र ॥ ८८ ॥
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥ ४ ॥
और एक बात केशव । विश्व-रूप दर्शनास्तव ।
मेरी योग्यता है वास्तव । या नहीं है ॥ ८९ ॥
यह मैं आप नहीं जानता । यह क्यों है यदि तू पूछता ।
अपने रोगका क्या जानता । निदान रोगी ? ॥ ९० ॥
अजी ! होती जब इच्छाकी तीव्रता । भूलते हैं तब अपनी योग्यता ।
प्यासा मनुष्य है सदैव मानता । अपर्याप्त समुद्र ॥ ९१ ॥
इच्छाकी है ऐसी जो तीव्रता । भुला देती है मेरी योग्यता ।
जानती किंतु शिशुको माता । सहज-भावसे ॥ ९२ ॥
वैसा तू भक्त जन रंजन । जानता है मेरी संभावना ।
फिर तू विश्व-रूप दर्शन । देगा हो सदय ॥ ९३ ॥
किंतु मेरी योग्यतानुसार । ना हो तो ना कह कृपाकर ।
गाके लाभ क्या पंचम स्वर । बहरेके सम्मुख ॥ ९४ ॥
एक प्यासेकेलिये वर्षा होती । उससे पृथ्वीकी प्यास बुझती ।
किंतु वही चट्टान पर होती । व्यर्थ जाती है ॥ ९५ ॥
चकोरको चंद्रामृत मिलता । अन्योंको क्या इनकार करता ।
किंतु दृष्टि न होनेसे होता । व्यर्थ ही सब ॥ ९६ ॥
यदि तू मानता शक्य तेरा जो रूप देखना ।
तभी योगेश्वर देव दिखावो वह अव्यय ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४०

अजी ! तू विश्व-रूप यह सहसा । दिखायेगा इस बातका भरोसा ।
ऐसी बातोंमें उदार अपना-सा । नित्य-नूतन तू ॥ ९७ ॥
परमात्माकी असमान्य उदारताका वर्णन—
तेरी उदारता है जो स्वतंत्र । न देखती देनेमें पात्रापात्र ।
कैवल्य-सा वर अति-पवित्र । दिया शत्रुओंको भी ॥ ९८ ॥
अजी ! मोक्ष है जो अति दुराराध्य । तेरे चरण हैं उसका आराध्य ।
होता है वह तेरी बातसे साध्य । सेवकके समान ॥ ९९ ॥
तूने सनकादिकके समान । पूतनाको दिया सायुज्यासन ।
कराके जो विषका स्तन-पान । मारने आयी थी ॥ १०० ॥
राजसूय सभा-सदनमें । त्रिभुवन जन-सम्मुखमें ।
जिसने शत दु-र्वचनमें । डुबोया तुझे ॥ १ ॥
ऐसा अपराधी जो शिशुपाल । पाता है तेरे चरणमें स्थल ।
या उत्थानपादका ध्रुवबाल । चाहता था क्या मोक्ष ॥ २ ॥
ध्रुवबाल आया था वनमें । बैठना है पिताकी गोदमें ।
उसको किया तूने जगतमें । सूर्य-चंद्रसे ऊंचा ॥ ३ ॥
ऐसे वनवासियोंको सकल । देनेवाला एक है तू धसाल ।
पुत्रको पुकारता अजामिल । किया चिद्रूप ॥ ४ ॥
जिसने मारी लात तेरी छाती पर । उसका पद-चिन्ह किया अलंकार ।
अब-तक है शत्रु का ही कलेवर । भूषण बना करमें ॥ ५ ॥
अपकारी पर भी तेरा उपकार । अपात्रों पर भी तू है अति उदार ।
द्वारपाल बना तू दान मांगकर । बलिके घरका ॥ ६ ॥
न सुनी जिसने आराधना । रिझाती थी जो तोता अपना ।
उस गणिकाको जनार्दन । तूने दिया वैकुंठ ॥ ७ ॥
दिखा कर ऐसे व्यर्थके कारण । निज-पद देता तू नारायण ।
न करेगा तू मुझे ऐसा श्रीकृष्ण । कभी निराश ॥ ८ ॥
जिससे इतने जगत सकल । पाता है शांति तुष्टि पुष्टि औ' बल ।
उस नंदिनीका बछडा व्याकुल । होगा क्या भूखसे ॥ ९ ॥
३४१ विश्व-रूप-दर्शनयोग

