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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 310

पिघलते हैं आभूषण । न गलता उसका स्वर्ण ।
वैसे जीवाकारमें पूर्ण । मर्त्यमें जो अमर ॥ ७८ ॥
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥२१॥
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥२२॥
उस चैतन्यकी व्यक्ताव्यक्तता —
अव्यक्त कहनेसे सकौतुक । स्तुति न होती उसकी सार्थक ।
न आता मन-बुद्धिमें सम्यक । इसी लिये ॥ ७९ ॥
आकारत्व आनेपर जिसका । निराकारत्व न जाता उसका ।
आकार लोपसे भी नित्यताका । न होता लोप ॥ १८० ॥
इसीलिये उसे कहते हैं अक्षर । जिससे बोध होता है सविस्तर ।
न दीखता विस्तार उसके पार । उसका नाम परमगति ॥ ८१ ॥
किंतु मैं देहपुरमें संपूर्ण । रहता हूं निद्रस्तके समान ।
नहीं करता चलन वलन । न करता इसीलिये ॥ ८२ ॥
वैसे शरीरके कोई व्यापार । नहीं रुकते हैं धनुर्धर ।
दस इंद्रियोंके हैं व्यवहार । चलते अव्याहत ॥ ८३ ॥
अंतःकरणके चौराहे पर । लग रहा है विषय-बाजार ।
मिले सुख-दुखका राज कर । मिलता जीवको ही ॥ ८४ ॥
जैसे राजा सुखसे जब सोता । उसका राज-काज न रुकता ।
प्रजा-जन करते सहजता । अपनी इच्छासे ॥ ८५ ॥
वैसे बुद्धिका जानना । मनका है लेना-देना ।
इंद्रियोंका भी करना । तथा स्फुरण वायुका ॥ ८६ ॥
कहा अक्षर अव्यक्त वही है गति अंतिम ।
वही मेरा परं-धाम वहांसे लौटता नहीं ॥ २१ ॥
मिले अनन्य भक्तीसे पार्थ परं-पुरुष जो ।
जिसमें रहते जीव जिससे व्याप्त है जग ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी २४०