ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 416, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिसी भी बातकी अपूर्णता । कोई नहीं है यहां सर्वथा ।
देख सुखसे जो तुझे भाता । मेरे तनमें तू ॥ ५१ ॥
विश्व-मूर्ति उससे ऐसे । बोली जो अति कारुण्यसे ।
तो दीखता या नहीं ऐसे । न कहता रहा मौन ॥ ५२ ॥
रहा क्यों भला यह ऐसा मौन । सोचकर देखता यह जनार्दन ।
तब भी इच्छा-भूषित अर्जुन । खडा है उत्कंठित ॥ ५३ ॥
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामिते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८ ॥
उतरा नहीं है उत्कंठोन्माद । न मिला अब भी स्वर्ग सुखद ।
आकलन नहीं होता विशद् । मेरा रूप ॥ ५४ ॥
अर्जुनको विश्व-रूप देखनेके लिये दिव्य-दृष्टि दी—
हंसा देव यह सोचकर । कहने लगा जो हंसकर ।
“हमने दिखाया रूप पर । तू देखता ही नहीं” ॥ ५५ ॥
बोला तब अर्जुन विलक्षण । यह किसके दोषके कारण ।
बगलेको देता है सुलक्षण । चंद्रामृत तू ॥ ५६ ॥
दिखाता सुंदर दर्पण । जन्मांधको तू है श्रीकृष्ण ।
सुनाता तू मधुर बीन । बहरेको जो ॥ ५७ ॥
मकरंद-कणोंका चारा । कहता है तू दादुरसे चर ।
व्यर्थ मानकर क्यों शार्गधर । बिगडता अब ॥ ५८ ॥
शास्त्रोंसे यह अतींद्रिय घोषित । ज्ञान-दृष्टिका जो विषय निश्चित ।
कहता इसे देखेंगे कैसे पार्थ । चर्म-चक्षु ॥ ५९ ॥
यह मेरा व्यंग नहीं बोलना । मुझे अपना सहन करना ।
यह सुन कहता जनार्दन । सच है यह ॥ १६० ॥
किंतु तू चर्म-चक्षूसे न देख सकता मुझे ।
ले दिव्य दृष्टि है मेरी ईश्वरी योग देख तू ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४६