इसीलिये मैंने कही पीछे जो बात । देव न करेंगे अस्वीकार निश्चित ।
उसकी योग्यता देना मुझे अच्युत । यह है विनय ॥ ११० ॥
तेरे विश्व-रूपका आकलन । कर सकेंगे तो मेरे नयन ।
प्यास बुझावो हे जनार्दन । इन नयनोंकी ॥ ११ ॥
श्री कृष्णकी भक्त-वत्सलता—
करता है जब ऐसी विनती । लीन हो करके सुभद्रापति ।
तब वह षड्गुण-चक्रवर्ति । होता है उतावला ॥ १२ ॥
वह है कृपा-पीयूष सजल । पास आया है यहां वर्षा-काल ।
अथवा है श्रीकृष्ण कोकिल । अर्जुन बसंत ॥ १३ ॥
देखकर जैसे चंद्र-बिंब वर्तुल । उछल आता है क्षीर-सागर-जल ।
वैसे प्रेम-बलसे हृदय-कमल । खिला श्री हरिका ॥ १४ ॥
प्रसन्नताके उस उमंगसे । गरज कर कहता कृपासे ।
पार्थ तू देख देख आनंदसे । स्वरूप मेरा ॥ १५ ॥
केवल विश्व-रूपको देखना । इतनी थी पार्थकी मनो-कामना ।
यहां विश्व रूपमय त्रिभुवन । किया श्री हरिने ॥ १६ ॥
धन्य-धन्य उदार अपरिमित । याचकको देता देव दिन-रात ।
चाहता जो उससे अनगिनत । अपना सर्वस्व ॥ १७ ॥
शेषसे भी जो था चुराया । वेदोंको जिससे छकाया ।
लक्ष्मीसे भी जो था छिपाया । वह हृदय-गुह्य ॥ १८ ॥
प्रकट करेंगे अनेक दर्शन । बनायेंगे विश्व-रूप प्रदर्शन ।
भाग्यशाली है यह बडा अर्जुन । धन्य धन्य ॥ १९ ॥
स्वप्नमें जाता जैसे मनुष्य जागृत । स्वप्नमें बनता है स्वयं वस्तु जात ।
वैसे स्वयं बना विराट्-विश्व अनंत । अपने आपमें ॥ १२० ॥
यकायक वह मुद्रा छोडी । स्थूल-दृष्टि थी यवनिका जो फाडी ।
अथवा खोलकर दिखायी बडी । अपनी योग-सिद्धि ॥ २१ ॥
किंतु यह देखेगा या नहीं । ऐसा विचार कुछ भी नहीं ।
किया और देख कहना है यही । हो स्नेहातुर ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४२

भगवान उवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५ ॥
विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपकी जड़में एक सृष्टिका दर्शन, स्वभाव-विविधता—
तूने कहा अर्जुन दिखावो एक । उसीको दिखाया तो क्या रहा नेक ।
यहां भरा है जो सभी अब देख । मेरे ही रूपमें ॥ २३ ॥
एक कृश तो एक स्थूल । एक लघु एक विशाल ।
पृथुतर तथा विशाल । अमर्याद सब ॥ २४ ॥
एक अनावर तो एक प्रांजल । कुछ स-व्यापार तो कुछ निश्चल ।
कुछ उदासीन तो कुछ स्नेहल । कुछ हैं कठोर ॥ २५ ॥
कुछ उन्मन कुछ सावध । कुछ उथल कुछ अगाध ।
कुछ प्रसन्न तो कुछ क्रुद्ध । तथा मुक्त संकुचित ॥ २६ ॥
कुछ संत कुछ सदा-मद । कुछ स्तब्ध कुछ सानंद ।
गर्जन रत कुछ निःशब्द । तथा सौम्य भी ॥ २७ ॥
अभिलाषा-युत कुछ विरक्त । कुछ जागृत कुछ निद्रित ।
कुछ संतुष्ट कुछ है आर्त । अति उदार कुछ ॥ २८ ॥
कुछ अशस्त्र तो कुछ सशस्त्र । तथा अति रौद्र औ' अति-मित्र ।
कुछ तम-युत कुछ पवित्र । कुछ है समाधिस्थ ॥ २९ ॥
कयी जन लीला-विलास । औ' पालन-शील-लालस ।
संहारक कुछ सावेश । कुछ है साक्षि-भूत ॥ १३० ॥
नाना विध जो प्रकर्ष ऐसे । प्रकाशित जो दिव्य-तेजसे ।
वर्णमें भी जो एक एक-से । नहीं थे कोयी ॥ ३१ ॥
श्रीभगवानने कहा
देखो मेरे सभी रूप दिव्य शत सहस्र तू ।
नाना प्रकार आकार वर्ण भी जिसमें बहु ॥ ५ ॥
३४३ विश्व-रूप-दर्शनयोग

विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपमें वर्ण-विविधता—
कुछ तो तप्त सुवर्णसे । कुछ भूरे मट-मैलेसे ।
कुछ सराग चित्रितसे । सिंधुसे नभ ॥ ३२ ॥
कुछ जो सहज स्वाभाविक कांतिके । कुछ रत्न-जडित ब्रह्मांड दीप्तिके ।
कुछ तो अरुणोदय-प्रभा सरीखे । कुंकुमके समान ॥ ३३ ॥
कुछ शुद्ध स्फटिकोज्ज्वल । कुछ इंद्र-नील सुनील ।
कुछ काले अंजनाचल । कुछ रक्त-वर्ण ॥ ३४ ॥
कुछ लसित-कंचनसे पीले । कुछ शामल बादलसे नीले ।
कुछ चंपक-गौर सम पीले । कुछ थे हरे ॥ ३५ ॥
कुछ लाल तप्त-ताम्र सम । कुछ सुंदर जो चंद्र-सम ।
नाना वर्णके रूप असीम । देख लो भरे ॥ ३६ ॥
जैसे हैं ये अनेक वर्ण । रूपमें भी नहीं प्रमाण ।
लज्जासे कंदर्प-शरण । रूप होंगे देख ॥ ३७ ॥
विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपमें रूप विविधता—
कुछ अति लावण्य साकार । स्निग्ध-तन कुछ मनोहर ।
कुछ श्रृंगार-श्रीके-भांडार । खुला प्रदर्शनार्थ ॥ ३८ ॥
कुछ पीनाकवयव मांसल । कुछ शुष्क अति-विकराल ।
कुछ दीर्घ-कंठ और शिथिल । कुछ अति घिनौने ॥ ३९ ॥
ऐसे नाना-विध वर्ण आकृति । पार नहीं यहां सुभद्रा-पति ।
यहां प्रत्येक अंगकी आकृति । दिखाती विश्व ॥ १४० ॥
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥ ६ ॥
वसु रुद्र तथा वायु देखो आदित्य अश्विनी ।
देखो अनेक आश्चर्य न देखे पहले कभी ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४४

विश्वरूपमें अनेक देवताओंका दर्शन—
खुलती है जहां दृष्टि । फैलती है आदित्य-सृष्टि ।
मिटती है जहां दृष्टि । होता अस्त ॥ ४१ ॥
मुखसे निकल हुआ फूत्कार । लेकरके ज्वालाओंका आकार ।
पावक आदि वसु समाधार । निर्माण करते ॥ ४२ ॥
जहां भ्रू-लताओंका अवसान । क्रोधसे होता रहता मिलन ।
वहां रुद्रोंके समूह उत्पन्न । होते हैं देख ॥ ४३ ॥
सौम्य आर्द्रतामें यहां सदैव । निर्माण होते हैं अश्विनी देव ।
तथा श्रोत्रोंमें होते हैं पांडव । वायु अनेक ॥ ४४ ॥
एकेक रूपके ऐसे खेल । सृजते सुर-सिद्धके कुल ।
ऐसे अपार तथा विशाल । देखो वहां रूप ॥ ४५ ॥
जिसको कहनेमें वेद तुतलाता । देखनेमें कालका आयुष्य खूटता ।
विधाताको भी उसका नहीं लगता । ठौर ठिकान ॥ ४६ ॥
तीनों देवोंने न सुनी एक । उसको तू प्रत्यक्षमें देख ।
भोग जो अचरज अनेक । योग-वैभव महा ॥ ४७ ॥
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥ ७ ॥
इस आकृतिके तू किरीटी । रोम-मूलमें है देख सृष्टि ।
सुर-तरुके तलकी मिट्टी । सृजती तृणांकुर ॥ ४८ ॥
तथा पवनका प्रकाश जैसे । दिखाता उड़ते परमाणु-से ।
भ्रमते यहां ब्रह्मांड भी वैसे । अंगके सांधोंमें ॥ ४९ ॥
यहांका प्रत्येक अवयव । दिखाता है सविस्तर विश्व ।
औ' विश्वके पार भी पांडव । देखना चाहो ॥ १५० ॥

देखो अब यहां सारा विश्व तू सचराचर ।
एकत्र देहमें मेरे इच्छा दर्शन है तुझे ॥ ७ ॥
(44) ३४५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

किसी भी बातकी अपूर्णता । कोई नहीं है यहां सर्वथा ।
देख सुखसे जो तुझे भाता । मेरे तनमें तू ॥ ५१ ॥
विश्व-मूर्ति उससे ऐसे । बोली जो अति कारुण्यसे ।
तो दीखता या नहीं ऐसे । न कहता रहा मौन ॥ ५२ ॥
रहा क्यों भला यह ऐसा मौन । सोचकर देखता यह जनार्दन ।
तब भी इच्छा-भूषित अर्जुन । खडा है उत्कंठित ॥ ५३ ॥
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामिते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८ ॥
उतरा नहीं है उत्कंठोन्माद । न मिला अब भी स्वर्ग सुखद ।
आकलन नहीं होता विशद् । मेरा रूप ॥ ५४ ॥
अर्जुनको विश्व-रूप देखनेके लिये दिव्य-दृष्टि दी—
हंसा देव यह सोचकर । कहने लगा जो हंसकर ।
“हमने दिखाया रूप पर । तू देखता ही नहीं” ॥ ५५ ॥
बोला तब अर्जुन विलक्षण । यह किसके दोषके कारण ।
बगलेको देता है सुलक्षण । चंद्रामृत तू ॥ ५६ ॥
दिखाता सुंदर दर्पण । जन्मांधको तू है श्रीकृष्ण ।
सुनाता तू मधुर बीन । बहरेको जो ॥ ५७ ॥
मकरंद-कणोंका चारा । कहता है तू दादुरसे चर ।
व्यर्थ मानकर क्यों शार्गधर । बिगडता अब ॥ ५८ ॥
शास्त्रोंसे यह अतींद्रिय घोषित । ज्ञान-दृष्टिका जो विषय निश्चित ।
कहता इसे देखेंगे कैसे पार्थ । चर्म-चक्षु ॥ ५९ ॥
यह मेरा व्यंग नहीं बोलना । मुझे अपना सहन करना ।
यह सुन कहता जनार्दन । सच है यह ॥ १६० ॥
किंतु तू चर्म-चक्षूसे न देख सकता मुझे ।
ले दिव्य दृष्टि है मेरी ईश्वरी योग देख तू ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४६

