सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

वाद जो है बोलनेवालोंमें । जान तू वह हूँ मैं संक्षेपमें ।
कभी न आते एक मतमें । जिससे शास्त्र ॥ ६७ ॥
विषय-निश्चयमें जो बढता । सुनके तर्कका जोर चढता ।
तथा वाणीका रस है बढता । औ' होता मधुर भाषण ॥ ६८ ॥
ऐसे प्रतिपादनमें वाद । कहता है मैं ही हूँ गोविंद ।
औ' अक्षरोंमें जो विशद् । वह अकार मैं हूँ ॥ ६९ ॥
वैसे समासमें अर्जुन । द्वंद्व समास मैं हूँ जान ।
करता जो सर्व भक्षण । वह काल मैं हूँ ॥ २७० ॥
जिसमें मेरु मंदार सहित । पृथिवी भी हो जाती द्रवित ।
उस एकार्णवको भी जो पार्थ । पचाता अपनेमें ॥ ७१ ॥
उस प्रलय तेजको भी ग्रासता । तथा महा अनिलको निगलता ।
आकाशको भी अपनेमें समाता । धनंजय ॥ ७२ ॥
ऐसा है जो असीम काल । मैं हूँ कहता है गोपाल ।
सृजता विश्व जो निर्मल । वह ब्रह्मा मैं हूँ ॥ ७३ ॥
मृत्युः सर्व हरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ।
कीर्तिः श्रीवाक् च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥३४॥
तथा उत्पन्न भूतोंका धारण । सबका जीवन भी संपूर्ण ।
अंतमें सबको देता मरण । वह भी मैं हूँ ॥ ७४ ॥
स्त्री जातिमें अर्जुन । सात मेरी है सुन ।
कहता वह कौन । सकौतुक ॥ ७५ ॥
सुन नित्य नूतन कीर्ति । अर्जुन वह मेरी मूर्ति ।
तथा स-औदार्य संपत्ति । मैं हूँ जान ॥ ७६ ॥
तथा वह है जो वाणी । न्याय सुआसन वासिनी ।
औ' विवेक-पथ गामिनी । मेरा ही रूप ॥ ७७ ॥
सर्व नाशक मैं मृत्यु जन्म भी मैं भविष्यका ।
वाणी श्री कीर्ति नारीमें क्षमा मेधा धृति स्मृति ॥ ३४॥
३२५
विभूति-चिंतनयोग

देख विश्वका पदार्थ । देता मेरा यथार्थ ।
ज्ञान जो है वह पार्थ । स्मृति मैं विशुद्ध ॥ ७८ ॥
स्वहितके अनुकूल । मेधा हूं मैं जो निर्मल ।
त्रिभुवन धृति-शील । तथा क्षमा मैं ॥ ७९ ॥
नारि जातिमें सात । शक्तियां हैं जो पार्थ ।
मैं हूं कही है बात । श्रीकृष्णने यह ॥ २८० ॥
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥ ३५ ॥
वेद-राशिमें बृहत्साम । मैं हूं सुन तू प्रियोत्तम ।
कहता है पुरुषोत्तम । धनंजयसे ॥ ८१ ॥
छंदमें गायत्री छंद । मेरा स्वरूप है विशद ।
जान यह अप्रमाद । अर्जुन तू ॥ ८२ ॥
मासोंमें जो मगसिर । जान यह धनुर्धर ।
ऋतुमें कुसुमाकर । वसंत मैं हूं ॥ ८३ ॥
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्वं सत्ववतामहम् ॥३६॥
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पांडवानां धनंजयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ ३७ ॥
कपट कारस्थानमें द्यूत । मैं हूं जान यह पांडुसुत ।
तभी चौरस्तेका है प्रशस्त । चलता यह चौर्य ॥ ८४ ॥
तेजस्वियोंका तेज निश्चय । मैं ही हूं जान तू धनंजय ।
कार्योद्देश्यमें जो है विजय । वह भी मैं हूं ॥ ८५ ॥
गायत्री सब छंदोंमें मैं बृहत्साम साममें ।
मैं मार्गशीर्ष मासोंमें ऋतुओंमें वसंत मैं ॥ ३५ ॥
द्यूत मैं छलियोंमें हूं तेज तेजस्विका बना ।
सत्व मैं सात्विकोंमें हूँ जय मैं व्यवसायमें ॥ ३६ ॥
मैं वासुदेव वृष्णीमें पांडवोंमें धनंजय ।
मुनियोंमें मुनी व्यास कविमें उशना कवि ॥ ३७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३२६

