ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस पर भी साधारण । कर कहता सावधान ।
सूचित करता अर्जुन । मेरी विभूति ॥ ६ ॥
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छत्वं मम तेजोंऽशसंभवम् ॥ ४१ ॥
जहां जहां संपत्ति औ' दया । दोनो वसति हैं धनंजय ।
वहां तू जान अति निश्चय । मेरी विभूति है ॥ ७ ॥
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ ४२ ॥
नभमें होता रवि-बिंब एक । त्रिभुवनका जो है प्रकाशक ।
उसके आज्ञा-रत होते लोक । सकल हि सदैव ॥ ८ ॥
ऐसोंको अकेला नहीं कहना । साधन-हीन न मानना ।
साथ होते हैं क्या सभी साधन । कामधेनुके कभी ॥ ९ ॥
उससे जब जो चाहता । तभी प्रसवती है माता ।
वैसे अंगभूत रहता । विश्व भी उसके ॥ ३१० ॥
उनकी पहचानकी है संज्ञा । विश्व मानता उसकी आज्ञा ।
ऐसे मनुष्यको जान तू प्राज्ञ ! । मेरा ही अवतार ॥ ११ ॥
अब है सामान्य विंशेष । जानना यहां महा दोष ।
क्यों कि मैं ही एक अशेष । विश्व है जान ॥ १२ ॥
तब क्यों बुरा भला कहना । स्व-मतिसे विभाग करना ।
औ' अपनी मतिसे लगाना । कलंक मुझको ॥ १३ ॥
नहीं तो क्या घीका करते मंथन । अमृतको पकाके करें क्या न्यून ।
वायुका होता क्या दायां बायां पन । कह तू मुझसे ॥ १४ ॥
विभूति-युक्त जो वस्तु लक्ष्मीवंत उदात्त वा ।
मेरी ही किरणोंमेंसे निकली जान तू यह ॥ ४१ ॥
अथवा लाभ ही क्या है जान विस्तारसे तुझे ।
एकांशमें विश्व सारा मुझसे है भरा रहा ॥ ४२ ॥
३२९ विभूति-चिंतनयोग
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