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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 409

वैसे थी प्रकृतिकी अडचन । हटाया तूने उसे जनार्दन ।
पर-तत्वमें की है फिर लीन । बुद्धि मेरी ॥ ७६ ॥
इस विषयमें मेरा देव । हुवा संदेह रहित जीव ।
किंतु और एक संकल्प-भाव । हुआ उत्पन्न ॥ ७७ ॥
रहने दिया इसे संकोचकर । किससे पूछें कहो चक्रधर ।
तेरे बिना नहीं अन्य आधार । जानता मैं ॥ ७८ ॥
जलचर माने जलका आभार । या बालक स्तन्यका संकोच कर ।
जीनेका वह दूसरा क्या आधार । ढूंढेगा देव ! ॥ ७९ ॥
तो संकोच नहीं करना । मनकी जो बात कहना ।
कहे तब कृष्ण अर्जुन । कह तू चाह ॥ ८० ॥
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥
स-संकोच विश्व-रूप दर्शनकी प्रार्थना -
तब कहता किरीटी । कही थी तूने जो गोष्टि ।
उससे प्रतीति दृष्टि । शांत हुई मेरी ॥ ८१ ॥
संकल्प जहांसे है निकलता । लोक-क्रमका उदयास्त होता ।
जिस स्थानको है तू 'मैं कहता । जनार्दन ॥ ८२ ॥
वह वास्तविक रूप है तेरा । जहांसे आता तू ले अवतार ।
सुर-कार्यार्थ तू है चक्रधर । द्विभुज या चतुर्भुज हो ॥ ८३ ॥
क्षीर-शयनाभिनय समाप्त कर । मत्स्य-कूर्मका अलंकार छोड़कर ।
लीला-साधन सबको तू छिपाकर । रखता लपेटके ॥ ८४ ॥
उपनिषद करते गायन । योगी-जन हृदयमें दरशन ।
सनकादिक नित आलिंगन । करते जिसके ॥ ८५ ॥
, तेरा जो ईश्वरी रूप मानना हूँ यथार्थ है ।
वही मैं देखना चाहूँ प्रत्यक्ष पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥
३३९ विश्व-रूप-दर्शनयोग