ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदेख विश्वका पदार्थ । देता मेरा यथार्थ ।
ज्ञान जो है वह पार्थ । स्मृति मैं विशुद्ध ॥ ७८ ॥
स्वहितके अनुकूल । मेधा हूं मैं जो निर्मल ।
त्रिभुवन धृति-शील । तथा क्षमा मैं ॥ ७९ ॥
नारि जातिमें सात । शक्तियां हैं जो पार्थ ।
मैं हूं कही है बात । श्रीकृष्णने यह ॥ २८० ॥
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥ ३५ ॥
वेद-राशिमें बृहत्साम । मैं हूं सुन तू प्रियोत्तम ।
कहता है पुरुषोत्तम । धनंजयसे ॥ ८१ ॥
छंदमें गायत्री छंद । मेरा स्वरूप है विशद ।
जान यह अप्रमाद । अर्जुन तू ॥ ८२ ॥
मासोंमें जो मगसिर । जान यह धनुर्धर ।
ऋतुमें कुसुमाकर । वसंत मैं हूं ॥ ८३ ॥
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्वं सत्ववतामहम् ॥३६॥
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पांडवानां धनंजयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ ३७ ॥
कपट कारस्थानमें द्यूत । मैं हूं जान यह पांडुसुत ।
तभी चौरस्तेका है प्रशस्त । चलता यह चौर्य ॥ ८४ ॥
तेजस्वियोंका तेज निश्चय । मैं ही हूं जान तू धनंजय ।
कार्योद्देश्यमें जो है विजय । वह भी मैं हूं ॥ ८५ ॥
गायत्री सब छंदोंमें मैं बृहत्साम साममें ।
मैं मार्गशीर्ष मासोंमें ऋतुओंमें वसंत मैं ॥ ३५ ॥
द्यूत मैं छलियोंमें हूं तेज तेजस्विका बना ।
सत्व मैं सात्विकोंमें हूँ जय मैं व्यवसायमें ॥ ३६ ॥
मैं वासुदेव वृष्णीमें पांडवोंमें धनंजय ।
मुनियोंमें मुनी व्यास कविमें उशना कवि ॥ ३७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३२६