ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्वत्र सभी तू ही तू भरा है प्रभो—
कहता है प्रभो तेरी जय जय । तब कृपासे ही यह धनंजय ।
दर्शन कर सका इस समय । यह विश्व-रूप ॥ ५५ ॥
सच ही प्रभो तूने भला किया । हृदय यह आनंदित भया ।
तू ही है यह मैंने देख लिया । आश्रय विश्वका ॥ ५६ ॥
अनेक वन जैसे मंदार पर । श्वापदों सह लगे हैं ठौर ठौर ।
वैसे ही यहाँ तेरे शरीर पर । भुवन हैं अनेक ॥ ५७ ॥
अथवा गोदमें आकाशके । दीखते हैं मंडल ग्रहोंके ।
होते हैं झुण्ड पक्षी-कुलके । वृक्ष पर ॥ ५८ ॥
उसी भांति हे चक्रधर । विश्वात्मक तेरा शरीर ।
स्वर्गकेलिये भी है घर । देव गणोंके ॥ ५९ ॥
स्वामी ! महाभूतोंका पंचक । देखता हूं मैं यहां अनेक ।
तथा भूत-ग्राम जो अनेक । भूत-सृष्टिके ॥ २६० ॥
तुझमें दीखता है सत्य-लोक । बैठा है ब्रह्म-देव चतुर्मुख ।
वहां उस ओर कैलास एक । देखता मैं ॥ ६१ ॥
भवानी सह महादेव । तुझमें तू दीखता केशव ।
एकांशमें तुझमें ये सर्व । दीखते यहां ॥ ६२ ॥
वैसे ही कश्यपादि ऋषि-कुल । दीखते इस मूर्तिमें सकल ।
दीखते हैं यहां सप्त पाताल । शेष-नाग सह ॥ ६३ ॥
अथवा मानो त्रिभुवन-पति । तेरे अंगांगकी एकेक भित्ति ।
चतुर्दश भुवन चित्राकृति । सजाती है ॥ ६४ ॥
तथा यहां दीखते जो जो लोक । मानो चित्र रचना है अनेक ।
गोचर होता यहां अलौकिक । तेरा गांभीर्य ॥ ६५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३५६