उद्योगमें जो है धनंजय । उद्योगसे दीखता है न्याय ।
मेरा रूप यह यदुराय । कहता है ॥ ८६ ॥
सत्व है जो सत्वस्थमें । कृष्ण है यदुवंशमें ।
तथा श्री संपन्नतामें । मैं हूं जान ॥ ८७ ॥
वसुदेव देवकीसे मैं उत्पन्न । कुमारि स्थानमें गोकुल गमन ।
प्राणोसह चूस लिय मैंने स्तन । पूतनाके ॥ ८८ ॥
मिटा नहीं था अभी कौमार्य । किया अदानव सृष्टिकार्य ।
गिरिधर बन कूता आर्य । इंद्रकी महिमा ॥ ८९ ॥
मिटाया कालिंदी-हृदय शूल । बचा लिया ज्वाला ग्रस्त गोकुल ।
बनाया मैने ब्रह्माको पागल । बछडे बनाके ॥ २९० ॥
होते ही बाल्यका प्रभात । कंसादि प्रचंड अत्यंत ।
मिटाये दुष्ट जो ज्वलंत । सहज लीलासे ॥ ९१ ॥
कहना मेरा कार्य कितना । तूने स्वयं देखा है अर्जुन ।
यादवोंमें श्रीकृष्ण जानना । मेरा रूप ॥ ९२ ॥
पांडव जो हैं सोम वंशस्थ । उनमें मैं अर्जुन हूं पार्थ ।
हमारा प्रेम भाव विध्वस्थ । कभी न टूटता ॥ ९३ ॥
नहीं तो विचार कर देख अर्जुन । संन्यासी हो चूराई तूने बहन ।
किंतु विकल्प न हुआ मेरा मन । क्यों कि हम एक हैं ॥ ९४ ॥
मुनियोंमें मैं व्यासराय । मैं कहता है यादवराय ।
तथा मैं हूं उषनाचार्य । कवीश्वरोंमें ॥ ९५ ॥
दंडो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥ ३८ ॥
चींटीसे ब्रह्मतक समान । चलता है जो सुनियमन ।
उसमें अनिवार्य शासन । मैं हूं पार्थ ॥ ९६ ॥
दंड मैं दमवंतोंमें धर्म मैं विजयर्थिका ।
ज्ञान हूँ ज्ञानियोंमें में गूढोंमें श्रेष्ठ मौन हूँ ॥ ३८ ॥
३२७ विभूति-चिंतनयोग

सारासार कर निर्णय । धर्म-ज्ञानका जो निश्चय ।
सभी शास्त्रोंमें धनंजय । मैं हूँ नीति शास्त्र ॥ ९७ ॥
सब गुह्योंमें अर्जुन । मौन है अति महान ।
गूँगोंके सम्मुख जान । होता अज्ञानी ब्रह्म ॥ ९८ ॥
अजी ! मैं हूँ ज्ञानियोंमें । श्रेष्ठ है जो जगतमें ।
ज्ञान जान तू इसमें । अंत नहीं पार्थ ॥ ९९ ॥
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान् मया भूतं चराचरं ॥ ३९ ॥
नांतोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
एषतूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ ४० ॥
अजी ! पर्जन्यकी धार । गिनेगा क्या धनुर्धर ।
या पृथ्वीके तृणाँकुर । होंगे क्या गिनके ॥ ३०० ॥
लहरें क्या महा सागरकी । किसीने कभी क्या गिननेकी ।
मेरी अनंत विभूतियोंकी । कहूँ कैसा ॥ १ ॥
फिर भी पचत्तर प्रधान । विभूतियां तुझसे अर्जुन ।
ऊपर ऊपरकी तू जान । कहीं तुझसे ॥ २ ॥
मेरे विभूति-विस्तारका कहीं । आदि अंत यहां कुछ भी नहीं ।
तभी तू सुनेगा कितनी यहीं । और मैं कहूँगा कितनी ॥ ३ ॥
इसीलिये एक वाक्यमें तुझ । मर्म कहता हूँ अब मैं निज ।
तभी तू सब भूतांकुर-बीज । जान मुझको ही ॥ ४ ॥
तभी छोटा बडा न मानना । नीच उच्च भावको तजना ।
भूतमात्रमें मुझे देखना । सम भावसे ॥ ५ ॥
वैसे ही सब भूतोंका मुझको बीज जान तू ।
बिना मेरे नहीं कोई कहीं भी कुछ भी यहां ॥ ३९ ॥
नहीं अंत कभी आता मेरी दिव्य समृद्धिका ।
तो भी विभूति विस्तार मैंने जो अल्पमें कहा ॥ ४० ॥
ज्ञानेश्वरी ३२८

इस पर भी साधारण । कर कहता सावधान ।
सूचित करता अर्जुन । मेरी विभूति ॥ ६ ॥
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छत्वं मम तेजोंऽशसंभवम् ॥ ४१ ॥
जहां जहां संपत्ति औ' दया । दोनो वसति हैं धनंजय ।
वहां तू जान अति निश्चय । मेरी विभूति है ॥ ७ ॥
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ ४२ ॥
नभमें होता रवि-बिंब एक । त्रिभुवनका जो है प्रकाशक ।
उसके आज्ञा-रत होते लोक । सकल हि सदैव ॥ ८ ॥
ऐसोंको अकेला नहीं कहना । साधन-हीन न मानना ।
साथ होते हैं क्या सभी साधन । कामधेनुके कभी ॥ ९ ॥
उससे जब जो चाहता । तभी प्रसवती है माता ।
वैसे अंगभूत रहता । विश्व भी उसके ॥ ३१० ॥
उनकी पहचानकी है संज्ञा । विश्व मानता उसकी आज्ञा ।
ऐसे मनुष्यको जान तू प्राज्ञ ! । मेरा ही अवतार ॥ ११ ॥
अब है सामान्य विंशेष । जानना यहां महा दोष ।
क्यों कि मैं ही एक अशेष । विश्व है जान ॥ १२ ॥
तब क्यों बुरा भला कहना । स्व-मतिसे विभाग करना ।
औ' अपनी मतिसे लगाना । कलंक मुझको ॥ १३ ॥
नहीं तो क्या घीका करते मंथन । अमृतको पकाके करें क्या न्यून ।
वायुका होता क्या दायां बायां पन । कह तू मुझसे ॥ १४ ॥
विभूति-युक्त जो वस्तु लक्ष्मीवंत उदात्त वा ।
मेरी ही किरणोंमेंसे निकली जान तू यह ॥ ४१ ॥
अथवा लाभ ही क्या है जान विस्तारसे तुझे ।
एकांशमें विश्व सारा मुझसे है भरा रहा ॥ ४२ ॥
३२९ विभूति-चिंतनयोग
(42)

