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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 402

११
विश्व-रूप-दर्शनयोग
यह अध्याय शांत अद्भुत रसोंका प्रयागराज है—
एकादश है इसके अनंतर । कथा भरी है दो रसोंका भंडार ।
वहां दर्शन करेगा धनुर्धर । विश्व-रूपका ॥ १ ॥
जहां शांत-रसके सदन । अद्भुत आया अतिथि -वत्त ।
मिला पंगतका बहुमान । अन्य रसोंको ॥ २ ॥
होता जब वधु-वरोंका मिलन । तब होता बारातियोंका सन्मान ।
वैसे मिला है देशीका सिंहासन । अन्य रसोंको भी ॥ ३ ॥
किंतु उत्तम जो शांत अद्भुत । जंचेंगे आखोंको कर तृप्त ।
जैसे हैं प्रेम-भावालिंगित । हरिहर दोनों ॥ ४ ॥
अथवा जैसे अमावासके दिन । करते हैं दोनों बिंब आलिंगन ।
वैसे दोनों रसोंका सम्मेलन । हुआ इस स्थलमें ॥ ५ ॥
मिले हैं गंगा-यमुनाके ओघ । वैसे रसोंका हुआ है प्रयाग ।
इसीलिये यहां सुस्नात जग । संपूर्ण-रूपसे ॥ ६ ॥
इसमें गीता-सरस्वती गुप्त । तथा ये दोनों रस-ओघ मूर्त ।
इसीलिये त्रिवेणी है उचित । सबको प्राप्त है ॥ ७ ॥