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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पिघलते हैं आभूषण । न गलता उसका स्वर्ण ।
वैसे जीवाकारमें पूर्ण । मर्त्यमें जो अमर ॥ ७८ ॥
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥२१॥
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥२२॥
उस चैतन्यकी व्यक्ताव्यक्तता —
अव्यक्त कहनेसे सकौतुक । स्तुति न होती उसकी सार्थक ।
न आता मन-बुद्धिमें सम्यक । इसी लिये ॥ ७९ ॥
आकारत्व आनेपर जिसका । निराकारत्व न जाता उसका ।
आकार लोपसे भी नित्यताका । न होता लोप ॥ १८० ॥
इसीलिये उसे कहते हैं अक्षर । जिससे बोध होता है सविस्तर ।
न दीखता विस्तार उसके पार । उसका नाम परमगति ॥ ८१ ॥
किंतु मैं देहपुरमें संपूर्ण । रहता हूं निद्रस्तके समान ।
नहीं करता चलन वलन । न करता इसीलिये ॥ ८२ ॥
वैसे शरीरके कोई व्यापार । नहीं रुकते हैं धनुर्धर ।
दस इंद्रियोंके हैं व्यवहार । चलते अव्याहत ॥ ८३ ॥
अंतःकरणके चौराहे पर । लग रहा है विषय-बाजार ।
मिले सुख-दुखका राज कर । मिलता जीवको ही ॥ ८४ ॥
जैसे राजा सुखसे जब सोता । उसका राज-काज न रुकता ।
प्रजा-जन करते सहजता । अपनी इच्छासे ॥ ८५ ॥
वैसे बुद्धिका जानना । मनका है लेना-देना ।
इंद्रियोंका भी करना । तथा स्फुरण वायुका ॥ ८६ ॥
कहा अक्षर अव्यक्त वही है गति अंतिम ।
वही मेरा परं-धाम वहांसे लौटता नहीं ॥ २१ ॥
मिले अनन्य भक्तीसे पार्थ परं-पुरुष जो ।
जिसमें रहते जीव जिससे व्याप्त है जग ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी २४०

वैसे ही सब शरीराचार । न चलते चलते सुंदर ।
जैसे रविके न चलाकर । चलता त्रिलोक ॥ ८७ ॥
अर्जुन ! यह है ऐसा । शरीरमें निद्रित-सा ।
इसीलिये हैं पुरुष । कहते इसको ॥ ८८ ॥
तथा प्रकृति जो पतिव्रता । उसका है यह पत्नीव्रत ।
इसीलिये यह कहलाता । पुरुष है ॥ ८९ ॥
किंतु वेदोंका भी बहुश्रुतपन । देख न सकता इसका अंगन ।
होता यह गगनका आच्छादन । धनुर्धर ॥ ९० ॥
यह जानकर योगीश्वर । उसको कहते परम पर ।
जो है अनन्यगतिका घर । ढूंढकर आते हैं ॥ ९१ ॥
ऐसा यह अक्षर चैतन्य भक्तिसे प्रष्ट होता है—
जिनका तन मन वचन । नहीं सुनता अन्य कथन ।
पकता एक निष्ठाका धान । इस खेतमें ॥ ९२ ॥
यह त्रैलोक्य ही पुरुषोत्तम । ऐसा सच्चा जिनका मनोधर्म ।
वह सदा आस्तिकोंका आश्रम । है धनंजय ॥ ९३ ॥
जो निर्गर्वियोंका मान । गुणातीतका है ज्ञान ।
सुखका है उपवन । निरिच्छोंका ॥ ९४ ॥
संतोषका परोसा जो पक्वान्न । अचित अनाथोंका मातृ-स्थान ।
भक्ति-नगरका पथ महान । सरल सुलभ ॥ ९५ ॥
यह एकेक कह कर । खोयें क्यों काल धनुर्धर ।
वहां जानेसे वह ठौर । होता है स्वयं ॥ ९६ ॥
जैसे हिम-शीतकी लहर । शीतल करता तप्त नीर ।
या सूर्य सम्मुख आ अंधार । होता प्रकाश ॥ ९७ ॥
वैसे संसार भी अर्जुन । पहुंचकर संपूर्ण ।
बनता है मोक्ष स्थान । अनायास ॥ ९८ ॥
अग्नि-कुंडमें जैसे जो आया । वह ईंघन ही अग्नि भया ।
चुनकर भी हाथ न आया । काष्ठपन फिर ॥ ९९ ॥
२४१
(31) साधकसंदेश

जैसे डली जो गूहकी । रूप न लेती ईखकी ।
बुध्दिमंत ले बुध्दिकी । कितनी थाह ॥ २०० ॥
अथवा लोहका कनक भया । यह पारसने सहज किया ।
फिर उसका लोहपन आया । यह असंभव ॥ १ ॥
घृत बनकर एक बार । असंभव फिर होना क्षीर ।
वैसे ही वह धाम पाकर । नहीं पुनरावर्तन ॥ २ ॥
ऐसा वह मेरा परम । निजधाम सर्वोत्तम ।
अंतःकरणका मर्म । कहता तुझसे ॥ ३ ॥
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३ ॥
मृत्यु समयकी दो स्थितियां-
इसको जाननेका प्रकार । अति सुलभ है इक और ।
देह त्यागके स-अवसर । पाते योगीजन ॥ ४ ॥
अकस्मात ऐसा भी घड़ता । अनवसर तन गिरता ।
तब है पुनः आना पड़ता । देहमें उन्हें ॥ ५ ॥
देह छोड़कर सकाल । ब्रह्म होते हैं वे तत्काल ।
देह छोड़कर अकाल । आते संसारमें ॥ ६ ॥
सायुज्य तथा पुनरावर्तन । वह है सब अवसराधीन ।
वह अवसर कहूं महान । तुझसे अब ॥ ७ ॥
अब तू सुन अर्जुन । मृत्यूके नशेमें जान ।
पांचों करते प्रयाण । अपनी राहसे ॥ ८ ॥
होता है प्रयाणकाल प्राप्त । न होती है बुद्धि भ्रम-ग्रस्त ।
तथा न होता सब विस्मृत । न डरता मन ॥ ९ ॥
किस काल गए। कैसे तजके देह साधक ।
आता है या न आता है कहता मैं सुनो अब ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी २४२

