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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 427

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६ ॥

देखता मैं दिव्य चक्षुसे । जहां तहां सभी ओरसे ।
भुजदंडमें भरे जैसे । महा आकाश ॥ ६६ ॥
वैसे एक ही निरंतर । देखनेसे हैं तेरे कर ।
करते संपूर्ण व्यापार । एक कालमें ॥ ६७ ॥
तथा ब्रह्मका है विस्तार । खोलता ब्रह्मांड भांडार ।
वैसा दीखता उदर । तेरा असीम ॥ ६८ ॥
कहते हैं सहस्रशीर्ष पुरुष । देखता मैं अनंत-शीर्ष पुरुष ।
लगता पर-ब्रह्म हो आया मुख । इसं समय ॥ ६९ ॥
जहां तहां देखता तेरे वदन । विश्व-रूपमें जो है विराजमान ।
वहीं दीखते हैं अनंत नयन । पंक्ति बद्ध हो ॥ २७० ॥
रहने दो यह स्वर्ग पाताल । तथा धरणी दिशा अंतराल ।
इसी रूपमें भरा है सकल । मूर्तिमय हो ॥ ७१ ॥
कहीं नहीं है तेरे बिन । परमाणु-सा रिक्त स्थान ।
यह देख कहता मन । कितना व्यापक तू ॥ ७२ ॥
नाना प्राणि जात सहित । भरे हुए जो महाभूत ।
तूने व्यापलिये अनंत । देखता मैं ॥ ७३ ॥

विश्व-रूपके संबंधमें अर्जुनकी जिज्ञासा—

अनेक आंखें मुख हाथ पेट
जहां तहां देखूं अनंत मूर्ति ।
दीखे नहीं अंत न मध्य मूल
विश्वेश्वरा जो तव विश्वरूप ॥ १६ ॥

३५७ विश्व-रूप-दर्शनयोग