रविका होता क्या पेट पीठ । देखनेसे अंधी होगी दीठ ।
ऐसी मेरी स्वरुप-गोष्ट । न यहां भला-बुरा ॥ १५॥
गिनेगा कितनी मेरी विभूति । अनगिनतकी क्या है गिनती ।
जाने दें बातें हे सुभद्रापति । विभूतीकी आज ॥ १६ ॥
मेरा है एक ही जो अंश । विश्व व्यापता अशेष ।
भेद छोड़ तू निःशेष । भज साम्य भावसे ॥ १७ ॥
ऐसा ज्ञानी-वन वसंत । विरक्त जनोंका एकांत ।
बोला यह बात श्रीमंत । श्रीकृष्णचंद्र ॥ १८ ॥
अजी ! देव-देवेश श्रीकृष्ण । कहता है सनम्र अर्जुन ।
बोला तू अविवेक वचन । भेद त्यागका ॥ १९ ॥
अर्जुनका अद्वैतानुभव—
विश्वसे कहता है क्या भास्कर । आता मैं दूर करो अंधार ।
कैसे कहूँ मेरा यह विचार । तू है अडबंग नाथ ॥ ३२०॥
तेरा नाम भी किसी समय । सुनने मिला तो हे तन्मय ।
छोडकर भागेगा हृदय । भेदासुर तुरंत ॥ २१॥
ऐसा है परब्रह्म तू अभेद श्रेष्ठ । दान-सा मिला हो भाग्यका पराकाष्ठ ।
तो भी देखता है क्या भेद कनिष्ठ । किससे औ' कहां ॥ २२॥
चंद्र-बिंबके हृदयमें ठौर । 'तपन' कहता क्या यदु-श्रेष्ठ ।
शोभा देता है क्या कह तू स्पष्ट । यह बड़ायी तेरी ॥ २३ ॥
श्री कृष्णका अर्जुन प्रेम—
सुन यह कृष्णने मन ही मन । कर लिया पार्थका प्रेमालिंगन ।
इस बोलने पर न रुसना । कहता श्री हरि ॥ २४ ॥
भेद मार्गसे कही कहानी । विभूतियोंकी बडी सुहानी ।
अभेदांतःकरणसे सुनी । तुझे जंची या नहीं ॥ २५ ॥
देखनेके लिये मैंने इसीको । कही बाह्य व्यवहारी बातको ।
जाना तूने विभूति विस्तारको । भली भांति ॥ २६ ॥
अर्जुन कहता देवदेवेश । तू ही जाने तेरा वह विशेष ।
किंतु मैं देखता विश्व अशेष । तुझसे भरा हुआ ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३३०

यह सुन कर अंधा धृतराष्ट्र अंतःकरणसे भी अंधा ही रहा—
राजन् कहता है यहां अर्जुन । वह अद्वयानुभव वरण ।
संजयका शब्द कर श्रवण । स्तब्ध है धृतराष्ट्र ॥ २८ ॥
संजयका दुखी अंतःकरण । जैसे हैं इसके बाह्य नयन ।
वैसे ही अंधा है अंतःकरण । कहता संजय ॥ २९ ॥
किंतु वहां वह अर्जुन । बढाता है स्वहित मान । -
दूसरा जागृत महान । संकल्प एक ॥ ३० ॥
सोचता यह हृदयानभव । बना लेना है नयनका भाव ।
बुद्धिमें हुआ इच्छाका उद्भव । सहज भावसे ॥ ३१ ॥
मेरे यही दोनों नयन । करें विश्व-रूप दर्शन ।
ळालसा हुई दैववान । सहज भावसे ॥ ३२ ॥
आज वह् है कल्पतरुकी शाख । उसकी इच्छा व्यर्थ न होती देख ।
जो जो कहेगा आज उसका मुख । सिद्ध करेगा दैव ॥ ३३ ॥
सुन कर प्रल्हादका बोल । प्रसन्न हुआ वन सकल ।
वह सद्गुरु मिला कुशल । अर्जुनको ॥ ३४ ॥
विश्वरूप दर्शनार्थ वैसे । पूछेगा अर्जुन श्रीकृष्णसे ।
कहूँगा कहता श्रोताओंसे । निवृत्तिदास ज्ञानदेव ॥ ३३५ ॥
गीता श्लोक ४२
ज्ञानेश्वरी ओवी ३३५.

११
विश्व-रूप-दर्शनयोग
यह अध्याय शांत अद्भुत रसोंका प्रयागराज है—
एकादश है इसके अनंतर । कथा भरी है दो रसोंका भंडार ।
वहां दर्शन करेगा धनुर्धर । विश्व-रूपका ॥ १ ॥
जहां शांत-रसके सदन । अद्भुत आया अतिथि -वत्त ।
मिला पंगतका बहुमान । अन्य रसोंको ॥ २ ॥
होता जब वधु-वरोंका मिलन । तब होता बारातियोंका सन्मान ।
वैसे मिला है देशीका सिंहासन । अन्य रसोंको भी ॥ ३ ॥
किंतु उत्तम जो शांत अद्भुत । जंचेंगे आखोंको कर तृप्त ।
जैसे हैं प्रेम-भावालिंगित । हरिहर दोनों ॥ ४ ॥
अथवा जैसे अमावासके दिन । करते हैं दोनों बिंब आलिंगन ।
वैसे दोनों रसोंका सम्मेलन । हुआ इस स्थलमें ॥ ५ ॥
मिले हैं गंगा-यमुनाके ओघ । वैसे रसोंका हुआ है प्रयाग ।
इसीलिये यहां सुस्नात जग । संपूर्ण-रूपसे ॥ ६ ॥
इसमें गीता-सरस्वती गुप्त । तथा ये दोनों रस-ओघ मूर्त ।
इसीलिये त्रिवेणी है उचित । सबको प्राप्त है ॥ ७ ॥