यह चेतन-वर्ग संपूर्ण । मरण कालमें भी नवीन ।
आकलनसे होता प्रसन्न । ब्रह्म बोधके ॥ २१० ॥
चैतन्य-वर्गका सचेतन । कालमें होता मरणासन्न ।
अग्नि-सहायतासे जान । संभव होता ॥ ११ ॥
हवा या पानीसे जब । बुझती है ज्योति तब ।
देखती क्यों दृष्टि कब । अपनी ही ॥ १२ ॥
वैसे देहावसानकी विषमतासे । देह भरता है अंतरबाह्य श्लेष्मसे ।
तेज बुझता तब अग्निका उससे । सहज धनुर्धर ॥ १३ ॥
न रहता जब प्राणका प्राण । न होता है चेतन्य अग्नि बिन ।
तब रहकर सतेज ज्ञान । क्या होगा शरीरमें ॥ १४ ॥
जब है शरीरका अग्नि जाता । केवल वह कीचड रहता ।
तनमें तब खोजता रहता । मृत्यु घटिका ॥ १५ ॥
पूर्व स्मरण जहां संपूर्ण । थाम लेता कालमें प्रयाण ।
शरीर त्यज ब्रह्म-निर्वाण । पाना स्वरूपमें ॥ १६ ॥
किंतु कीचमें देह श्लेष्मकी । फंसी तब शक्ति चेतनाकी ।
कैसी बात भूत-भविष्यकी । रहेगी स्मरण ॥ १७ ॥
अजी ! जीवन भरका अभ्यास । भूल गया अंतकालमें खास ।
जैसे थाथी देखते ही प्रकाश । बुझा हाथका ॥ १८ ॥
रहने दो यह सकल । ज्ञानको अग्नि ही है मूल ।
अग्निका ही है पूर्ण बल । प्रयाण कालमें ॥ १९ ॥
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ २४ ॥
अंदर अग्नि-ज्योतिका प्रकाश । बाहर शुक्ल पक्ष औ' दिवस ।
तथा षण्मासोंमें कोई भी मास । उत्तरायणका ॥ २२० ॥
अग्निसे दिन शुक्लार्ध जोडके उत्तरायण ।
जाता जो जुडता ब्रह्म अंतमें ब्रह्म जानके ॥ २४ ॥
२४३ वाक्यप्रबोध

मृत्युसमयकी पहली स्थिति-चैतन्यप्रधान, प्रकाश प्रधान—
ऐसे समय-योगमें नियत । होता है जिसका देहपात ।
जो ब्रह्म-विद करता प्राप्त । परमपद ॥ २१ ॥
सुन तू अब धनुर्धर । सामर्थ्य जो सु-अवसर ।
सरल मार्ग है स्वपुर । पहुंचनेका ॥ २२ ॥
अग्नि प्रथम पावरी । ज्योतिर्मयता दूसरी ।
तथा दिवस तीसरी । शुक्लपक्ष ॥ २३ ॥
तथा षण्मास उत्तरायण । वह है ऊपरका सोपान ।
पाते हैं सायुज्य-सिद्धिदिन । इससे योगी ॥ २४ ॥
उत्तम काल है बहुत । कहलाता अर्चिरा पथ ।
कहता हूं अकाल पार्थ । सुन तू अब ॥ २५ ॥
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥ २५ ॥
तम प्रधान मृत्यु समय—
समयमें जब प्रयाणके । उभार आवे वात-श्लेष्मके ।
आवरण हो अंधःकारके । अंतःकरणपे ॥ २६ ॥
इंद्रियां होती जैसे काष्ठ । स्मृति होती भ्रममें नष्ट ।
मन होता है पथ भ्रष्ट । तथा घुटता प्राण ॥ २७ ॥
मिटता अग्निका अग्निपन । रहता है धूम्र ही संपूर्ण ।
जिसमें चेतनाकी घुटन । होती शरीरमें ॥ २८ ॥
जैसे चंद्रपर बादल । आता है घना औ' सजल ।
तब ना घना या उज्ज्वल । रहता प्रकाश ॥ २९ ॥
न मरता वह न सावध । जीवितसह पडता स्तब्ध ।
ऐसी आयु-कालकी मर्याद- । प्रतीक्षामें रहता ॥ २३० ॥
धूमसे रात कृष्णार्ध जोड़के दक्षिणायन ।
जाता जो लौटता पीछे पहुंचे चंद्र-लोकको ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी २४४