यह स्वरूप यदि दिखाना होता । दी होती पहले ही यह योग्यता ।
बोलनेमें मैं प्रेमसे स्वभावता । भूल गया हूं ॥ ६१ ॥
पहले जुताईके बुवाईसे । थकावट भई व्यर्थ इससे ।
अब देता दिव्य-दृष्टि इससे । देखो निज-रूप ॥ ६२ ॥
इस दृष्टिसे फिर तू अर्जुन । हमारा ऐश्वर्य-योग संपूर्ण ।
देखके उसे करो संगोपन । अपने अनुभवमें ॥ ६३ ॥
ऐसा वह वेदांत-वेद्य । सकल लोकका जो आद्य ।
जगताका जो है आराध्य । कहने लगा ॥ ६४ ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ ९ ॥
अर्जुनका महा-भाग्य-
सुन तू कौरव-कुल-तिलक । विस्मय है मुझे इसी बातका ।
है क्या लक्ष्मीसे भुवनत्रयका । दूसरा भाग्यवान ॥ ६५ ॥
अथवा तत्व-विवेचनार्थ । है क्या कोई वेदसे समर्थ ।
सेवामें शेषसे भी विश्वस्थ । दूसरा कौन है ? ॥ ६६ ॥
उसके लिये ऐसे कष्ट सहन । करते हैं जो योगियोंके समान ।
अनुसरणमें बना है वाहन । गरुड सतत ॥ ६७ ॥
उन सबको है परे हटाया । जबसे पांडवोंका जन्म भया ।
कृष्ण-सुख सब सहज आया । इनके भागमें ॥ ६८ ॥
इन पांचोंमें भी जो अर्जुन । कृष्ण जैसे उसके आधीन ।
कामुक होता है अनुदिन । कामिनी-संग ॥ ६९ ॥
संजयने कहा
ऐसा बोल कुरु-श्रेष्ठ महायोगेश कृष्णने ।
दिखाया अपना श्रेष्ठ ईश्वरी-रूप पार्थको ॥ ९ ॥
३४७ विश्व रूप-दर्शनयोग

सिखाया गया पंछी ऐसा न बोलता । क्रीड़ा-रंत मृग भी ऐसा न चलता ।
पार्थके दैवका उत्कर्ष जो दीखता । यहां अकथनीय ॥ १७० ॥
पर-ब्रह्म यह आज है संपूर्ण । भोगार्थ सिद्ध इसके ही नयन ।
इसकी बातका दुलार श्रीकृष्ण । करता है यहां ॥ ७१ ॥
पार्थ कोपता तब वह शांत रहता । यह रूसता तब वह है समझाता ।
अर्जुनसे पगलाया है जगन्नाथ । निश्चित रूपसे ॥ ७२ ॥
जनमें हैं वैसे विषय जीतकर । शुकादि पुरुष जो श्रेष्ठ मुनिवर ।
रह गये हैं लीला गाकर सुंदर । भाटोंके समान ॥ ७३ ॥
और योगियोंका समाधि-धन । हो रहा है पार्थके आधीन ।
देख यह विस्मित होता है मन । महाराज मेरा ॥ ७४ ॥
संजय कहता है कौरवेश । इसमें विस्मय नहीं खास ।
कृष्ण करलें जिसे अपना-सा । भाग्योदय उसका ॥ ७५ ॥
कहता है इसलिये देवराज । यह दिव्य-दृष्टि ले तू पार्थ आज ।
इससे देख विश्व-रूप सहज । पूर्ण रूपसे ॥ ७६ ॥
श्रीमुखके ऐसे अक्षर । निकले जिस अवसर ।
मिटा अविद्याका अंधार । उसी क्षणमें ॥ ७७ ॥
अक्षर नहीं थे वे देख । था ब्रह्म-साम्राज्य-दीपक ।
अर्जुनार्थ थी चित्कलिका । जगादी श्रीकृष्णने ॥ ७८ ॥
संपूर्ण ब्रह्मांड ही विश्व-रूपसे भर गया—
प्रकटे जो दिव्य-चक्षु फिर । ज्ञान-दृष्टिका फूटा अंकुर ।
तथा दिखाया है सविस्तर । ऐश्वर्य-योग ॥ ७९ ॥
अवतार हैं ये जो सकल । उस महा-सिंधुके कल्लोल ।
विश्व दीखता है मृगजल । उसके किरणोंसे ॥ १८० ॥
उचित उस अनादि भूमिका पर । प्रकट होता है चित्र स-चराचर ।
अपने आप अपनेमें दामोदर । दिखाता उसको ॥ ८१ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४८

