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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 425

वर्षाका जैसे प्रथम काल । सर्वांग हरा होता है शैल ।
वैसे रोम-कूपमें सकल । खिले रोमद्रुम ॥ ४७ ॥
स्पर्श होते ही चंद्रकिरण । होता सोम-कांतका द्रवण ।
तन पर वैसे स्वेद-कण । उमड़ आये ॥ ४८ ॥
फंस जानेसे जैसे अलिकुल । झूलती कमल कलि सकल ।
हृदय-आनंदोर्मियोंके बल । सिहरता वैसे ॥ ४९ ॥
कर्पूर-केलिका गर्भ-पुट जैसे । छीलकर कर्पूर चूता वैसे ।
अर्जुनके नयन-कमलोंसे । चूते अश्रुकण ॥ २५० ॥
सात्त्विकताके ये जब अष्ट भाव । परस्परमें करते हैं उछाह ।
पाता है तब ब्रह्मानंदका जीव । दिव्य-साम्राज्य ॥ ५१ ॥
उदित होते ही सुधाकर । सानंद उमड़ता सागर ।
बार बार वैसे ऊर्मि भर । आती हृदयमें ॥ ५२ ॥
अजी ! सुखानुभवके कारण । कृपासे किया था द्वैत रक्षण ।
आह भर करके प्रतिक्षण । देखता पार्थ ॥ ५३ ॥
मुख कर बैठा था जिस ओर । उसी ओर मस्तक नवाकर ।
प्रणाम किया हाथ जोड कर । औ' किया स्तवन ॥ ५४ ॥
अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-
मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥ १५ ॥
अर्जुनने कहा
हे देव देखूं तव देहमें मैं
हैं देव औ' भूत समूह सारा ।
ध्यानस्थ ब्रह्मा कमलासनस्थ
महर्षि औ' नाग हैं एक साथ ॥ १५ ॥
३५५ विश्व-रूप-दर्शनयोग