जहां मन-बुद्धि-करण । डूबा धूम कुलावरण ।
वहां अनुभवका ज्ञान । डूबा जीवनका ॥ ३१ ॥
जहां हाथका भी जाता । वहां लाभकी क्या कथा ।
प्रयाणकाल अवस्था । होती ऐसे ॥ ३२ ॥
यहां देहमें ऐसी स्थिति । वहां कृष्ण पक्ष औ' रात ।
षण्मासमें घटिका आती । दक्षिणायनकी ॥ ३३ ॥
जब पुनरावर्तनका घर । प्रयाण समयमें जाता भर ।
तब स्वरूप-सिद्धि समाचार । सुने कौन ॥ ३४ ॥
ऐसा जिस योगीका शरीर पडता । योगी होनेसे चंद्रलोक ही मिलता ।
वहांसे फिर पुनरावर्तन होता । संसारमें ॥ ३५ ॥
कहा मैने अनाल अर्जुन । वह यही है इसको जान ।
धूम्रमार्ग पुनरावर्तन । यही है जो ॥ ३६ ॥
यहां वह अर्चिरामार्ग । चलता हुआ औ' सलग ।
सहज सुलभ सुभग । मोक्ष-दायक ॥ ३७ ॥
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥ २६ ॥
किंतु जो सद्रूप है वह किसी मार्गसे आय तो भी ब्रह्मपद पाता है -
ये दो ऐसे अनादि पथ । सरल तथा टेढा पार्थ ।
तभी बताये मैंने सार्थ । तुझको अब ॥ ३८ ॥
क्यों कि मार्ग अमार्ग देखना । सच्चा झूठा यह जान लेना ।
हित अहित समझलेना । अपने हितार्थ ॥ ३९ ॥
कोई भली नांव छोडकर । कूदेगा क्या नदीके भीतर ।
तथा सीधी राह जानकर । चलेगा क्या कुपथ ॥ २४० ॥
जानता जो विष औ' अमृत । छोडता है क्या वह अमृत ।
वैसा कोई छोड सीधा पथ । चलें क्यों टेढा ॥ ४१ ॥
प्रकाश और अंधार दोनों मार्ग अनादि हैं ।
निस्तार करता एक घेरेमें एक डालता ॥ २६ ॥
२४५ आत्मबोध

इसीलिये अर्जुन प्रथम । जानना उत्तम अधम ।
जाननेसे समयमें काम । होगा सब व्यर्थ ॥ ४२ ॥
वैसे देहांतमें बडा विषम । इन मार्गोंका है बडा संभ्रम ।
जीवन भर अभ्यासका काम । होगा सब व्यर्थ ॥ ४३ ॥
अर्चिरा मार्ग भूलकर । पडे तो धूम्र पथपर ।
पडेंगे संसार-सागर । भंवर-चक्रमैं ॥ ४४ ॥
देख कर ये बडे सायास । किस भांति मिटेंगे त्रास ।
सोचकर यह पथ खास । कहा जायेगा ॥ ४५ ॥
ऐसे ब्रह्मपद महान । दूसरेसे पुनरावर्तन ।
वैसे अंतकालका क्षण । जैसा हो वैसा मिलेगा ॥ ४६ ॥
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥ २७ ॥
तब कहे देव यह नहीं ऐसा । कब क्या मिलेगा जाने कोन कैसा ।
देह-पातसे ब्रह्म बनता जैसा । रहा मार्गसे ही ॥ ४७ ॥
तब रहे या जाये यह तन । हम वह ब्रह्म है यह जान ।
डोरीपे सर्पत्वका आरोपण । मिथ्या है इसलिये ॥ ४८ ॥
मुझे तरलपन है या नहीं । भासता क्या यह पानीको कहीं ।
पानी जो है पानी ही कभी कहीं । वैसे ही पार्थ ॥ ४९ ॥
तरंगाकारसे न जन्मता । तरंग लोपसे न मरता ।
देहमें रहते ब्रह्म होता । देहसे जो ॥ २५० ॥
शरीरत्व नहीं रहा खास । अब उन तत्वज्ञोंके पास ।
भला होगा क्या किसका नाश । इसमें क्या रहा ॥ ५१ ॥
देशकालादि यदि संपूर्ण । भये आपही जब तत्क्षण ।
फिर पथका अनुसंधान । रहा किसके लिये ॥ ५२ ॥

ऐसे जो जानके मार्ग योगी होता न मोहित ।
तभी तू सर्वदा पार्थ योगसे युक्त हो रह ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी २४६

अजी ! जब यह घंट फूटता । घटाकाश है राहमें लगता ।
वह महदाकाशमें मिलता । या रहता वहीं ॥ ५३ ॥
यहां है ऐसा प्रकार । मिटता मात्र आकार ।
गगन है एकाकार । सदा सर्वत्र ॥ ५४ ॥
होता है जब यह बोध । न रहता मार्गका द्वैध ।
बनने पर सोऽहं सिद्ध । योगियोंको ॥ ५५ ॥
इसका कारण पांडुसुत । तुम्हे बनना योग-युक्त ।
जिससे सर्वदा समता । रहगी अपनेमें ॥ ५६ ॥
तबहो कुछ भी कभी । देह बंध हो न हो तभी ।
अखंड ब्रह्म बोध कभी । न बिगडेगा ॥ ५७॥
सभी प्रकारके मोहसे मुक्त मनुष्य—
वह कल्पारंभमें न जनमता । कल्पांतमें भी वह नहीं मरता ।
स्वर्ग संसारादिमें नहीं फंसता । सृष्टि-कालमें ॥ ५८ ॥
जिस बोधसे वह योगी बनता । उसकी सरलता अनुभवता ।
अन्य भोगोंको तौलकर तजता । स्वरूपावस्थामें ॥ ५९ ॥
अर्जुन इंद्रादि देव । मानते अपना सर्वस्व ।
वह राज्य-भोग वैभव । मानता तुच्छ ॥ २६० ॥
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव
दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा
योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥ २८ ॥
जो वेदका यज्ञ तथा तपोंका
दानादिका पुण्य कहा गया है ।
जो लांघता सर्व हि जानके तो
योगी चढे आद्य महान धाम ॥ २८ ॥
२४५ शांतत्ययोग