सबको त्रिवेणी-स्नान सुलभ हो इसलिये देश-भाषाका घाट बांधा है—
अजी ! यहां श्रवणके द्वारसे । तीर्थमें प्रवेश सुलभ हो ऐसे ।
करवाया है श्री गुरुने मुझसे । कहता ज्ञानदेव ॥ ८ ॥
अजी ! संस्कृतका तीर है गहन । उसको देशीके ये शब्द सोपान ।
निर्माण कराये हैं धर्म-निधान । निवृत्तिनाथने ॥ ९ ॥
यहां करना सबको सद्भाव-स्नान । प्रयाग-माधव विश्व-रूप-दर्शन ।
तथा करना यहां संसार-तर्पण । तिलोदकका ॥ १० ॥
ऐसे हैं यह सावयव । स्वरूप लाये रस-भाव ।
औ' श्रवण-सुखका चाव । मिला विश्वको ॥ ११ ॥
यहां प्रत्यक्ष शांत-अद्भुत । अन्य रसोंको शोभा प्राप्त ।
साथ ही हुआ है मोक्ष-प्राप्त । स्पष्ट रूपसे ॥ १२ ॥
यह ग्यारहवां अध्याय है । वेदोंका जो विश्राम-धाम है ।
सुदैवियोंमें पार्थ श्रेष्ठ है। पहुंचा जो वहां ॥ १३ ॥
पार्थ वहां पहुंचा भला क्यों अकेला । जिसे माता है उसका हुवा सुकाल ।
गीता-भाव उभरा देशीमें सकल । इसी समय ॥ १४ ॥
संत जनोंसे कविकी विनय —
मेरी बात यह इसीलिये । विनय करता सुन-लीजिये ।
जरासा ध्यानसे चित्त दीजिये । आप सज्जन ॥ १५ ॥
अजी ! यह है संतोंकी परिषद । ऐसा लगाव यहां अ-शोभास्पद ।
किंतु आपत्य बन आनंद-स्पंद । कहता मैं यह ॥ १६ ॥
आप ही पहले तोतेको पढाते । वह बोलता तब आप डुलते ।
या बच्चेसे नकल करा रीझते । माता पिता जैसे ॥ १७ ॥
वैसे जो जो कुछ मैं बोलता । प्रभु आपने ही सिखाया था ।
जो आपने ही जो है दिया था । सुनिये चित्त देकर ॥ १८ ॥
अजी ! गाछ है यह सारस्वतका । आपने ही जो लगाया था उसका ।
सिंचन कर अवधानामृतका । बढाया कीजिये ॥ १९ ॥
३३३ विश्व रूप-दर्शनयोग

रस-भाव तब पुष्प-सा खिलेगा । नाना अर्थ फल-भारसे फलेगा ।
आपके ही धर्मका सुकाल होगा । सारे जगतमें ॥ २० ॥
इस बातसे रीझ उठे सब संत । "भल कहा" कह कर हो प्रमुदित ।
अब कहो कृष्णार्जुनमें क्या बात । हुयी जो वहां ॥ २१ ॥
तब निवृत्तिदास कहता । कृष्णार्जुनकी मैं क्या जानता ।
सामान्य क्या मैं कह सकता । कहलाते सब आप ॥ २२ ॥
अजी ! जंगलका जो पात खाते । रावण पर वे विजय पाते ।
पार्थ अक्षोहिणी सैन्य जीतते । अकेले ही ॥ २३ ॥
तभी जो जो करते हैं समर्थ । चराचरमें होता वह सार्थ ।
मुझसे कहलाते हैं तदर्थ । संत जन आप ॥ २४ ॥
सुनिये अब यह बोल । गीता भावार्थके निर्मल ।
वैकुंठ-पतिके सरल । निकल मुखसे ॥ २५ ॥
धन्य धन्य वह ग्रंथ गीता । वेद-प्रतिपाद्य जो देवता ।
बना है श्रीकृष्ण महा-वक्ता । इस ग्रंथका ॥ २६ ॥
कैसे करें उस गौरवका वर्णन । न होता शिव-बुद्धिको भी आकलन ।
जीव-भावसे करना उसे वंदन । यही भला है ॥ २७ ॥

बुद्धिने जो स्वीकार किया उसको आंखोंसे देखनेकी इच्छा-अर्जुनका संकोच-

सुनिये अब वह किरीटी । विश्व-रूपपे रख दृष्टि ।
करने लगा है कैसे गोष्ठि । श्रीकृष्णसे ॥ २८ ॥
सकल ही है यह सर्वेश्वर । अनुभव है यह रुचिकर ।
होना यह नयनसे गोचर । प्रत्यक्ष रूपमें ॥ २९ ॥
आशा है यह अंतःकरणकी । विवंचना है कैसे कहनेकी ।
विश्व-रूपके महा-गुपितकी । अर्जुनको यहां ॥ ३० ॥
सोचता पीछे कभी कहीं । प्रिय-जनने पूछा नहीं ।
सहसा मैं इनको यहीं । पूछूं कैसे ? ॥ ३१ ॥
यद्यपि है हमारा स्नेह चांग । तो क्या लक्ष्मी मातासे अंतरंग ।
वह भी डरती ऐसा प्रसंग । पूछनेमें ॥ ३२ ॥

