ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबचपनमें श्रीपतिने जब । इकबार माटी खायी थी तब ।
माताने क्रोधसे पकड़ी खज्ज । कड़ाई इसकी ॥ ८२ ॥
इसने तब डरके ऐसे । मुख दिखानेके बहानेसे ।
माताको दिखाया था धीरेसे । ब्रह्मांड सारा ॥ ८३ ॥
या मधु-वनमें ध्रुवको जैसे । गंडस्थलको शंख लगानेसे ।
वेद-मति भी कुंठित हो ऐसे । स्तवन किया उसने ॥ ८४ ॥
अनुग्रह वैसे कुरुपति । पार्थ पर करता श्रीपति ।
जानती नहीं है अब मति । माया उसकी ॥ ८५ ॥
प्रकट हुवा यकायक योगैश्वर्य । कल्पांतमें होता जैसे जल-प्रलय ।
विस्मयमें डूबा चित उस समय । धनंजयका ॥ ८६ ॥
आ-ब्रह्म उदकसे जैसे व्याप्त था । अकेला मार्कडेय ही तैरता था ।
विश्व-रूप विस्मयमें वैसे पार्थ । लगा लोटने ॥ ८७ ॥
अजी ! कितना था यहां गगन । कौन ले गया वह जो महान ।
कहें सब चराचर अर्जुन । औ' महाभूत भी ॥ ८८ ॥
मिट गया दिशाओंका नाम-निशान । तना नहीं होता अध-ऊर्ध्वका ज्ञान ।
जागृतिसे लुप्त होता है स्वप्न । वैसे लोकाकार ॥ ८९ ॥
जैसे अनेक सूर्य-तेज प्रताप । करता स-चंद्र तारागण लोप ।
वैसे निगल गया है विश्व-रूप । प्रपंच सर्वस्व ॥ १९० ॥
नहीं स्फुरता मनमें तब मनत्व । नहीं संभालता अपनेको बुद्धित्व ।
लौट आया इंद्रियोंका इंद्रियत्व । हृदयमें ही ॥ ९१ ॥
केवळ वहां स्तब्ध स्तब्धता । एकाग्र है स्वयं एकाग्रता ।
पडी जैसे संमोहनावस्था । विचारोंपर ॥ ९२ ॥
देखता था वह ऐसा हो विस्मित । सम्मुख था चतुर्भुज रूप स्थित ।
नाना रूप ले वही था सुसज्जित । चहूँ ओर ॥ ९३ ॥
होते जैसे वर्षा-ऋतुके बादल । या महा-प्रलयके तेजोमंडल ।
वह रूप वैसा सर्वत्र सकल । भर रहा था एक-मात्र ॥ ९४ ॥
३४९ विश्व-रूप-दर्शनयोग