यदि पुण्य वेदाध्ययनका । तथा बहार यज्ञ-फलका ।
प्राप्त सर्वस्व तप दानका । धनंजय ॥ ६१ ॥
मिलकर सब पुण्यका खेत । बहर पकने पर भी पार्थ ।
ब्रह्मानंदकी तुलनामें व्यर्थ । जो नित्य निर्मल ॥ ६२ ॥
तुलनामें जो नित्यानंदके । तुलामें डाले तो उपमाके ।
थोड़ा नहीं है उस सुखके । साधन यज्ञादि हैं ॥ ६३ ॥
न नासता जो न खूटता । भोगीको सदा तृप्ति देता ।
भावी महा-सुखका होता । बंधुही यह ॥ ६४ ॥
ऐसे जिस दृश्य सुखका । अधिष्ठान हैं संसारका ।
प्राप्तव्य है शत-मखका । न मिलता कभी ॥ ६५ ॥
उस अलौकिकको योगीश्वर । तोलता है हथेली पर ।
स-कौतुक अनुमान कर । कहता हलका ॥ ६६ ॥
फिर जिस सुखका अर्जुन । रचकर भलासा सोपान ।
प्राप्त करता है सिंहासन । ब्रह्म-सुखका ॥ ६७ ॥
ज्ञानेश्वरका उपसंहार—
ऐसा जो चराचरैक्य भाग्य । ब्रह्मेशके आराधना योग्य ।
योगी जनके महायोग्य । योग धन जो ॥ ६८ ॥
वह सकल कलाकी कला । परमानंदका है पुतला ।
जीवोंका परम जिव्हाला । विश्वके जो ॥ ६९ ॥
सर्वज्ञताका है जो जीवन । यादव कुलदीप पावन ।
बोला धनंजयसे श्रीकृष्ण । इस भांति ॥ २७० ॥
कुरु क्षेत्रकी ऐसी कथा । संजय राजासे कहता ।
उसीको है आगे सुनाता । ज्ञानदेव निवृत्तिदास ॥ २७१ ॥
गीता श्लोक २८
ज्ञानेश्वरी ओवी २७१.

राज-विद्या = समर्पणयोग
९
पित्र-रूपमें गुरु-वंदन—
अजी ! ध्यानसे चित दीजिये । सब सुखका पात्र बनिये ।
प्रतिज्ञोत्तर यह सुनिये । प्रकट बात ॥ १ ॥
प्रौढ़तासे यह नहीं बोलता । आप सर्वज्ञोंसे स-ममता ।
ध्यान दें यह विनय करता । सर्वज्ञ-समाजसे ॥ २ ॥
लाड़लेके सब लाड़ पूर्ण होते । सब ही मनोरथ संपन्न होते ।
मातापिता जब हैं श्रीमंत होते । आपके समान ॥ ३ ॥
आपकी कृपा-दृष्टिके रससे । प्रसन्नताका बाग खिलनेसे ।
उसकी छायामें सोता, सुखसे । शांत जो मैं ॥ ४ ॥
प्रभु आप हैं सुखामृतके सागर । हम पाते शीतलता इच्छानुसार ।
यहां पर भी स्नेहार्थ सकुचाकर । कहां पायें शांति ॥ ५ ॥
यों तो बालक तुतलाता । टेढ़ा मेढ़ा पग रखता ।
उससे स-कौतुक माता । रीझती सदा ॥ ६ ॥
वैसा आप सन्तोंका प्रेम । चाहते जिसे सदा हम ।
इसीलिये करते प्रेम । श्री चरणोंमें ॥ ७ ॥
बोलनेमें क्या है मेरी योग्यता । जहां सर्वज्ञ भावा-दृश श्रोता ।
सरस्वती सुत है क्या सीखता । देकर पाठ ॥ ८ ॥
कितना ही बड़ा क्यों न हो ज्योतिरिंगण । नहीं प्रकाशता भानुबिंबके समान ।
नहीं मिलता अमृत थाळ सम पकवान्न । उसका उपाय क्या ? ॥ ९ ॥
(32)

हिमकरको पंखा झलना । नाद-ब्रह्मको गाना सुनाना ।
अथवा भूषणको सजाना । होता क्या ऐसा ? ॥ १० ॥
कहिए सुगंधको क्या सूंघना । सागरको कहां स्नान कराना ।
आकाशको जिसमें समाना । क्या लावें ऐसा ॥ ११ ॥
आप सब जिससे तृप्त होंगे । जिसको सु-प्रवचन कहेंगे ।
सुनके मनमें प्रसन्न होंगे । ऐसा वक्तृत्व कहां ? ॥ १२ ॥
किंतु प्रकट होते ही गभस्ति । न उतारते क्या हाथ आरती ।
न देते क्या अर्ध्यांजलि स-भक्ति । महा-सागरको ॥ १३ ॥
आप हैं स्वामी महेशकी मूर्ति । दुबला मैं पूजता हूँ स-भक्ति ।
तभी बिल्व छोड़ दूं गंगावती । स्वीकार करेंगे ॥ १४ ॥
पिताकी थालमें हाथ डाल कर । खिलाता शिशु जब पिताको कौर ।
प्रेम-भरसे तब पिता सत्वर । झुकके खोलता मुख ॥ १५ ॥
वैसा मैं करता हूँ आपसे । तुतलाता हूँ बाल-मतिसे ।
तथा सुनते आप मोदसे । यह है प्रेम-भाव ॥ १६ ॥
ऐसी आत्मीयतासे मोहित । सन्त-समूह है अति-ग्रस्त ।
नहीं होगा स्नेहका किंचित् । भार आपको ॥ १७ ॥
आघात करता जब शिशुका मुख । प्रेमार्द्र-माता स्तन्य देती अधिक ।
रोषसे बढ़ता सदा प्रेम अधिक । प्रिय-वस्तुके ॥ १८ ॥
मुझ बालकका यह वचन । आपका निद्रस्त कृपालूपन ।
जागृत करेगा यह मैं जान । बोला हूँ आपसे ॥ १९ ॥
कार्यकी और गुरु-कृपाकी महत्ता—
पकाते क्या कभी पालमें चांदनीको । पंखेसे गति देते हैं क्या पवनको ।
खोल चढ़ाते कैसे कहो गगनको । मुझसे आप ॥ २० ॥
तरल नहीं करना पड़ता पानी । नवनीतमें नहीं पैठती मथनी ।
लज्जित हो अभिव्यक्त न होती वाणी । आपके सम्मुख ॥ २१ ॥
शब्द-ब्रह्म जिस खटौले पर । सोता है शब्द कुंठित हो कर ।
देश-भाषामें यह गीता-सार । कहनेकी योग्यता क्या ? ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी २५०

