ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयदि पुण्य वेदाध्ययनका । तथा बहार यज्ञ-फलका ।
प्राप्त सर्वस्व तप दानका । धनंजय ॥ ६१ ॥
मिलकर सब पुण्यका खेत । बहर पकने पर भी पार्थ ।
ब्रह्मानंदकी तुलनामें व्यर्थ । जो नित्य निर्मल ॥ ६२ ॥
तुलनामें जो नित्यानंदके । तुलामें डाले तो उपमाके ।
थोड़ा नहीं है उस सुखके । साधन यज्ञादि हैं ॥ ६३ ॥
न नासता जो न खूटता । भोगीको सदा तृप्ति देता ।
भावी महा-सुखका होता । बंधुही यह ॥ ६४ ॥
ऐसे जिस दृश्य सुखका । अधिष्ठान हैं संसारका ।
प्राप्तव्य है शत-मखका । न मिलता कभी ॥ ६५ ॥
उस अलौकिकको योगीश्वर । तोलता है हथेली पर ।
स-कौतुक अनुमान कर । कहता हलका ॥ ६६ ॥
फिर जिस सुखका अर्जुन । रचकर भलासा सोपान ।
प्राप्त करता है सिंहासन । ब्रह्म-सुखका ॥ ६७ ॥
ज्ञानेश्वरका उपसंहार—
ऐसा जो चराचरैक्य भाग्य । ब्रह्मेशके आराधना योग्य ।
योगी जनके महायोग्य । योग धन जो ॥ ६८ ॥
वह सकल कलाकी कला । परमानंदका है पुतला ।
जीवोंका परम जिव्हाला । विश्वके जो ॥ ६९ ॥
सर्वज्ञताका है जो जीवन । यादव कुलदीप पावन ।
बोला धनंजयसे श्रीकृष्ण । इस भांति ॥ २७० ॥
कुरु क्षेत्रकी ऐसी कथा । संजय राजासे कहता ।
उसीको है आगे सुनाता । ज्ञानदेव निवृत्तिदास ॥ २७१ ॥
गीता श्लोक २८
ज्ञानेश्वरी ओवी २७१.