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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 412

इसीलिये मैंने कही पीछे जो बात । देव न करेंगे अस्वीकार निश्चित ।
उसकी योग्यता देना मुझे अच्युत । यह है विनय ॥ ११० ॥
तेरे विश्व-रूपका आकलन । कर सकेंगे तो मेरे नयन ।
प्यास बुझावो हे जनार्दन । इन नयनोंकी ॥ ११ ॥
श्री कृष्णकी भक्त-वत्सलता—
करता है जब ऐसी विनती । लीन हो करके सुभद्रापति ।
तब वह षड्गुण-चक्रवर्ति । होता है उतावला ॥ १२ ॥
वह है कृपा-पीयूष सजल । पास आया है यहां वर्षा-काल ।
अथवा है श्रीकृष्ण कोकिल । अर्जुन बसंत ॥ १३ ॥
देखकर जैसे चंद्र-बिंब वर्तुल । उछल आता है क्षीर-सागर-जल ।
वैसे प्रेम-बलसे हृदय-कमल । खिला श्री हरिका ॥ १४ ॥
प्रसन्नताके उस उमंगसे । गरज कर कहता कृपासे ।
पार्थ तू देख देख आनंदसे । स्वरूप मेरा ॥ १५ ॥
केवल विश्व-रूपको देखना । इतनी थी पार्थकी मनो-कामना ।
यहां विश्व रूपमय त्रिभुवन । किया श्री हरिने ॥ १६ ॥
धन्य-धन्य उदार अपरिमित । याचकको देता देव दिन-रात ।
चाहता जो उससे अनगिनत । अपना सर्वस्व ॥ १७ ॥
शेषसे भी जो था चुराया । वेदोंको जिससे छकाया ।
लक्ष्मीसे भी जो था छिपाया । वह हृदय-गुह्य ॥ १८ ॥
प्रकट करेंगे अनेक दर्शन । बनायेंगे विश्व-रूप प्रदर्शन ।
भाग्यशाली है यह बडा अर्जुन । धन्य धन्य ॥ १९ ॥
स्वप्नमें जाता जैसे मनुष्य जागृत । स्वप्नमें बनता है स्वयं वस्तु जात ।
वैसे स्वयं बना विराट्-विश्व अनंत । अपने आपमें ॥ १२० ॥
यकायक वह मुद्रा छोडी । स्थूल-दृष्टि थी यवनिका जो फाडी ।
अथवा खोलकर दिखायी बडी । अपनी योग-सिद्धि ॥ २१ ॥
किंतु यह देखेगा या नहीं । ऐसा विचार कुछ भी नहीं ।
किया और देख कहना है यही । हो स्नेहातुर ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४२