बचपनमें श्रीपतिने जब । इकबार माटी खायी थी तब ।
माताने क्रोधसे पकड़ी खज्ज । कड़ाई इसकी ॥ ८२ ॥
इसने तब डरके ऐसे । मुख दिखानेके बहानेसे ।
माताको दिखाया था धीरेसे । ब्रह्मांड सारा ॥ ८३ ॥
या मधु-वनमें ध्रुवको जैसे । गंडस्थलको शंख लगानेसे ।
वेद-मति भी कुंठित हो ऐसे । स्तवन किया उसने ॥ ८४ ॥
अनुग्रह वैसे कुरुपति । पार्थ पर करता श्रीपति ।
जानती नहीं है अब मति । माया उसकी ॥ ८५ ॥
प्रकट हुवा यकायक योगैश्वर्य । कल्पांतमें होता जैसे जल-प्रलय ।
विस्मयमें डूबा चित उस समय । धनंजयका ॥ ८६ ॥
आ-ब्रह्म उदकसे जैसे व्याप्त था । अकेला मार्कडेय ही तैरता था ।
विश्व-रूप विस्मयमें वैसे पार्थ । लगा लोटने ॥ ८७ ॥
अजी ! कितना था यहां गगन । कौन ले गया वह जो महान ।
कहें सब चराचर अर्जुन । औ' महाभूत भी ॥ ८८ ॥
मिट गया दिशाओंका नाम-निशान । तना नहीं होता अध-ऊर्ध्वका ज्ञान ।
जागृतिसे लुप्त होता है स्वप्न । वैसे लोकाकार ॥ ८९ ॥
जैसे अनेक सूर्य-तेज प्रताप । करता स-चंद्र तारागण लोप ।
वैसे निगल गया है विश्व-रूप । प्रपंच सर्वस्व ॥ १९० ॥
नहीं स्फुरता मनमें तब मनत्व । नहीं संभालता अपनेको बुद्धित्व ।
लौट आया इंद्रियोंका इंद्रियत्व । हृदयमें ही ॥ ९१ ॥
केवळ वहां स्तब्ध स्तब्धता । एकाग्र है स्वयं एकाग्रता ।
पडी जैसे संमोहनावस्था । विचारोंपर ॥ ९२ ॥
देखता था वह ऐसा हो विस्मित । सम्मुख था चतुर्भुज रूप स्थित ।
नाना रूप ले वही था सुसज्जित । चहूँ ओर ॥ ९३ ॥
होते जैसे वर्षा-ऋतुके बादल । या महा-प्रलयके तेजोमंडल ।
वह रूप वैसा सर्वत्र सकल । भर रहा था एक-मात्र ॥ ९४ ॥
३४९ विश्व-रूप-दर्शनयोग

प्रथम स्वरूप समाधान । होकर रहा वह अर्जुन ।
खुले फिर उसने लोचन । देखा विश्व-रूप ॥ ९५ ॥
देखना इन्ही नयनोंसे । विश्व-रूप संपूर्ण ऐसे ।
वह दुलार भी कृष्णसे । हुआ पूर्ण ॥ ९६ ॥
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १० ॥
विश्व-रूपकी अद्भुतता--
देखता तब वहां अनेक वदन । जैसे रमा-रमणके राज-भवन ।
प्रकट हुए अनेकानेक निधान । लावण्य श्रियाके ॥ ९७ ॥
या आनंद-वनमें आया बहार । या सौंदर्य राज्य मिले हैं अपार ।
वैसे देखता वदन मनोहर । श्रीहरिका वह ॥ ९८ ॥
उसमें भी थे जो अनेक । सहज अति भयानक ।
प्रलय-रात्रीके कटक । उठ आया है ॥ ९९ ॥
या मृत्युके ये मुख उत्पन्न । भयके दुर्ग रचे विभिन्न ।
या प्रलयाग्निके ये हवन- । कुंड खुले हैं ॥ २०० ॥
ऐसे अद्भुत औ' भयंकर । देखता है रूप धनुर्धर ।
कई सालंकृत औ' सुंदर । तथा सौम्य भी ॥ १ ॥
ज्ञान-चक्षुसे किया अवलोकन । किंतु न होता मुखोंका अंत न जान ।
स-कौतुक देखने लगा नयन । विश्व रूपके ॥ २ ॥
नाना वर्णका मानो कमल-वन । विकसित हो रहा था यह जान ।
आदित्य-समुदायसे वे नयन । देखने लगा पार्थ ॥ ३ ॥
जैसे कृष्ण मेघ-घटाओंमें । कौंधती बिजली प्रलयमें ।
वैसी देखी भ्रू-भंग तलमें । पिंगलानलकी ॥ ४ ॥
अनेक मुख औ' आंखें जिसमें अति अद्भुत ।
बहु दिव्य अलंकार अनेक दिव्य आयुध ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी ३५०