ज्ञानेश्वरी ३३४

हमने सेवा की है बहुत नेक । किंतु क्या गरुड़से भी अधिक।
इसमें वह भी न पूछता एक । चुपचाप बैठा है ॥ ३३ ॥
मैं क्या सनकादिकसे अधिक। वे भी झमेला करते न देख ।
मैं हूँ क्या गोपियोंसे भी भावुक । प्रिय-जन उन्हें ? ॥ ३४ ॥
उन प्रिय-जनोंको भी छकाया । दस गर्भ वास भी सहन किया ।
विश्व-रूप नहीं दिखाया । किसीको भी ॥ ३५ ॥
ऐसी यह गुपित बात । छिपायी जो हृदय-गत ।
पूछना क्या मुझे उचित । क्या कैसे ॥ ३६ ॥
यदि मैं यह प्रश्न नहीं पूछता । उसके बिन सुख नहीं मिलता ।
जान लेना भी संभव नहीं होता । यह बात कभी ॥ ३७ ॥
श्री कृष्णका भक्त-प्रेम—
पूछें अब अल्पसी बात । फिर देखें हरिका मत ।
सोचकर हो भीति-युक्त । पूछता अर्जुन ॥ ३८ ॥
तब अर्जुनका यह भाव । सुन एक दो शब्दमें देख ।
दिखाता विश्व-रूप-वैभव । पूर्ण-रूपसे ॥ ३९ ॥
गाय जो बछडेको देखकर । ऊठ जाती है हडबडाकर ।
मुखमें ले स्तन चूसने पर । न स्त्रवेगी क्या दूध ? ॥ ४० ॥
जहां आता है पांडवोंका नाम । रक्षार्थ दौडना जिसका काम ।
पूछना अर्जुनका सप्रेम । सहेगा कैसे ? ॥ ४१ ॥
श्रीकृष्ण सहज प्रेमावतरण । अर्जुन प्रेम-नशाको उत्तेजन ।
समरस होनेमें यहां अभिन्न । भिन्नता भान विस्मय ॥ ४२ ॥
अर्जुनके बोलनेसे अब महज । कृष्ण विश्व-रूप दिखायेग सहज ।
ऐसा अद्भुत प्रसंग आया है आज । सुनियोगा ॥ ४३ ॥
३३५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ १ ॥
प्रभो तूने अपने हृदयका दर्शन दिया और —
कृष्णसे फिर कहता अर्जुन । श्रीकृष्ण तूने मेरे ही कारण ।
वाच्य किया था जो गुह्य कथन । कृपा करके ॥ ४४ ॥
महाभूत जब ब्रह्ममें विलीन । जीव महदादि भी होते हैं लीन ।
अंतिम वह जो है विश्रांति-स्थान । आपका रूप ॥ ४५ ॥
अंतःकरणके वह भीतर । रखा था वेदोंसे भी छिपाकर ।
कहता है कृष्णसे धनुर्धर । कृपणके भांति ॥ ४६ ॥
वह तूने आज श्री नारायण । दिया है मुझे हृदय-दर्शन ।
उसपे शिवने अध्यात्म-ध्यान । किया न्योच्छावर ॥ ४७ ॥
ऐसी वस्तु तूने मुझे दी है । क्षण भी विलंब न किया है ।
यदि हम ऐसे कहते हैं । तो मैं भिन्न हूं क्या ? ॥ ४८ ॥
भंवरमें मैं महा-मोहके । डुबा था शिखा तक देखके ।
श्रीहरि तूने स्वयं कूदके । उभार लिया मुझे ॥ ४९ ॥
तुझ एक बिना देव कभी कहीं । विश्वमें अन्य वस्तुका नाम नहीं ।
किंतु देख यहां दुर्दैव है यही । मानते "हम हैं" भिन्न ॥ ५० ॥
विश्वमें मैं कोयी एक अर्जुन । धर ऐसा देहका अभिमान ।
तथा कौरवको यहां स्वजन । कहता था मैं ॥ ५१ ॥
इस पर भी मैं इन्हें मारूंगा । इसका पाप-भोगी भी बनूंगा ।
ऐसे दुःस्वप्न रत मुझे जगा- । दिया तूने कृष्ण ॥ ५२ ॥
अर्जुनने कहा
करके करुणा मेरी कहा तूने रहस्य जो ।
उस अध्यात्म विद्यासे मेरा जो मोह था गया ॥ १ ॥
ज्ञानेश्वरी ३३६

गंधर्व-नगरकी बस्ती । छोड़ निकला मैं लक्ष्मी-पति ।
प्याससे पानीका था मैं प्रार्थी । औ' पीता था मृगजल ॥ ५३ ॥
अजी ! वरूके सर्प-दंशसे । चढती विष-ल्हरियोंसे ।
त्रस्त जीवको मृत्यु-भयसे । उभार लिया देव ॥ ५४ ॥
अपना प्रतिबिंब न जानकर । कूपमें कूदना सिंह देखकर ।
उसको बचा लिया पकड़कर । मेरी रक्षा की ऐसी ॥ ५५ ॥
मुझपर अपार कृपा करके मेरी रक्षा की - अब--
नही तो मेरा यहां तक । निश्चय हुवा था तू देख ।
सप्त-सागर हुये एक । मिलकर ॥ ५६ ॥
या डूबने दो युग संपूर्ण । या टूटने दो यह गगन ।
लड़ेगा नहीं कभी अर्जुन । स्व-गोत्रजोंसे ॥ ५७ ॥
ऐसी अहंकार-उर्मियोंमें उन्मत्त । आग्रह जलमें डूबा था मैं अनंत ।
उठा लिया है तूने हो स्नेहार्द्र-चित्त । कौन था अन्य मेरा ॥ ५८ ॥
नहीं था यह एक-मात्र अर्जुन । वैसे दूसरेको नाम दे स्वजन ।
सवार हुवा ऐसा पागलपन । तूने बचा लिया देव ! ॥ ५९ ॥
पहले होना था जब हमारा दहन । भय था तब देह जल जानेका सुन ।
अब चैतन्य सह होना था दहन । बचा लिया तूने दोनो बार ॥ ६० ॥
हिरण्यासुर दुराग्रहमें भरकर । मेरी बुद्धि-भूको बगलमें दबाकर ।
मोहार्णव-सिंधुके गवाक्षसे अंदर । जा बैठा था ॥ ६१ ॥
तेरे ही बलसे मधुसूदन । विवेकने ले लिया है स्व-स्थान ।
वराहका पुनरावतरण । लेना पडा यह ॥ ६२ ॥
अपार कृपा है तेरी मुझ पर । एक वाचासे ही बोलूं क्यों कर ।
पंच-प्राण किये तूने न्योच्छावर । मुझपर देव ॥ ६३ ॥
कुछ भी वह व्यर्थ नहीं गया । उसमें संपूर्ण यश भी आया ।
देव ! मैं साद्यंत रूपसे माया- । रहित हुवा जी ॥ ६४ ॥
आनंद सरोवरके कमल । वैसे हैं तेरे नयन निर्मल ।
अपने प्रसादके हैं महल । बना लेते हैं ॥ ६५ ॥
(43) ३३७ विश्व-रूप-दर्शनयोग

