ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसभी विद्युल्लताओका हो मिलन । तथा प्रलयाग्निके सारे सामान ।
उसीमें जो दश-तेजोंका मिलान । करने पर भी ॥ ३९ ॥
उस शरीर-कांतिके सम्मुख । पास पास आएगा देख ।
किंतु उसके सम नहीं चोख । यह निश्चित ॥ २४० ॥
ऐसा महात्म्य उसका सहज । फैलता है अंगका सब तेज ।
व्यासकी कृपासे मैं वह आज । यहां देखता हूँ ॥ ४१ ॥
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ १३ ॥
दृश्य और दृष्टाका अद्वय-भाव—
उस विश्व-रूपमें एक ओर । जगत है अपना सविस्तर ।
रहते जैसे बुल्ले ठौर ठौर । महा-सागरमें ॥ ४२ ॥
अथवा आकाशमें गंधर्व-नगर । भूतलमें पिपीलिका बांधती घर ।
तथा परमणु मेरु-पर्वतपर । उड़ते रहते हैं ॥ ४३ ॥
इस भांति विश्व अपरंपार । देव चक्रवर्तिके तन पर ।
उस अवसर पांडुकुमार । देखता है ॥ ४४ ॥
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ १४ ॥
एक विश्व वहां और एक आप । ऐसा दुजा भाव था जो अल्प स्वल्प ।
उसका भी अंतःकरणमें लोप । हुवा अचानक ॥ ४५ ॥
जागृत हुआ ब्रह्मानंद अंदर । शरीर बल खोया यहां बाहर ।
डूबा आनंद पुलकमें शरीर । अपाद्-मस्तक ॥ ४६ ॥
विश्वके जो सभी भेद जैसे घुल गये तब ।
अर्जुनने वहां देखे देहमें देवदेवके ॥ १३ ॥
फिर अर्जुन साश्चर्य हर्ष रोमांच गात्रसे ।
प्रभुसे जोडके हाथ बोला हो नत मस्तक ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी ३५४