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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 397

उद्योगमें जो है धनंजय । उद्योगसे दीखता है न्याय ।
मेरा रूप यह यदुराय । कहता है ॥ ८६ ॥
सत्व है जो सत्वस्थमें । कृष्ण है यदुवंशमें ।
तथा श्री संपन्नतामें । मैं हूं जान ॥ ८७ ॥
वसुदेव देवकीसे मैं उत्पन्न । कुमारि स्थानमें गोकुल गमन ।
प्राणोसह चूस लिय मैंने स्तन । पूतनाके ॥ ८८ ॥
मिटा नहीं था अभी कौमार्य । किया अदानव सृष्टिकार्य ।
गिरिधर बन कूता आर्य । इंद्रकी महिमा ॥ ८९ ॥
मिटाया कालिंदी-हृदय शूल । बचा लिया ज्वाला ग्रस्त गोकुल ।
बनाया मैने ब्रह्माको पागल । बछडे बनाके ॥ २९० ॥
होते ही बाल्यका प्रभात । कंसादि प्रचंड अत्यंत ।
मिटाये दुष्ट जो ज्वलंत । सहज लीलासे ॥ ९१ ॥
कहना मेरा कार्य कितना । तूने स्वयं देखा है अर्जुन ।
यादवोंमें श्रीकृष्ण जानना । मेरा रूप ॥ ९२ ॥
पांडव जो हैं सोम वंशस्थ । उनमें मैं अर्जुन हूं पार्थ ।
हमारा प्रेम भाव विध्वस्थ । कभी न टूटता ॥ ९३ ॥
नहीं तो विचार कर देख अर्जुन । संन्यासी हो चूराई तूने बहन ।
किंतु विकल्प न हुआ मेरा मन । क्यों कि हम एक हैं ॥ ९४ ॥
मुनियोंमें मैं व्यासराय । मैं कहता है यादवराय ।
तथा मैं हूं उषनाचार्य । कवीश्वरोंमें ॥ ९५ ॥
दंडो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥ ३८ ॥
चींटीसे ब्रह्मतक समान । चलता है जो सुनियमन ।
उसमें अनिवार्य शासन । मैं हूं पार्थ ॥ ९६ ॥
दंड मैं दमवंतोंमें धर्म मैं विजयर्थिका ।
ज्ञान हूँ ज्ञानियोंमें में गूढोंमें श्रेष्ठ मौन हूँ ॥ ३८ ॥
३२७ विभूति-चिंतनयोग