उसका तथा मोहका मिलन । है यह व्यर्थ-बातका कथन ।
मृगजलसे होगा क्या शमन । वडवानलका ॥ ६६ ॥
तथा जो मैं हूं तब श्रीकृष्ण । पाके कृपाका अंतःकरण ।
करता हूं सानंद भोजन । ब्रह्म-रसका ॥ ६७ ॥
इससे हुवा मेरा मोह निवारण । इसमें क्या भला विस्मयका कारण ।
इससे हुवा मेरा उद्धार श्रीकृष्ण । तेरे चरणोंकी सौगंध ॥ ६८ ॥
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २ ॥
अर्जुनकी आंतरिक द्विविधा—
अजी ! हे कमल-नयन । कोटि-सूर्य-तेज वदन ।
मैंने तुझसे जनार्दन । सुना है आज ॥ ६९ ॥
प्रकृतिसे उत्पन्न भूत-जात । वैसे प्रकृतिमें उसका अंत ।
कैसा होता है जो प्राकृत । कहा है देवने ॥ ७० ॥
प्रकृतिका दिया संपूर्ण-ज्ञान । बताया ब्रह्मका वसति-स्थान ।
जिसको ओढ करके महान् । हुए हैं वेद ॥ ७१ ॥
ज्ञान-राशीको जो बढाता । धर्म-रत्नोंको प्रसवता ।
वेद है आश्रय करता । तेरे स्वरूपका ॥ ७२ ॥
ऐसा अगाध है महात्म्य । जो सकल मार्गैक्य-गम्य ।
तथा है स्वानुभव रम्य । दिखाया मुझे ॥ ७३ ॥
हटाकरके सब बादल । दिखाते जैसे सूर्य-मंडल ।
सेवार हटाकर निर्मल । जल दिखाते हैं ॥ ७४ ॥
छुडानेसे सांपकी जकडन । होता जैसे चंदन-दर्शन ।
या करनेसे पिशाचोच्चाटन । मिलती भूमिस्थ निधि ॥ ७५ ॥
उत्पत्ति नाश भूतोंका सुना मैंने सविस्तर ।
अभंग महिमा वैसे तेरे ही मुखसे प्रभु ॥ २ ॥
ज्ञानेश्वरी ३३८

वैसे थी प्रकृतिकी अडचन । हटाया तूने उसे जनार्दन ।
पर-तत्वमें की है फिर लीन । बुद्धि मेरी ॥ ७६ ॥
इस विषयमें मेरा देव । हुवा संदेह रहित जीव ।
किंतु और एक संकल्प-भाव । हुआ उत्पन्न ॥ ७७ ॥
रहने दिया इसे संकोचकर । किससे पूछें कहो चक्रधर ।
तेरे बिना नहीं अन्य आधार । जानता मैं ॥ ७८ ॥
जलचर माने जलका आभार । या बालक स्तन्यका संकोच कर ।
जीनेका वह दूसरा क्या आधार । ढूंढेगा देव ! ॥ ७९ ॥
तो संकोच नहीं करना । मनकी जो बात कहना ।
कहे तब कृष्ण अर्जुन । कह तू चाह ॥ ८० ॥
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥
स-संकोच विश्व-रूप दर्शनकी प्रार्थना -
तब कहता किरीटी । कही थी तूने जो गोष्टि ।
उससे प्रतीति दृष्टि । शांत हुई मेरी ॥ ८१ ॥
संकल्प जहांसे है निकलता । लोक-क्रमका उदयास्त होता ।
जिस स्थानको है तू 'मैं कहता । जनार्दन ॥ ८२ ॥
वह वास्तविक रूप है तेरा । जहांसे आता तू ले अवतार ।
सुर-कार्यार्थ तू है चक्रधर । द्विभुज या चतुर्भुज हो ॥ ८३ ॥
क्षीर-शयनाभिनय समाप्त कर । मत्स्य-कूर्मका अलंकार छोड़कर ।
लीला-साधन सबको तू छिपाकर । रखता लपेटके ॥ ८४ ॥
उपनिषद करते गायन । योगी-जन हृदयमें दरशन ।
सनकादिक नित आलिंगन । करते जिसके ॥ ८५ ॥
, तेरा जो ईश्वरी रूप मानना हूँ यथार्थ है ।
वही मैं देखना चाहूँ प्रत्यक्ष पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥
३३९ विश्व-रूप-दर्शनयोग