किंतु कहता हूँ कर साहस । मनमें धरके मै एक आस ।
आपके सम्मुख कर साहस । प्रिय बनूं आपके ॥ २३ ॥
अजी ! शीतल जो चंद्रमासे । जीवनदायी है अमृतसे ।
पूर्ण करता अवधानसे । मेरी चाह ॥ २४ ॥
अजी ! कृपा-दृष्टिकी वृष्टि आपकी । करती है सृष्टि सकलार्थ मतिकी ।
सूखेगी कली अंकुरीत मतिकी । आपकी उदासीसे ॥ २५ ॥
देते हैं आप सहज अवधान । मिलता उससे वक्तृत्वको अन्न ।
जिससे होते हैं अक्षर संपन्न । सिद्धान्तोंसे ॥ २६ ॥
राह देखता तब अर्थ शब्दकी । सृष्टी होती नव-नव आशयकी ।
बहार आती है भाव सुमनोंकी । मति पर सतत ॥ २७ ॥
रहता है जहां संवादका उल्लास । बरसता स्वारस्वत हृदयाकाश ।
सूखता है वह सारस्वतका रस । जहां श्रोता हो दुश्चित्त ॥ २८ ॥
अजी ! चंद्रकान्त मणि द्रवता । वह द्रावकता चंद्र ही देता ।
वैसा वक्ता वक्ता नहीं हो सकता । बिन श्रोताके ॥ २९ ॥
हमें अब मधुर कर लेना । ऐसा क्या तंदुलोंको है कहना ।
या गुड़ियाको प्रार्थना करना । सूत्र धारसे कया ॥ ३० ॥
वह क्या गुड़ियाके लिये नचाता । या अपना कल-ज्ञान है बढ़ता ।
इसीलिए हमारा क्या आता जाता । इस झमेलेसे ॥ ३१ ॥
“अरे क्या हुआ पूछा तब श्रीगुरुने । कहा “तुम्हारा विनय सुना हमने ।”
“कहो अब क्या कहा श्री नारायणने । धनंजयसे ॥ ३२ ॥
संतोषसे निवृत्तिका दास । “जी ! जी !!” कह कर स-उल्लास ।
बोले किया यह उपदेश । श्री कृष्णने तब ॥ ३३ ॥
भगवान उवाच
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १ ॥
श्री भगवानने कहा
कहूंगा गुह्य जो श्रेष्ठ निष्पाप तुझसे अब ।
विज्ञान सह जो ज्ञान छुडाता दोषसे बडे ॥ १ ॥
२५१ राज-विद्या-समर्पणयोग

सरल बुद्धिके जिज्ञासुके सम्मुख गुह्यका उद्घाटन—
अथवा जो है यह बीज । कहता हूँ मैं तुझे आज ।
मेरे हृदयका है गुह्य । जीवनका पार्थ ॥ ३४ ॥
हृदयका गूढ़ क्यों ऐसा खोलना । वह गूढ़ भी मुझसे क्यों कहना ।
आती ऐसी यदि मनमें कल्पना । है वह स्वाभाविक ॥ ३५ ॥
तो तू सुन ले हे प्राज्ञ । तू है आस्थाकी ही संज्ञा ।
कही बातकी अवज्ञा । जानता नहीं ॥ ३६ ॥
टूटा तब अपना गूढ़पन । कहें न कहने जैसे वचन ।
किंतु अपना जो अन्तःकरण । उतरे तुझमें ॥ ३७ ॥
अजी ! स्तनमें क्षीर गुप्त होता । स्तनको क्यों मधुर नहीं होता ।
आत्मीय मिलता तब स्रवता । सहज-भावसे ॥ ३८ ॥
खत्तीमेंसे बीज निकाला । जोती हुई भूमिमें डाला ।
“व्यर्थ गया वह” ऐसा भला । कह सकते क्या ? ॥ ३९ ॥
जब सुमन औ, शुद्ध मति । अनिंदक जो अन्यन-गति ।
गूढ़ बात भी उसके प्रति । सुखसे कहना ॥ ४० ॥
इन गुणोंसे संपन्न अब । बिना तेरे कोई नहीं तब ।
तुझसे अपना गुह्य सब । नहीं छिपाता ॥ ४१ ॥
गुरु-मुखसे श्रवण करनेके बादही पवित्र ज्ञानका अनुभव—
गूढ़ कहनेसे पुनः पुनः । चमत्कृत होगा तेरा मन ।
अब कहूँगा ज्ञान-विज्ञान । सहज-भावसे ॥ ४२ ॥
सत्य-असत्य सन जाने पर । उसका यथार्थ चुनाव कर ।
निकालना जैसे परख कर । कहूँगा मैं वैसे ॥ ४३ ॥
अपनी चोंचकी संडसीसे जैसे । विभेदता हंस नीर-क्षीर वैसे ।
कहूँगा ज्ञान-विज्ञान तुझसे । रहस्य मैं आज ॥ ४४ ॥
अनाजसे सना हुआ भूसा । हवासे उड़ाकर जैसा ।
धानका ढेर होता है आपका । वैसे ही पार्थ ॥ ४५ ॥
ज्ञानेश्वरी २५२

