सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 406, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 406

अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ १ ॥
प्रभो तूने अपने हृदयका दर्शन दिया और —
कृष्णसे फिर कहता अर्जुन । श्रीकृष्ण तूने मेरे ही कारण ।
वाच्य किया था जो गुह्य कथन । कृपा करके ॥ ४४ ॥
महाभूत जब ब्रह्ममें विलीन । जीव महदादि भी होते हैं लीन ।
अंतिम वह जो है विश्रांति-स्थान । आपका रूप ॥ ४५ ॥
अंतःकरणके वह भीतर । रखा था वेदोंसे भी छिपाकर ।
कहता है कृष्णसे धनुर्धर । कृपणके भांति ॥ ४६ ॥
वह तूने आज श्री नारायण । दिया है मुझे हृदय-दर्शन ।
उसपे शिवने अध्यात्म-ध्यान । किया न्योच्छावर ॥ ४७ ॥
ऐसी वस्तु तूने मुझे दी है । क्षण भी विलंब न किया है ।
यदि हम ऐसे कहते हैं । तो मैं भिन्न हूं क्या ? ॥ ४८ ॥
भंवरमें मैं महा-मोहके । डुबा था शिखा तक देखके ।
श्रीहरि तूने स्वयं कूदके । उभार लिया मुझे ॥ ४९ ॥
तुझ एक बिना देव कभी कहीं । विश्वमें अन्य वस्तुका नाम नहीं ।
किंतु देख यहां दुर्दैव है यही । मानते "हम हैं" भिन्न ॥ ५० ॥
विश्वमें मैं कोयी एक अर्जुन । धर ऐसा देहका अभिमान ।
तथा कौरवको यहां स्वजन । कहता था मैं ॥ ५१ ॥
इस पर भी मैं इन्हें मारूंगा । इसका पाप-भोगी भी बनूंगा ।
ऐसे दुःस्वप्न रत मुझे जगा- । दिया तूने कृष्ण ॥ ५२ ॥
अर्जुनने कहा
करके करुणा मेरी कहा तूने रहस्य जो ।
उस अध्यात्म विद्यासे मेरा जो मोह था गया ॥ १ ॥
ज्ञानेश्वरी ३३६