ऐसा तेरा असीम जनार्दन । विश्व-रूप कथा सुनके मन ।
देखना चाहते वही नयन । प्यासे होकर ॥ ८६ ॥
मेरा संकोच करके दूर । स-स्नेह पूछी चाह श्रीधर ।
यही एक चाह चक्रधर । पूर्ण करना ॥ ८७ ॥
तेरा विश्व-रूप संपूर्ण । देखना चाहता स-तृष्ण ।
होकर तन-मन प्राण । एकमात्र ॥ ८८ ॥
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥ ४ ॥
और एक बात केशव । विश्व-रूप दर्शनास्तव ।
मेरी योग्यता है वास्तव । या नहीं है ॥ ८९ ॥
यह मैं आप नहीं जानता । यह क्यों है यदि तू पूछता ।
अपने रोगका क्या जानता । निदान रोगी ? ॥ ९० ॥
अजी ! होती जब इच्छाकी तीव्रता । भूलते हैं तब अपनी योग्यता ।
प्यासा मनुष्य है सदैव मानता । अपर्याप्त समुद्र ॥ ९१ ॥
इच्छाकी है ऐसी जो तीव्रता । भुला देती है मेरी योग्यता ।
जानती किंतु शिशुको माता । सहज-भावसे ॥ ९२ ॥
वैसा तू भक्त जन रंजन । जानता है मेरी संभावना ।
फिर तू विश्व-रूप दर्शन । देगा हो सदय ॥ ९३ ॥
किंतु मेरी योग्यतानुसार । ना हो तो ना कह कृपाकर ।
गाके लाभ क्या पंचम स्वर । बहरेके सम्मुख ॥ ९४ ॥
एक प्यासेकेलिये वर्षा होती । उससे पृथ्वीकी प्यास बुझती ।
किंतु वही चट्टान पर होती । व्यर्थ जाती है ॥ ९५ ॥
चकोरको चंद्रामृत मिलता । अन्योंको क्या इनकार करता ।
किंतु दृष्टि न होनेसे होता । व्यर्थ ही सब ॥ ९६ ॥
यदि तू मानता शक्य तेरा जो रूप देखना ।
तभी योगेश्वर देव दिखावो वह अव्यय ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४०

अजी ! तू विश्व-रूप यह सहसा । दिखायेगा इस बातका भरोसा ।
ऐसी बातोंमें उदार अपना-सा । नित्य-नूतन तू ॥ ९७ ॥
परमात्माकी असमान्य उदारताका वर्णन—
तेरी उदारता है जो स्वतंत्र । न देखती देनेमें पात्रापात्र ।
कैवल्य-सा वर अति-पवित्र । दिया शत्रुओंको भी ॥ ९८ ॥
अजी ! मोक्ष है जो अति दुराराध्य । तेरे चरण हैं उसका आराध्य ।
होता है वह तेरी बातसे साध्य । सेवकके समान ॥ ९९ ॥
तूने सनकादिकके समान । पूतनाको दिया सायुज्यासन ।
कराके जो विषका स्तन-पान । मारने आयी थी ॥ १०० ॥
राजसूय सभा-सदनमें । त्रिभुवन जन-सम्मुखमें ।
जिसने शत दु-र्वचनमें । डुबोया तुझे ॥ १ ॥
ऐसा अपराधी जो शिशुपाल । पाता है तेरे चरणमें स्थल ।
या उत्थानपादका ध्रुवबाल । चाहता था क्या मोक्ष ॥ २ ॥
ध्रुवबाल आया था वनमें । बैठना है पिताकी गोदमें ।
उसको किया तूने जगतमें । सूर्य-चंद्रसे ऊंचा ॥ ३ ॥
ऐसे वनवासियोंको सकल । देनेवाला एक है तू धसाल ।
पुत्रको पुकारता अजामिल । किया चिद्रूप ॥ ४ ॥
जिसने मारी लात तेरी छाती पर । उसका पद-चिन्ह किया अलंकार ।
अब-तक है शत्रु का ही कलेवर । भूषण बना करमें ॥ ५ ॥
अपकारी पर भी तेरा उपकार । अपात्रों पर भी तू है अति उदार ।
द्वारपाल बना तू दान मांगकर । बलिके घरका ॥ ६ ॥
न सुनी जिसने आराधना । रिझाती थी जो तोता अपना ।
उस गणिकाको जनार्दन । तूने दिया वैकुंठ ॥ ७ ॥
दिखा कर ऐसे व्यर्थके कारण । निज-पद देता तू नारायण ।
न करेगा तू मुझे ऐसा श्रीकृष्ण । कभी निराश ॥ ८ ॥
जिससे इतने जगत सकल । पाता है शांति तुष्टि पुष्टि औ' बल ।
उस नंदिनीका बछडा व्याकुल । होगा क्या भूखसे ॥ ९ ॥
३४१ विश्व-रूप-दर्शनयोग