अजी ! जानकारको वह ज्ञान । भवको करके भवमें लीन ।
देता मोक्ष-लक्ष्मीका सिंहासन । मोक्षार्थीको ॥ ४६ ॥
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥ २ ॥
ज्ञान जो विद्याओंके ग्राममें । गुरुत्वसे आचार्य-पदमें ।
सकल गुह्यके स्वामित्वमें । पवित्रम है ॥ ४७॥
तथा धर्मका जो निज-धाम । वैसे ही उत्तमका उत्तम ।
पानेसे जिसे नहीं है काम । जन्मांतरका ॥ ४८ ॥
दीखा अल्पसा गुरु-मुखसे उदित । तथा हृदयमें स्वयमेव स्थित ।
प्रत्यक्ष रूपमें होता है अनुभूत । अपने आप ॥ ४९ ॥
सुखकी पावरीसे हो उत्थान । जिससे करना होता मिलन ।
होनेसे अजी ! उससे मिलन । मिटता है भोग ॥ ५० ॥
किंतु भोगके इस तीर । चित्त खडा सुखसे भर ।
वैसे सुलभ औ' सुन्दर । तथा पर-ब्रह्म ॥ ५१ ॥
इसकी है एक महत्ता । पाने पर कभी नहीं खो जाता ।
अनुभवनेसे नहीं घटता । औ' बिगड़ता नहीं ॥ ५२ ॥
अर्जुन ! तू है तर्क-कुशल । यहां होकरके शंकाकुल ।
ऐसी वस्तु लोंगोंमें कुशल । रही कैसे जी ॥ ५३ ॥
वृद्धिके लिए एकोत्तरकी । गोदमें जाते जलती ज्वालाकी ।
वे क्या अनायाससे सु-सुखकी । छोड़ेंगे क्या माधुरी ॥ ५४॥
किंतु पवित्र तथा रम्य । वैसे सुखोपायसे गम्य ।
तथा स्वसुख परंतु धर्म्य । अपनेमें ही मिलता ॥ ५५ ॥
मूर्ख लोग हृदयको छोडकर बाहरी सुखके पीछे पडते हैं —
सब प्रकारसे ऐसा सुखकर । किंतु लोक सेवनसे बचकर ।
भ्रमका कारण यह धनुर्धर । रहा वह तज तू ॥ ५६ ॥
————————————————————————————————
राज-विद्या महा गुह्य उत्तमोत्तम पावन ।
प्रत्यक्ष बोध-दाता जो धर्म-सार सनातन ॥ २ ॥
२५३ राज-विद्या-समर्पणयोग

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप ।
अप्राप्य मां निवर्तते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥३॥
देख तू दूध पवित्र तथा मधुर । पास ही है त्वचाके पदरके पार ।
किंतु किलनी सदा उसे छोड़कर । चूसती रक्त-मात्र ॥ ५७ ॥
या कमलकंद औ' दादुर । रहते हैं सदा एक घर ।
किंतु पराग खाता भ्रमर । दूसरा कीचड़ ॥ ५८ ॥
अथवा अभागीके परिवारमें । गड़ी स्वर्ण मुद्रा पड़ी सहस्रमें ।
किंतु भूखे मरते हैं दारिद्र्यमें । बैठकर पार्थ ॥ ५९ ॥
वैसे हृदयमें बसा है राम । सकलैश्वर्य सुखका आराम ।
किंतु भ्रांतका है सदा काम । विषयका ही ॥ ६० ॥
दूर देख करके मृगजल । आधा निगला अमृत उगल ।
शुक्ता लाभार्थ डाला निकाल । गलेका पारसमणि ॥ ६१ ॥
मैं सर्वत्र हूं, यह विश्व मेरा ही विस्तार है—
अहं ममतामें जो व्यस्त । मुझे नहीं पाते हैं त्रस्त ।
जन्म मृत्यु प्रवाह ग्रस्त । रहते पार्थ ॥ ६२ ॥
नहीं तो मैं रहता हूँ कैसा । सम्मुख भानु-बिंब हूँ ऐसा ।
कभी वह उदयअस्त-सा । किंतु मैं हूँ सतत ॥ ७३ ॥
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ ४ ॥
नाम है मेरे विस्तारका । जान तू संपूर्ण जगतका ।
जैसा दही होता है दूधका । सहज जमकर ॥ ६४ ॥
जैसा बीजका वृक्ष बनता । या सोनेका गहना बनता ।
वैसा है मेरा विस्तार होता । जगतके रूपमें ॥ ६५ ॥


लोग नास्तक जो धर्म अश्रद्धासे न चाहते ।
मृत्यूकी चलते राह भवमें मुझ छोडके ॥ ३ ॥
अव्यक्त रूपसे मैंने वेरा है जगको सब ।
मुझमें रहते भूत उनमें मैं नहीं रहा ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वरी २४४