देखनेमें आश्चर्य एकैक । उसी विश्व-रूपमें जो एक ।
अनेकताका दर्शन-सुख । हुआ फल-प्रद ॥ ५ ॥
कहां हैं इसके चरण । कहां है मुकुट विस्तीर्ण ।
बढ़ती इच्छा प्रतिक्षण । देखनेकी ॥ ६ ॥
रखी वहां भाग्य-निधि पार्थ । होंगे कैसे निष्फल मनोरथ ।
रखता क्या भातेमें बाण व्यर्थ । पिनाकपाणी ॥ ७ ॥
नहीं तो ब्रह्मदेवकी गिरापर । होते हैं क्या झूटे अक्षर ।
इसीलिये साद्यंत जो है अपार । देखा विश्व-रूप ॥ ८ ॥
नहीं होता जो वेदको आकलन । उसका सकलावयव दर्शन ।
एक समय करते हैं नयन । धनंजयके ॥ ९ ॥
चरणोंसे मुकुट पर्यंत । देखता है रूप-श्रेष्ठ पार्थ ।
नाना रत्नालंकार भूषित । झलक सुंदर ॥ २१० ॥
पर-ब्रह्म बना स्वयं भूषण । सजानेके लिये अपना तन ।
उन अलंकारोंका मैं वर्णन । करूं कैसे ॥ ११ ॥
उसकी जो प्रभा अतीव उज्ज्वल । निखारती थी चंद्रादित्य मंडल ।
थी जो वह महातेजकी चित्कला । उससे प्रकटता विश्व ॥ १२ ॥
वह जो दिव्य-तेज शृंगार । किसीकी बुद्धिको हो गोचर ।
पहना हरि ने अलंकार । देखता पार्थ ॥ १३ ॥
शरीर था वही अलंकार । जो है हाथ वही हथियार ।
जो है शरीरी वही शरीर । स-चराचरमें वही ॥ १४ ॥
वही फिर ज्ञान दृष्टिसे निर्मल । देखता कर-पल्लव जो सरल ।
वहां तोडते जो कल्पांतक ज्वाल । ऐसे शस्त्र करमें ॥ १५ ॥
उसके किरणोंके स्फुलिंग । नक्षत्रोंको बनाते जो मूंग ।
उसके तेजमें छिपी आग । घुसती सिंधुमें ॥ १६ ॥
फिर कालकूट कल्लोलके तरंग । अथवा विद्युतवनके विस्फुलिंग ।
दीखते हैं कर-पल्लव अभंग । उचितायुध-युक्त ॥ १७ ॥
३५१ विश्व-रूप-दर्शनयोग

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥
विश्वरूपकी भयानकतासे विह्वल होकर दृष्टि मूंद लेना—
उस भयसे हटाकर दृष्टि । देखता कंठ मुकुट किरीटी ।
हुई है सुरतरुकी जो सृष्टि । मानो वहींसे ॥ १८ ॥
मूल-सिद्धीका जहां महा-पीठ । शांत कमलाका विश्राम मठ ।
ऐसे सुमनों से वह किरीट । सजा हुआ ॥ १९ ॥
मुकुट पर पुष्प स्तवक । तथा पूजा अंध जो अनेक ।
गलेमें झूलते अलौकिक । पुष्पहार ॥ २२० ॥
सूर्य तेजसे स्वर्गको लपेटना । मेरु-गिरिको सुवर्णसे ओढ़ना ।
वैसा था उसका भव्य पहनना । पीतांबर सुंदर ॥ २१ ॥
शंकरको कर्पूरसे लेपना । कैलासको पारदसे पोतना ।
अथवा सागरको ही ओढ़ना । क्षीरार्णवसे ॥ २२ ॥
अजी ! चंद्रमाकी तह खोलकर । आवरण डालना आकाशपर ।
वैसे ही था उसके सर्वांग पर । चंदन लेपन ॥ २३ ॥
स्व-प्रकाशकी आभा जिससे बढ़ती । तथा ब्रह्मानंदकी उष्णता मिटती ।
पृथ्वी है अपना अस्तित्व टिकाती । उस सुगंधसे ॥ २४ ॥
ब्रह्मा जिसका लेपन करता । अनंग भी उबटन करता ।
उस परिमलकी जो महत्ता । बखाने कौन ॥ २५ ॥
ऐसी अंगर शोभा देखकर । विस्मित-सा रहा पांडुकुमार ।
यह भी न समझा देखकर । देव बैठा है या सोया है ? ॥ २६ ॥
दृष्टि खोलकर देखता बाहर । जब वही विश्व-रूप सभी ओर ।
आंख मूंदकर देखता ऊपर । तब भी वही रूप ॥ २७ ॥
सम्मुख देखें मुख अगणित । पीछे मुड देखा हो भयग्रस्त ।
वहां भी वही मुख पाया हाथ । तथा दिव्य-रूप ॥ २८ ॥
दिव्य वस्त्र पुष्प माला भूषित दिव्य गंधसे ।
सब आश्चर्यसे पूर्ण विश्व-व्यापी अनंत जो ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी ३५२

