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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 415, कुल 1172 में से

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पृष्ठ 415

विश्वरूपमें अनेक देवताओंका दर्शन—
खुलती है जहां दृष्टि । फैलती है आदित्य-सृष्टि ।
मिटती है जहां दृष्टि । होता अस्त ॥ ४१ ॥
मुखसे निकल हुआ फूत्कार । लेकरके ज्वालाओंका आकार ।
पावक आदि वसु समाधार । निर्माण करते ॥ ४२ ॥
जहां भ्रू-लताओंका अवसान । क्रोधसे होता रहता मिलन ।
वहां रुद्रोंके समूह उत्पन्न । होते हैं देख ॥ ४३ ॥
सौम्य आर्द्रतामें यहां सदैव । निर्माण होते हैं अश्विनी देव ।
तथा श्रोत्रोंमें होते हैं पांडव । वायु अनेक ॥ ४४ ॥
एकेक रूपके ऐसे खेल । सृजते सुर-सिद्धके कुल ।
ऐसे अपार तथा विशाल । देखो वहां रूप ॥ ४५ ॥
जिसको कहनेमें वेद तुतलाता । देखनेमें कालका आयुष्य खूटता ।
विधाताको भी उसका नहीं लगता । ठौर ठिकान ॥ ४६ ॥
तीनों देवोंने न सुनी एक । उसको तू प्रत्यक्षमें देख ।
भोग जो अचरज अनेक । योग-वैभव महा ॥ ४७ ॥
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥ ७ ॥
इस आकृतिके तू किरीटी । रोम-मूलमें है देख सृष्टि ।
सुर-तरुके तलकी मिट्टी । सृजती तृणांकुर ॥ ४८ ॥
तथा पवनका प्रकाश जैसे । दिखाता उड़ते परमाणु-से ।
भ्रमते यहां ब्रह्मांड भी वैसे । अंगके सांधोंमें ॥ ४९ ॥
यहांका प्रत्येक अवयव । दिखाता है सविस्तर विश्व ।
औ' विश्वके पार भी पांडव । देखना चाहो ॥ १५० ॥

देखो अब यहां सारा विश्व तू सचराचर ।
एकत्र देहमें मेरे इच्छा दर्शन है तुझे ॥ ७ ॥
(44) ३४५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

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