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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 421

देखनेमें आश्चर्य एकैक । उसी विश्व-रूपमें जो एक ।
अनेकताका दर्शन-सुख । हुआ फल-प्रद ॥ ५ ॥
कहां हैं इसके चरण । कहां है मुकुट विस्तीर्ण ।
बढ़ती इच्छा प्रतिक्षण । देखनेकी ॥ ६ ॥
रखी वहां भाग्य-निधि पार्थ । होंगे कैसे निष्फल मनोरथ ।
रखता क्या भातेमें बाण व्यर्थ । पिनाकपाणी ॥ ७ ॥
नहीं तो ब्रह्मदेवकी गिरापर । होते हैं क्या झूटे अक्षर ।
इसीलिये साद्यंत जो है अपार । देखा विश्व-रूप ॥ ८ ॥
नहीं होता जो वेदको आकलन । उसका सकलावयव दर्शन ।
एक समय करते हैं नयन । धनंजयके ॥ ९ ॥
चरणोंसे मुकुट पर्यंत । देखता है रूप-श्रेष्ठ पार्थ ।
नाना रत्नालंकार भूषित । झलक सुंदर ॥ २१० ॥
पर-ब्रह्म बना स्वयं भूषण । सजानेके लिये अपना तन ।
उन अलंकारोंका मैं वर्णन । करूं कैसे ॥ ११ ॥
उसकी जो प्रभा अतीव उज्ज्वल । निखारती थी चंद्रादित्य मंडल ।
थी जो वह महातेजकी चित्कला । उससे प्रकटता विश्व ॥ १२ ॥
वह जो दिव्य-तेज शृंगार । किसीकी बुद्धिको हो गोचर ।
पहना हरि ने अलंकार । देखता पार्थ ॥ १३ ॥
शरीर था वही अलंकार । जो है हाथ वही हथियार ।
जो है शरीरी वही शरीर । स-चराचरमें वही ॥ १४ ॥
वही फिर ज्ञान दृष्टिसे निर्मल । देखता कर-पल्लव जो सरल ।
वहां तोडते जो कल्पांतक ज्वाल । ऐसे शस्त्र करमें ॥ १५ ॥
उसके किरणोंके स्फुलिंग । नक्षत्रोंको बनाते जो मूंग ।
उसके तेजमें छिपी आग । घुसती सिंधुमें ॥ १६ ॥
फिर कालकूट कल्लोलके तरंग । अथवा विद्युतवनके विस्फुलिंग ।
दीखते हैं कर-पल्लव अभंग । उचितायुध-युक्त ॥ १७ ॥
३५१ विश्व-रूप-दर्शनयोग