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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 423

देखनेसे दीखना है स्वाभाविक । ना कछु इसमें विस्मय-जनक ।
किंतु न देखते भी दीखना एक । महादाश्चर्य ॥ २९ ॥
अनुग्रहकी यह कैसी करतूत । देखता या नहीं देखता वह पार्थ ।
उसके सह कर लिया आच्छादित । नारायणने ॥ २३० ॥
पड़कर विस्मय प्रवाहमें । निकलकर किनारा छूनेमें ।
उलझता आश्चर्य सागरमें । अनायास ॥ ३१ ॥
ऐसे ही उस अनंत-रूपके । अलौकिक दर्शन-कौशल्यके ।
जालमें धनंजय उलझके । हो रहा विस्मित ॥ ३२ ॥
श्री कृष्ण विश्वतोमुख स्वभावसे । दर्शनार्थी जो पार्थकी प्रार्थनासे ।
विश्वरूप हुआ है संपूर्णतासे । इस समय ॥ ३३ ॥
दीप या सूर्य-तेजमें है देखती । या आंख मूंदनेसे नहीं देखती ।
वह दिव्य-दृष्टि ऐसी नहीं थी । दी जो श्रीकृष्णने ॥ ३४ ॥
पार्थ देखता तब दोनों ओर । आंख खोलकर या मूंदकर ।
कहता नगरमें बैठकर । संजय राजासे ॥ ३५ ॥
कहता है “सुनो” यह संजय । विश्व-रूप देखता धनंजय ।
नानाभरणयुत स-विस्मय । विश्वतोमुख ॥ ३६ ॥
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ १२ ॥
अनंत सूर्योंसे भी वह तेजस्वी रूप --
उस देवके जो अंग-प्रभाकी । बात कहनी है सो कहनेकी ।
जैसे द्वादशादित्य मिलनकी । प्रभा-सी कल्पांतमें ॥ ३७ ॥
अजी ! सहस्रावधि दिव्य-सूर्य । उदय हुए एक ही समय ।
फिर भी है वह अनुपमेय । उस दिव्य-प्रभासे ॥ ३८ ॥
प्रभा सहस्र सूर्योंकी नभमें एक हो दिखे ।
तभी उस महात्माकी प्रभासे तुल्य है नहीं ॥ १२ ॥
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(45) विश्व-रूप-दर्शनयोग