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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 407

गंधर्व-नगरकी बस्ती । छोड़ निकला मैं लक्ष्मी-पति ।
प्याससे पानीका था मैं प्रार्थी । औ' पीता था मृगजल ॥ ५३ ॥
अजी ! वरूके सर्प-दंशसे । चढती विष-ल्हरियोंसे ।
त्रस्त जीवको मृत्यु-भयसे । उभार लिया देव ॥ ५४ ॥
अपना प्रतिबिंब न जानकर । कूपमें कूदना सिंह देखकर ।
उसको बचा लिया पकड़कर । मेरी रक्षा की ऐसी ॥ ५५ ॥
मुझपर अपार कृपा करके मेरी रक्षा की - अब--
नही तो मेरा यहां तक । निश्चय हुवा था तू देख ।
सप्त-सागर हुये एक । मिलकर ॥ ५६ ॥
या डूबने दो युग संपूर्ण । या टूटने दो यह गगन ।
लड़ेगा नहीं कभी अर्जुन । स्व-गोत्रजोंसे ॥ ५७ ॥
ऐसी अहंकार-उर्मियोंमें उन्मत्त । आग्रह जलमें डूबा था मैं अनंत ।
उठा लिया है तूने हो स्नेहार्द्र-चित्त । कौन था अन्य मेरा ॥ ५८ ॥
नहीं था यह एक-मात्र अर्जुन । वैसे दूसरेको नाम दे स्वजन ।
सवार हुवा ऐसा पागलपन । तूने बचा लिया देव ! ॥ ५९ ॥
पहले होना था जब हमारा दहन । भय था तब देह जल जानेका सुन ।
अब चैतन्य सह होना था दहन । बचा लिया तूने दोनो बार ॥ ६० ॥
हिरण्यासुर दुराग्रहमें भरकर । मेरी बुद्धि-भूको बगलमें दबाकर ।
मोहार्णव-सिंधुके गवाक्षसे अंदर । जा बैठा था ॥ ६१ ॥
तेरे ही बलसे मधुसूदन । विवेकने ले लिया है स्व-स्थान ।
वराहका पुनरावतरण । लेना पडा यह ॥ ६२ ॥
अपार कृपा है तेरी मुझ पर । एक वाचासे ही बोलूं क्यों कर ।
पंच-प्राण किये तूने न्योच्छावर । मुझपर देव ॥ ६३ ॥
कुछ भी वह व्यर्थ नहीं गया । उसमें संपूर्ण यश भी आया ।
देव ! मैं साद्यंत रूपसे माया- । रहित हुवा जी ॥ ६४ ॥
आनंद सरोवरके कमल । वैसे हैं तेरे नयन निर्मल ।
अपने प्रसादके हैं महल । बना लेते हैं ॥ ६५ ॥
(43) ३३७ विश्व-रूप-दर्शनयोग