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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 413

भगवान उवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५ ॥
विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपकी जड़में एक सृष्टिका दर्शन, स्वभाव-विविधता—
तूने कहा अर्जुन दिखावो एक । उसीको दिखाया तो क्या रहा नेक ।
यहां भरा है जो सभी अब देख । मेरे ही रूपमें ॥ २३ ॥
एक कृश तो एक स्थूल । एक लघु एक विशाल ।
पृथुतर तथा विशाल । अमर्याद सब ॥ २४ ॥
एक अनावर तो एक प्रांजल । कुछ स-व्यापार तो कुछ निश्चल ।
कुछ उदासीन तो कुछ स्नेहल । कुछ हैं कठोर ॥ २५ ॥
कुछ उन्मन कुछ सावध । कुछ उथल कुछ अगाध ।
कुछ प्रसन्न तो कुछ क्रुद्ध । तथा मुक्त संकुचित ॥ २६ ॥
कुछ संत कुछ सदा-मद । कुछ स्तब्ध कुछ सानंद ।
गर्जन रत कुछ निःशब्द । तथा सौम्य भी ॥ २७ ॥
अभिलाषा-युत कुछ विरक्त । कुछ जागृत कुछ निद्रित ।
कुछ संतुष्ट कुछ है आर्त । अति उदार कुछ ॥ २८ ॥
कुछ अशस्त्र तो कुछ सशस्त्र । तथा अति रौद्र औ' अति-मित्र ।
कुछ तम-युत कुछ पवित्र । कुछ है समाधिस्थ ॥ २९ ॥
कयी जन लीला-विलास । औ' पालन-शील-लालस ।
संहारक कुछ सावेश । कुछ है साक्षि-भूत ॥ १३० ॥
नाना विध जो प्रकर्ष ऐसे । प्रकाशित जो दिव्य-तेजसे ।
वर्णमें भी जो एक एक-से । नहीं थे कोयी ॥ ३१ ॥
श्रीभगवानने कहा
देखो मेरे सभी रूप दिव्य शत सहस्र तू ।
नाना प्रकार आकार वर्ण भी जिसमें बहु ॥ ५ ॥
३४३ विश्व-रूप-दर्शनयोग