ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरविका होता क्या पेट पीठ । देखनेसे अंधी होगी दीठ ।
ऐसी मेरी स्वरुप-गोष्ट । न यहां भला-बुरा ॥ १५॥
गिनेगा कितनी मेरी विभूति । अनगिनतकी क्या है गिनती ।
जाने दें बातें हे सुभद्रापति । विभूतीकी आज ॥ १६ ॥
मेरा है एक ही जो अंश । विश्व व्यापता अशेष ।
भेद छोड़ तू निःशेष । भज साम्य भावसे ॥ १७ ॥
ऐसा ज्ञानी-वन वसंत । विरक्त जनोंका एकांत ।
बोला यह बात श्रीमंत । श्रीकृष्णचंद्र ॥ १८ ॥
अजी ! देव-देवेश श्रीकृष्ण । कहता है सनम्र अर्जुन ।
बोला तू अविवेक वचन । भेद त्यागका ॥ १९ ॥
अर्जुनका अद्वैतानुभव—
विश्वसे कहता है क्या भास्कर । आता मैं दूर करो अंधार ।
कैसे कहूँ मेरा यह विचार । तू है अडबंग नाथ ॥ ३२०॥
तेरा नाम भी किसी समय । सुनने मिला तो हे तन्मय ।
छोडकर भागेगा हृदय । भेदासुर तुरंत ॥ २१॥
ऐसा है परब्रह्म तू अभेद श्रेष्ठ । दान-सा मिला हो भाग्यका पराकाष्ठ ।
तो भी देखता है क्या भेद कनिष्ठ । किससे औ' कहां ॥ २२॥
चंद्र-बिंबके हृदयमें ठौर । 'तपन' कहता क्या यदु-श्रेष्ठ ।
शोभा देता है क्या कह तू स्पष्ट । यह बड़ायी तेरी ॥ २३ ॥
श्री कृष्णका अर्जुन प्रेम—
सुन यह कृष्णने मन ही मन । कर लिया पार्थका प्रेमालिंगन ।
इस बोलने पर न रुसना । कहता श्री हरि ॥ २४ ॥
भेद मार्गसे कही कहानी । विभूतियोंकी बडी सुहानी ।
अभेदांतःकरणसे सुनी । तुझे जंची या नहीं ॥ २५ ॥
देखनेके लिये मैंने इसीको । कही बाह्य व्यवहारी बातको ।
जाना तूने विभूति विस्तारको । भली भांति ॥ २६ ॥
अर्जुन कहता देवदेवेश । तू ही जाने तेरा वह विशेष ।
किंतु मैं देखता विश्व अशेष । तुझसे भरा हुआ ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३३०