देखनेसे दीखना है स्वाभाविक । ना कछु इसमें विस्मय-जनक ।
किंतु न देखते भी दीखना एक । महादाश्चर्य ॥ २९ ॥
अनुग्रहकी यह कैसी करतूत । देखता या नहीं देखता वह पार्थ ।
उसके सह कर लिया आच्छादित । नारायणने ॥ २३० ॥
पड़कर विस्मय प्रवाहमें । निकलकर किनारा छूनेमें ।
उलझता आश्चर्य सागरमें । अनायास ॥ ३१ ॥
ऐसे ही उस अनंत-रूपके । अलौकिक दर्शन-कौशल्यके ।
जालमें धनंजय उलझके । हो रहा विस्मित ॥ ३२ ॥
श्री कृष्ण विश्वतोमुख स्वभावसे । दर्शनार्थी जो पार्थकी प्रार्थनासे ।
विश्वरूप हुआ है संपूर्णतासे । इस समय ॥ ३३ ॥
दीप या सूर्य-तेजमें है देखती । या आंख मूंदनेसे नहीं देखती ।
वह दिव्य-दृष्टि ऐसी नहीं थी । दी जो श्रीकृष्णने ॥ ३४ ॥
पार्थ देखता तब दोनों ओर । आंख खोलकर या मूंदकर ।
कहता नगरमें बैठकर । संजय राजासे ॥ ३५ ॥
कहता है “सुनो” यह संजय । विश्व-रूप देखता धनंजय ।
नानाभरणयुत स-विस्मय । विश्वतोमुख ॥ ३६ ॥
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ १२ ॥
अनंत सूर्योंसे भी वह तेजस्वी रूप --
उस देवके जो अंग-प्रभाकी । बात कहनी है सो कहनेकी ।
जैसे द्वादशादित्य मिलनकी । प्रभा-सी कल्पांतमें ॥ ३७ ॥
अजी ! सहस्रावधि दिव्य-सूर्य । उदय हुए एक ही समय ।
फिर भी है वह अनुपमेय । उस दिव्य-प्रभासे ॥ ३८ ॥
प्रभा सहस्र सूर्योंकी नभमें एक हो दिखे ।
तभी उस महात्माकी प्रभासे तुल्य है नहीं ॥ १२ ॥
३५३
(45) विश्व-रूप-दर्शनयोग

सभी विद्युल्लताओका हो मिलन । तथा प्रलयाग्निके सारे सामान ।
उसीमें जो दश-तेजोंका मिलान । करने पर भी ॥ ३९ ॥
उस शरीर-कांतिके सम्मुख । पास पास आएगा देख ।
किंतु उसके सम नहीं चोख । यह निश्चित ॥ २४० ॥
ऐसा महात्म्य उसका सहज । फैलता है अंगका सब तेज ।
व्यासकी कृपासे मैं वह आज । यहां देखता हूँ ॥ ४१ ॥
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ १३ ॥
दृश्य और दृष्टाका अद्वय-भाव—
उस विश्व-रूपमें एक ओर । जगत है अपना सविस्तर ।
रहते जैसे बुल्ले ठौर ठौर । महा-सागरमें ॥ ४२ ॥
अथवा आकाशमें गंधर्व-नगर । भूतलमें पिपीलिका बांधती घर ।
तथा परमणु मेरु-पर्वतपर । उड़ते रहते हैं ॥ ४३ ॥
इस भांति विश्व अपरंपार । देव चक्रवर्तिके तन पर ।
उस अवसर पांडुकुमार । देखता है ॥ ४४ ॥
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ १४ ॥
एक विश्व वहां और एक आप । ऐसा दुजा भाव था जो अल्प स्वल्प ।
उसका भी अंतःकरणमें लोप । हुवा अचानक ॥ ४५ ॥
जागृत हुआ ब्रह्मानंद अंदर । शरीर बल खोया यहां बाहर ।
डूबा आनंद पुलकमें शरीर । अपाद्-मस्तक ॥ ४६ ॥
विश्वके जो सभी भेद जैसे घुल गये तब ।
अर्जुनने वहां देखे देहमें देवदेवके ॥ १३ ॥
फिर अर्जुन साश्चर्य हर्ष रोमांच गात्रसे ।
प्रभुसे जोडके हाथ बोला हो नत मस्तक ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी ३५४