इसीलिये मैंने कही पीछे जो बात । देव न करेंगे अस्वीकार निश्चित ।
उसकी योग्यता देना मुझे अच्युत । यह है विनय ॥ ११० ॥
तेरे विश्व-रूपका आकलन । कर सकेंगे तो मेरे नयन ।
प्यास बुझावो हे जनार्दन । इन नयनोंकी ॥ ११ ॥
श्री कृष्णकी भक्त-वत्सलता—
करता है जब ऐसी विनती । लीन हो करके सुभद्रापति ।
तब वह षड्गुण-चक्रवर्ति । होता है उतावला ॥ १२ ॥
वह है कृपा-पीयूष सजल । पास आया है यहां वर्षा-काल ।
अथवा है श्रीकृष्ण कोकिल । अर्जुन बसंत ॥ १३ ॥
देखकर जैसे चंद्र-बिंब वर्तुल । उछल आता है क्षीर-सागर-जल ।
वैसे प्रेम-बलसे हृदय-कमल । खिला श्री हरिका ॥ १४ ॥
प्रसन्नताके उस उमंगसे । गरज कर कहता कृपासे ।
पार्थ तू देख देख आनंदसे । स्वरूप मेरा ॥ १५ ॥
केवल विश्व-रूपको देखना । इतनी थी पार्थकी मनो-कामना ।
यहां विश्व रूपमय त्रिभुवन । किया श्री हरिने ॥ १६ ॥
धन्य-धन्य उदार अपरिमित । याचकको देता देव दिन-रात ।
चाहता जो उससे अनगिनत । अपना सर्वस्व ॥ १७ ॥
शेषसे भी जो था चुराया । वेदोंको जिससे छकाया ।
लक्ष्मीसे भी जो था छिपाया । वह हृदय-गुह्य ॥ १८ ॥
प्रकट करेंगे अनेक दर्शन । बनायेंगे विश्व-रूप प्रदर्शन ।
भाग्यशाली है यह बडा अर्जुन । धन्य धन्य ॥ १९ ॥
स्वप्नमें जाता जैसे मनुष्य जागृत । स्वप्नमें बनता है स्वयं वस्तु जात ।
वैसे स्वयं बना विराट्-विश्व अनंत । अपने आपमें ॥ १२० ॥
यकायक वह मुद्रा छोडी । स्थूल-दृष्टि थी यवनिका जो फाडी ।
अथवा खोलकर दिखायी बडी । अपनी योग-सिद्धि ॥ २१ ॥
किंतु यह देखेगा या नहीं । ऐसा विचार कुछ भी नहीं ।
किया और देख कहना है यही । हो स्नेहातुर ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४२

भगवान उवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५ ॥
विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपकी जड़में एक सृष्टिका दर्शन, स्वभाव-विविधता—
तूने कहा अर्जुन दिखावो एक । उसीको दिखाया तो क्या रहा नेक ।
यहां भरा है जो सभी अब देख । मेरे ही रूपमें ॥ २३ ॥
एक कृश तो एक स्थूल । एक लघु एक विशाल ।
पृथुतर तथा विशाल । अमर्याद सब ॥ २४ ॥
एक अनावर तो एक प्रांजल । कुछ स-व्यापार तो कुछ निश्चल ।
कुछ उदासीन तो कुछ स्नेहल । कुछ हैं कठोर ॥ २५ ॥
कुछ उन्मन कुछ सावध । कुछ उथल कुछ अगाध ।
कुछ प्रसन्न तो कुछ क्रुद्ध । तथा मुक्त संकुचित ॥ २६ ॥
कुछ संत कुछ सदा-मद । कुछ स्तब्ध कुछ सानंद ।
गर्जन रत कुछ निःशब्द । तथा सौम्य भी ॥ २७ ॥
अभिलाषा-युत कुछ विरक्त । कुछ जागृत कुछ निद्रित ।
कुछ संतुष्ट कुछ है आर्त । अति उदार कुछ ॥ २८ ॥
कुछ अशस्त्र तो कुछ सशस्त्र । तथा अति रौद्र औ' अति-मित्र ।
कुछ तम-युत कुछ पवित्र । कुछ है समाधिस्थ ॥ २९ ॥
कयी जन लीला-विलास । औ' पालन-शील-लालस ।
संहारक कुछ सावेश । कुछ है साक्षि-भूत ॥ १३० ॥
नाना विध जो प्रकर्ष ऐसे । प्रकाशित जो दिव्य-तेजसे ।
वर्णमें भी जो एक एक-से । नहीं थे कोयी ॥ ३१ ॥
श्रीभगवानने कहा
देखो मेरे सभी रूप दिव्य शत सहस्र तू ।
नाना प्रकार आकार वर्ण भी जिसमें बहु ॥ ५ ॥
३४३ विश्व-रूप-दर्शनयोग

विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपमें वर्ण-विविधता—
कुछ तो तप्त सुवर्णसे । कुछ भूरे मट-मैलेसे ।
कुछ सराग चित्रितसे । सिंधुसे नभ ॥ ३२ ॥
कुछ जो सहज स्वाभाविक कांतिके । कुछ रत्न-जडित ब्रह्मांड दीप्तिके ।
कुछ तो अरुणोदय-प्रभा सरीखे । कुंकुमके समान ॥ ३३ ॥
कुछ शुद्ध स्फटिकोज्ज्वल । कुछ इंद्र-नील सुनील ।
कुछ काले अंजनाचल । कुछ रक्त-वर्ण ॥ ३४ ॥
कुछ लसित-कंचनसे पीले । कुछ शामल बादलसे नीले ।
कुछ चंपक-गौर सम पीले । कुछ थे हरे ॥ ३५ ॥
कुछ लाल तप्त-ताम्र सम । कुछ सुंदर जो चंद्र-सम ।
नाना वर्णके रूप असीम । देख लो भरे ॥ ३६ ॥
जैसे हैं ये अनेक वर्ण । रूपमें भी नहीं प्रमाण ।
लज्जासे कंदर्प-शरण । रूप होंगे देख ॥ ३७ ॥
विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपमें रूप विविधता—
कुछ अति लावण्य साकार । स्निग्ध-तन कुछ मनोहर ।
कुछ श्रृंगार-श्रीके-भांडार । खुला प्रदर्शनार्थ ॥ ३८ ॥
कुछ पीनाकवयव मांसल । कुछ शुष्क अति-विकराल ।
कुछ दीर्घ-कंठ और शिथिल । कुछ अति घिनौने ॥ ३९ ॥
ऐसे नाना-विध वर्ण आकृति । पार नहीं यहां सुभद्रा-पति ।
यहां प्रत्येक अंगकी आकृति । दिखाती विश्व ॥ १४० ॥
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥ ६ ॥
वसु रुद्र तथा वायु देखो आदित्य अश्विनी ।
देखो अनेक आश्चर्य न देखे पहले कभी ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४४