ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहमने सेवा की है बहुत नेक । किंतु क्या गरुड़से भी अधिक।
इसमें वह भी न पूछता एक । चुपचाप बैठा है ॥ ३३ ॥
मैं क्या सनकादिकसे अधिक। वे भी झमेला करते न देख ।
मैं हूँ क्या गोपियोंसे भी भावुक । प्रिय-जन उन्हें ? ॥ ३४ ॥
उन प्रिय-जनोंको भी छकाया । दस गर्भ वास भी सहन किया ।
विश्व-रूप नहीं दिखाया । किसीको भी ॥ ३५ ॥
ऐसी यह गुपित बात । छिपायी जो हृदय-गत ।
पूछना क्या मुझे उचित । क्या कैसे ॥ ३६ ॥
यदि मैं यह प्रश्न नहीं पूछता । उसके बिन सुख नहीं मिलता ।
जान लेना भी संभव नहीं होता । यह बात कभी ॥ ३७ ॥
श्री कृष्णका भक्त-प्रेम—
पूछें अब अल्पसी बात । फिर देखें हरिका मत ।
सोचकर हो भीति-युक्त । पूछता अर्जुन ॥ ३८ ॥
तब अर्जुनका यह भाव । सुन एक दो शब्दमें देख ।
दिखाता विश्व-रूप-वैभव । पूर्ण-रूपसे ॥ ३९ ॥
गाय जो बछडेको देखकर । ऊठ जाती है हडबडाकर ।
मुखमें ले स्तन चूसने पर । न स्त्रवेगी क्या दूध ? ॥ ४० ॥
जहां आता है पांडवोंका नाम । रक्षार्थ दौडना जिसका काम ।
पूछना अर्जुनका सप्रेम । सहेगा कैसे ? ॥ ४१ ॥
श्रीकृष्ण सहज प्रेमावतरण । अर्जुन प्रेम-नशाको उत्तेजन ।
समरस होनेमें यहां अभिन्न । भिन्नता भान विस्मय ॥ ४२ ॥
अर्जुनके बोलनेसे अब महज । कृष्ण विश्व-रूप दिखायेग सहज ।
ऐसा अद्भुत प्रसंग आया है आज । सुनियोगा ॥ ४३ ॥
३३५ विश्व-रूप-दर्शनयोग