ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराज-विद्या = समर्पणयोग
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पित्र-रूपमें गुरु-वंदन—
अजी ! ध्यानसे चित दीजिये । सब सुखका पात्र बनिये ।
प्रतिज्ञोत्तर यह सुनिये । प्रकट बात ॥ १ ॥
प्रौढ़तासे यह नहीं बोलता । आप सर्वज्ञोंसे स-ममता ।
ध्यान दें यह विनय करता । सर्वज्ञ-समाजसे ॥ २ ॥
लाड़लेके सब लाड़ पूर्ण होते । सब ही मनोरथ संपन्न होते ।
मातापिता जब हैं श्रीमंत होते । आपके समान ॥ ३ ॥
आपकी कृपा-दृष्टिके रससे । प्रसन्नताका बाग खिलनेसे ।
उसकी छायामें सोता, सुखसे । शांत जो मैं ॥ ४ ॥
प्रभु आप हैं सुखामृतके सागर । हम पाते शीतलता इच्छानुसार ।
यहां पर भी स्नेहार्थ सकुचाकर । कहां पायें शांति ॥ ५ ॥
यों तो बालक तुतलाता । टेढ़ा मेढ़ा पग रखता ।
उससे स-कौतुक माता । रीझती सदा ॥ ६ ॥
वैसा आप सन्तोंका प्रेम । चाहते जिसे सदा हम ।
इसीलिये करते प्रेम । श्री चरणोंमें ॥ ७ ॥
बोलनेमें क्या है मेरी योग्यता । जहां सर्वज्ञ भावा-दृश श्रोता ।
सरस्वती सुत है क्या सीखता । देकर पाठ ॥ ८ ॥
कितना ही बड़ा क्यों न हो ज्योतिरिंगण । नहीं प्रकाशता भानुबिंबके समान ।
नहीं मिलता अमृत थाळ सम पकवान्न । उसका उपाय क्या ? ॥ ९ ॥
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