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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 414

विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपमें वर्ण-विविधता—
कुछ तो तप्त सुवर्णसे । कुछ भूरे मट-मैलेसे ।
कुछ सराग चित्रितसे । सिंधुसे नभ ॥ ३२ ॥
कुछ जो सहज स्वाभाविक कांतिके । कुछ रत्न-जडित ब्रह्मांड दीप्तिके ।
कुछ तो अरुणोदय-प्रभा सरीखे । कुंकुमके समान ॥ ३३ ॥
कुछ शुद्ध स्फटिकोज्ज्वल । कुछ इंद्र-नील सुनील ।
कुछ काले अंजनाचल । कुछ रक्त-वर्ण ॥ ३४ ॥
कुछ लसित-कंचनसे पीले । कुछ शामल बादलसे नीले ।
कुछ चंपक-गौर सम पीले । कुछ थे हरे ॥ ३५ ॥
कुछ लाल तप्त-ताम्र सम । कुछ सुंदर जो चंद्र-सम ।
नाना वर्णके रूप असीम । देख लो भरे ॥ ३६ ॥
जैसे हैं ये अनेक वर्ण । रूपमें भी नहीं प्रमाण ।
लज्जासे कंदर्प-शरण । रूप होंगे देख ॥ ३७ ॥
विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपमें रूप विविधता—
कुछ अति लावण्य साकार । स्निग्ध-तन कुछ मनोहर ।
कुछ श्रृंगार-श्रीके-भांडार । खुला प्रदर्शनार्थ ॥ ३८ ॥
कुछ पीनाकवयव मांसल । कुछ शुष्क अति-विकराल ।
कुछ दीर्घ-कंठ और शिथिल । कुछ अति घिनौने ॥ ३९ ॥
ऐसे नाना-विध वर्ण आकृति । पार नहीं यहां सुभद्रा-पति ।
यहां प्रत्येक अंगकी आकृति । दिखाती विश्व ॥ १४० ॥
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥ ६ ॥
वसु रुद्र तथा वायु देखो आदित्य अश्विनी ।
देखो अनेक आश्चर्य न देखे पहले कभी ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४४

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