वह अव्यक्त जो जमा हुआ । वही विश्वाकार पिछला हुआ ।
अमूर्त मूर्तमें मै फैला हुआ । त्रैलोक्य रूपमें ॥ ६६ ॥
महत्तत्वसे शरीर तक । यहांके भूत जो हैं अशेष ।
मुझमें भास होते सम्यक । पानी पर झागसा ॥ ६७ ॥
जैसे झागमें न दीखता नीर । स्वप्नकी त्रिविधता धनुर्धर ।
नहीं दीखती जैसे जगकर । वैसे ही जान ॥ ६८ ॥
भास होते हैं भूत मुझमें । किंतु मैं नहीं जान उनमें ।
कही है पहले सातवेंमें । तुझे यह बात ॥ ६९ ॥
कही हुई बातका तब । विचार रहने दो अब ।
तेरा ध्यान मुझमें अब । पैठने दो ॥ ७० ॥
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥ ५ ॥
हमारा भाव जो प्रकृति अतीत । देखने लगो तो कल्पना रहित ।
मुझमें सभी भूत हैं यह व्यर्थ । सब मैं होनेसे ॥ ७१ ॥
संकल्पके संध्याकालमें जैसे । बुद्धि चक्षु मंद होते तमसे ।
तत्र अखंडित किंतु अस्पष्टसे । दीखते भूत भिन्न हैं ॥ ७१ ॥
होता जब संकल्प-संध्या लोप । तब अखंडित ही है स्वरूप ।
संदेह जाते जैसे होता लोप । मालाका सर्पपन ॥ ७३ ॥
मेरे शुद्ध रूपमें कल्पनासे विश्व उत्पन्न होता है
भूमिमेंसे क्या अपने आप । अंकुरते मटकोंके रूप ।
जैसे कुलाल मतिके छाप । अंकुरते सब ॥ ७४ ॥
है क्या सागरका पानी । बनी तरंगोंकी खानी ।
है अवांतर करनी । वायुकी वह ॥ ७५ ॥
है क्या कपासका उदर । कपड़ेका बना आगर ।
ओढण्याको है मनोहर । बना कपड़ा ॥ ७६ ॥
या नहीं मुझमें भूत देख तू दिव्य योग जो ।
सृजता पालता भूत उनमें रहता नहीं ॥ ५ ॥
२५५ राज-विद्या-समर्पणयोग

होने पर स्वर्णके अलंकार । स्वर्णत्वमें नहीं आता अंतर ।
नाना रूप उसके मनोहर । भूषितकी दृष्टिसे ॥ ७७ ॥
अजी ! प्रतिध्वनिका प्रत्युत्तर । या क्या प्रतिबिंबका आविष्कार ।
होता जो प्रति रूप ही आखर । या स्वयं भिन्न वस्तु ॥ ७८ ॥
वैसे है मेरा निर्मल स्वरूप । उसपे होता भूत-भावना आरोप ।
जिसका भासता है संकल्प । कल्पना रूप ॥ ७९ ॥
मिटती जब प्रकृति कल्पित । भूताभास नहीं रहता पार्थ ।
फिर शुद्ध स्वरूप अखंडित । रहता मेरा ॥ ८० ॥
जब है सिर चक्कर खा जाता । तब भासता है विश्व फिरता ।
अपनी कल्पनासे भास होता । भूतोंका अखंडमें ॥ ८१ ॥
वही तू कल्पना छोड़कर देख । मैं भूतोंमें भूत मुझमें अनेक ।
स्वप्नोंमें भी नहीं होगा सविवेक । विचारने योग्य ॥ ८२ ॥
भूतोंको करता मैं धारण । या भूतोंमें है मेरा जीवन ।
संकल्प सन्निपात कारण । होती ये बातें ॥ ८३ ॥
इसलिए सुन तू प्रियोत्तम । ऐसा मैं विश्वाका हूँ विश्वात्म ।
जो हो इस झूठे भूत-ग्राम । आश्रयदाता ॥ ८४ ॥
लेकर जैसे रवि-रश्मिका आधार । मृग-जल मिथ्या भासता भूमि पर
वैसा जान भास भूतोंका मुझ पर । और मुझे सत्य ॥ ८५ ॥
ऐसा हूँ मैं भूत-भावन । औ' सब भूतोंसे अभिन्न ।
जैसे भानु-रश्मि अभिन्न । होते हैं पार्थ ॥ ८६ ॥
यह है ऐश्वर्य-योग हमारा । देखा न तूने भला धनुर्धरा ।
इसमें है क्या कह तू आसरा । भूत भेदका ॥ ८७ ॥
इसलिए भूत मुझसे । न है भिन्न किसी रूपसे ।
अथवा हूँ भिन्न भूतोंसे । मैं यह नहीं मानता ॥ ८८ ॥
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥ ६ ॥
आकाशमें महा-वायु रहे सर्वत्र हो सदा ।
मुझमें हैं सभी भूत रहते जान तू यह ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी २५६

अजी ! आकाश होता जितना जैसा । पवन होता उतना ही औ' वैसा ।
हिलानेसे भास होता भिन्न ऐसा । नहीं तो उतना ही ॥ ८९ ॥
वैसे भूत मात्र मुझमें । भास होते हैं कल्पनामें ।
नहीं होता निर्विकल्पमें । वहां मैं ही सर्वत्र ॥ ९० ॥
नहीं औ' है यह कल्पनाका औरस । कल्पना लोपसे होता है वह अंश ।
कल्पनाके संग होता है भूताभास । पांडुकुमार ॥ ९१ ॥
मिटती है जब कल्पना मूलतः । तब वहां है या नहीं यह जाता ।
इसलिये तू आगे यह देखता । ऐश्वर्य योग ॥ ९२ ॥
ऐसा है यह प्रति-बोध सागर । अपनेको कर उसकी लहर ।
तब तू देखेगा सब स-चराचर । आप ही है ॥ ९३ ॥
ज्ञान-जागृति अब अर्जुन । हुई न यह पूछते कृष्ण ।
अब तो भंग हो द्वैत-स्वप्न । है जो मिथ्या ॥ ९४ ॥
फिर तुझे यदि शायद । आएगी कल्पनाकी नींव ।
मिटेगा अभेदका बोध । पड़ेगा स्वप्न ॥ ९५ ॥
जिससे टूटेगा निद्राका पथ । उद्बोध-रूप हो आप पार्थ ।
कहता अब ऐसा गुपित । खोल करके ॥ ९६ ॥
इंद्रियोंके अंतर्मुख होनेसे ईश्वरका अनुभव आता है—
तब हे धनुर्धर स-धैर्य । अवधान दे तू धनंजय ।
सब भूतोंको है यह माया । करती हरनी जो ॥ ९७ ॥
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ ७ ॥
जिसका नाम ही प्रकृति है । तुझसे जो द्विविध कही है ।
एक अष्ठधा भेद्युत है । दूसरी जीव रूप ॥ ९८ ॥
मेरी प्रकृतिमें सोते भूत कल्पांतमें सभी ।
जगाता सबको मैं ही कल्प-आरंभमें स्वयं ॥ ७ ॥
२५७      -राज-विद्या-समर्पणयोग
(33)

