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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 311

वैसे ही सब शरीराचार । न चलते चलते सुंदर ।
जैसे रविके न चलाकर । चलता त्रिलोक ॥ ८७ ॥
अर्जुन ! यह है ऐसा । शरीरमें निद्रित-सा ।
इसीलिये हैं पुरुष । कहते इसको ॥ ८८ ॥
तथा प्रकृति जो पतिव्रता । उसका है यह पत्नीव्रत ।
इसीलिये यह कहलाता । पुरुष है ॥ ८९ ॥
किंतु वेदोंका भी बहुश्रुतपन । देख न सकता इसका अंगन ।
होता यह गगनका आच्छादन । धनुर्धर ॥ ९० ॥
यह जानकर योगीश्वर । उसको कहते परम पर ।
जो है अनन्यगतिका घर । ढूंढकर आते हैं ॥ ९१ ॥
ऐसा यह अक्षर चैतन्य भक्तिसे प्रष्ट होता है—
जिनका तन मन वचन । नहीं सुनता अन्य कथन ।
पकता एक निष्ठाका धान । इस खेतमें ॥ ९२ ॥
यह त्रैलोक्य ही पुरुषोत्तम । ऐसा सच्चा जिनका मनोधर्म ।
वह सदा आस्तिकोंका आश्रम । है धनंजय ॥ ९३ ॥
जो निर्गर्वियोंका मान । गुणातीतका है ज्ञान ।
सुखका है उपवन । निरिच्छोंका ॥ ९४ ॥
संतोषका परोसा जो पक्वान्न । अचित अनाथोंका मातृ-स्थान ।
भक्ति-नगरका पथ महान । सरल सुलभ ॥ ९५ ॥
यह एकेक कह कर । खोयें क्यों काल धनुर्धर ।
वहां जानेसे वह ठौर । होता है स्वयं ॥ ९६ ॥
जैसे हिम-शीतकी लहर । शीतल करता तप्त नीर ।
या सूर्य सम्मुख आ अंधार । होता प्रकाश ॥ ९७ ॥
वैसे संसार भी अर्जुन । पहुंचकर संपूर्ण ।
बनता है मोक्ष स्थान । अनायास ॥ ९८ ॥
अग्नि-कुंडमें जैसे जो आया । वह ईंघन ही अग्नि भया ।
चुनकर भी हाथ न आया । काष्ठपन फिर ॥ ९९ ॥
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(31) साधकसंदेश