ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउसका तथा मोहका मिलन । है यह व्यर्थ-बातका कथन ।
मृगजलसे होगा क्या शमन । वडवानलका ॥ ६६ ॥
तथा जो मैं हूं तब श्रीकृष्ण । पाके कृपाका अंतःकरण ।
करता हूं सानंद भोजन । ब्रह्म-रसका ॥ ६७ ॥
इससे हुवा मेरा मोह निवारण । इसमें क्या भला विस्मयका कारण ।
इससे हुवा मेरा उद्धार श्रीकृष्ण । तेरे चरणोंकी सौगंध ॥ ६८ ॥
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २ ॥
अर्जुनकी आंतरिक द्विविधा—
अजी ! हे कमल-नयन । कोटि-सूर्य-तेज वदन ।
मैंने तुझसे जनार्दन । सुना है आज ॥ ६९ ॥
प्रकृतिसे उत्पन्न भूत-जात । वैसे प्रकृतिमें उसका अंत ।
कैसा होता है जो प्राकृत । कहा है देवने ॥ ७० ॥
प्रकृतिका दिया संपूर्ण-ज्ञान । बताया ब्रह्मका वसति-स्थान ।
जिसको ओढ करके महान् । हुए हैं वेद ॥ ७१ ॥
ज्ञान-राशीको जो बढाता । धर्म-रत्नोंको प्रसवता ।
वेद है आश्रय करता । तेरे स्वरूपका ॥ ७२ ॥
ऐसा अगाध है महात्म्य । जो सकल मार्गैक्य-गम्य ।
तथा है स्वानुभव रम्य । दिखाया मुझे ॥ ७३ ॥
हटाकरके सब बादल । दिखाते जैसे सूर्य-मंडल ।
सेवार हटाकर निर्मल । जल दिखाते हैं ॥ ७४ ॥
छुडानेसे सांपकी जकडन । होता जैसे चंदन-दर्शन ।
या करनेसे पिशाचोच्चाटन । मिलती भूमिस्थ निधि ॥ ७५ ॥
उत्पत्ति नाश भूतोंका सुना मैंने सविस्तर ।
अभंग महिमा वैसे तेरे ही मुखसे प्रभु ॥ २ ॥
ज्ञानेश्वरी ३३८