यह प्रकृति विषय संपूर्ण । सुना तूने पहले अर्जुन ।
इसीलिए कहता हूं सुन । अगली बात ॥ ९९ ॥
यह है मेरी प्रकृति । महा कल्पांतमें होती ।
ऐक्य-लीन भूत-जाति । मुझ अव्यक्तमें ॥ १०० ॥
ग्रीष्मके प्रखर तापमें । बीज सह दूब भूमिमें ।
ऐक्य होती पूर्ण रूपमें । धनुर्धर ॥ १ ॥
या वर्षा आडंबर मिटता । शरदका परदा खुलता ।
जैसे घन-जात लय होता । गगनका गगनमें ॥ २ ॥
अथवा आकाशका घर । नीरमें तरंग सुंदर ।
लोपता वायु औ' आकार । वैसे ही ॥ ३ ॥
तथा जागते ही जैसा स्वप्न । मनके मनमें होता लीन ।
प्राकृत प्रकृतिमें ही लीन । कल्पक्षयमें ॥ ४ ॥
जब फिर कल्पारंभ होता । कहते हैं मैं सृष्टि सृजता ।
इस विषयमें मैं कहता । सुन तू पार्थ ॥ ५ ॥
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ८ ॥
तब है यह जो प्रकृति । करती सहज स्वीकृति ।
तंतु समवाय दीखती । पटमें बुनायी जैसे ॥ ६ ॥
लेकर उस बुनायीका आधार । भरते वस्त्र बन छोटे चौकोर ।
प्रकृति पंचात्मक आकार । लेती है वैसे ॥ ७ ॥
लेकर जामूनका आधार । दूध लेता दहीका आकार ।
वैसे प्रकृति रूप सुंदर । लेती है सृष्टिका ॥ ८ ॥
बीज होता पानीके नजदीक । औ' वही होता शाखोपशाख ।
वैसा मेरा ही कारण देख । भूत जातका यह ॥ ९ ॥
प्रकृति हाथमें लेके जगाता मैं पुनः पुनः ।
भूतोंका संघ संपूर्ण प्रकृतिके अधीन जो ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी २५८

अजी ! राजाने बसाया नगर । सच कहनेका यह प्रकार ।
थक गया क्या राजाका शरीर । नगर बसाके ॥ ११० ॥
मैं प्रकृति-अधिष्ठान कैसे । कोई स्वप्नमें रहता जैसे ।
फिर वही प्रवेशता जैसे । जागृतावस्थामें ॥ ११ ॥
स्वप्नसे जागृतिमें आते । उसके क्या पैर दुखते ।
अथवा स्वप्नमें रहते । होता क्या प्रवास ॥ १२ ॥
इसका है यह अभिप्राय । जो यह भूत-सृष्टिका कार्य ।
चलता उसमें करणीय । मुझे कुछ भी नहीं ॥ १३ ॥
या राजाकी आश्रित प्रजा जैसे । बरतती अपने लिए वैसे ।
प्रकृतिके साथ मेरा भी वैसे । संबंध है यहां ॥ १४ ॥
पूर्णचंद्रसे मिलकर । आता सिंधु उमडकर ।
तत्र चंद्रको धनुर्धर । श्रमना है क्या ॥ १५ ॥
पासका लोह जो अ-चेतन । हिलता रहता यथा-स्थान ।
उससे चुंबकको सहन । करना क्या कष्ट ॥ १६ ॥
ऐसा निज-प्रकृति स्वीकार । करता हूं मैं पांडुकुमार ।
ऐसी भूत-सृष्टि सरासर । प्रसवती जाती ॥ १७ ॥
जो है यह भूतग्राम संपूर्ण । रहता है प्रकृतिके आधीन ।
जैसे बीजसे अंकुर अर्जुन । उपजाती भूमि ॥ १८ ॥
अथवा बाल्यादि अवस्थात्रय । लेकर शरीरका ही आश्रय ।
गगनकी मेघावली प्रश्रय । लेती वर्षा-ऋतुका ॥ १९ ॥
या स्वप्नका कारण निद्रा । वैसी प्रकृति है नरेंद्र ।
जो सम्पूर्ण भूत समुद्र । स्वामिनी प्रकृति ॥ १२० ॥
स्थावर औ' जंगम । स्थूल अथवा सूक्ष्म ।
ऐसा जो भूत ग्राम । प्रकृति मूल ॥ २१ ॥
इसलिए भूतमात्रोंका सृजन । या सृजित भूतोंका प्रतिपालन ।
करना नहीं पडता अर्जुन । हमको कभी ॥ २२ ॥
जलमें फैलती चन्द्रिकाकी लता । उसे चन्द्रको फैलाना न पडता ।
वैसे मुझसे दूर ही है रहता । कर्मजाल ॥ २३ ॥
२५९ राज-विद्या-समर्पणयोग