वर्षाका जैसे प्रथम काल । सर्वांग हरा होता है शैल ।
वैसे रोम-कूपमें सकल । खिले रोमद्रुम ॥ ४७ ॥
स्पर्श होते ही चंद्रकिरण । होता सोम-कांतका द्रवण ।
तन पर वैसे स्वेद-कण । उमड़ आये ॥ ४८ ॥
फंस जानेसे जैसे अलिकुल । झूलती कमल कलि सकल ।
हृदय-आनंदोर्मियोंके बल । सिहरता वैसे ॥ ४९ ॥
कर्पूर-केलिका गर्भ-पुट जैसे । छीलकर कर्पूर चूता वैसे ।
अर्जुनके नयन-कमलोंसे । चूते अश्रुकण ॥ २५० ॥
सात्त्विकताके ये जब अष्ट भाव । परस्परमें करते हैं उछाह ।
पाता है तब ब्रह्मानंदका जीव । दिव्य-साम्राज्य ॥ ५१ ॥
उदित होते ही सुधाकर । सानंद उमड़ता सागर ।
बार बार वैसे ऊर्मि भर । आती हृदयमें ॥ ५२ ॥
अजी ! सुखानुभवके कारण । कृपासे किया था द्वैत रक्षण ।
आह भर करके प्रतिक्षण । देखता पार्थ ॥ ५३ ॥
मुख कर बैठा था जिस ओर । उसी ओर मस्तक नवाकर ।
प्रणाम किया हाथ जोड कर । औ' किया स्तवन ॥ ५४ ॥
अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-
मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥ १५ ॥
अर्जुनने कहा
हे देव देखूं तव देहमें मैं
हैं देव औ' भूत समूह सारा ।
ध्यानस्थ ब्रह्मा कमलासनस्थ
महर्षि औ' नाग हैं एक साथ ॥ १५ ॥
३५५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

सर्वत्र सभी तू ही तू भरा है प्रभो—
कहता है प्रभो तेरी जय जय । तब कृपासे ही यह धनंजय ।
दर्शन कर सका इस समय । यह विश्व-रूप ॥ ५५ ॥
सच ही प्रभो तूने भला किया । हृदय यह आनंदित भया ।
तू ही है यह मैंने देख लिया । आश्रय विश्वका ॥ ५६ ॥
अनेक वन जैसे मंदार पर । श्वापदों सह लगे हैं ठौर ठौर ।
वैसे ही यहाँ तेरे शरीर पर । भुवन हैं अनेक ॥ ५७ ॥
अथवा गोदमें आकाशके । दीखते हैं मंडल ग्रहोंके ।
होते हैं झुण्ड पक्षी-कुलके । वृक्ष पर ॥ ५८ ॥
उसी भांति हे चक्रधर । विश्वात्मक तेरा शरीर ।
स्वर्गकेलिये भी है घर । देव गणोंके ॥ ५९ ॥
स्वामी ! महाभूतोंका पंचक । देखता हूं मैं यहां अनेक ।
तथा भूत-ग्राम जो अनेक । भूत-सृष्टिके ॥ २६० ॥
तुझमें दीखता है सत्य-लोक । बैठा है ब्रह्म-देव चतुर्मुख ।
वहां उस ओर कैलास एक । देखता मैं ॥ ६१ ॥
भवानी सह महादेव । तुझमें तू दीखता केशव ।
एकांशमें तुझमें ये सर्व । दीखते यहां ॥ ६२ ॥
वैसे ही कश्यपादि ऋषि-कुल । दीखते इस मूर्तिमें सकल ।
दीखते हैं यहां सप्त पाताल । शेष-नाग सह ॥ ६३ ॥
अथवा मानो त्रिभुवन-पति । तेरे अंगांगकी एकेक भित्ति ।
चतुर्दश भुवन चित्राकृति । सजाती है ॥ ६४ ॥
तथा यहां दीखते जो जो लोक । मानो चित्र रचना है अनेक ।
गोचर होता यहां अलौकिक । तेरा गांभीर्य ॥ ६५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३५६

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६ ॥

देखता मैं दिव्य चक्षुसे । जहां तहां सभी ओरसे ।
भुजदंडमें भरे जैसे । महा आकाश ॥ ६६ ॥
वैसे एक ही निरंतर । देखनेसे हैं तेरे कर ।
करते संपूर्ण व्यापार । एक कालमें ॥ ६७ ॥
तथा ब्रह्मका है विस्तार । खोलता ब्रह्मांड भांडार ।
वैसा दीखता उदर । तेरा असीम ॥ ६८ ॥
कहते हैं सहस्रशीर्ष पुरुष । देखता मैं अनंत-शीर्ष पुरुष ।
लगता पर-ब्रह्म हो आया मुख । इसं समय ॥ ६९ ॥
जहां तहां देखता तेरे वदन । विश्व-रूपमें जो है विराजमान ।
वहीं दीखते हैं अनंत नयन । पंक्ति बद्ध हो ॥ २७० ॥
रहने दो यह स्वर्ग पाताल । तथा धरणी दिशा अंतराल ।
इसी रूपमें भरा है सकल । मूर्तिमय हो ॥ ७१ ॥
कहीं नहीं है तेरे बिन । परमाणु-सा रिक्त स्थान ।
यह देख कहता मन । कितना व्यापक तू ॥ ७२ ॥
नाना प्राणि जात सहित । भरे हुए जो महाभूत ।
तूने व्यापलिये अनंत । देखता मैं ॥ ७३ ॥

विश्व-रूपके संबंधमें अर्जुनकी जिज्ञासा—

अनेक आंखें मुख हाथ पेट
जहां तहां देखूं अनंत मूर्ति ।
दीखे नहीं अंत न मध्य मूल
विश्वेश्वरा जो तव विश्वरूप ॥ १६ ॥

३५७ विश्व-रूप-दर्शनयोग