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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 313

यह चेतन-वर्ग संपूर्ण । मरण कालमें भी नवीन ।
आकलनसे होता प्रसन्न । ब्रह्म बोधके ॥ २१० ॥
चैतन्य-वर्गका सचेतन । कालमें होता मरणासन्न ।
अग्नि-सहायतासे जान । संभव होता ॥ ११ ॥
हवा या पानीसे जब । बुझती है ज्योति तब ।
देखती क्यों दृष्टि कब । अपनी ही ॥ १२ ॥
वैसे देहावसानकी विषमतासे । देह भरता है अंतरबाह्य श्लेष्मसे ।
तेज बुझता तब अग्निका उससे । सहज धनुर्धर ॥ १३ ॥
न रहता जब प्राणका प्राण । न होता है चेतन्य अग्नि बिन ।
तब रहकर सतेज ज्ञान । क्या होगा शरीरमें ॥ १४ ॥
जब है शरीरका अग्नि जाता । केवल वह कीचड रहता ।
तनमें तब खोजता रहता । मृत्यु घटिका ॥ १५ ॥
पूर्व स्मरण जहां संपूर्ण । थाम लेता कालमें प्रयाण ।
शरीर त्यज ब्रह्म-निर्वाण । पाना स्वरूपमें ॥ १६ ॥
किंतु कीचमें देह श्लेष्मकी । फंसी तब शक्ति चेतनाकी ।
कैसी बात भूत-भविष्यकी । रहेगी स्मरण ॥ १७ ॥
अजी ! जीवन भरका अभ्यास । भूल गया अंतकालमें खास ।
जैसे थाथी देखते ही प्रकाश । बुझा हाथका ॥ १८ ॥
रहने दो यह सकल । ज्ञानको अग्नि ही है मूल ।
अग्निका ही है पूर्ण बल । प्रयाण कालमें ॥ १९ ॥
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ २४ ॥
अंदर अग्नि-ज्योतिका प्रकाश । बाहर शुक्ल पक्ष औ' दिवस ।
तथा षण्मासोंमें कोई भी मास । उत्तरायणका ॥ २२० ॥
अग्निसे दिन शुक्लार्ध जोडके उत्तरायण ।
जाता जो जुडता ब्रह्म अंतमें ब्रह्म जानके ॥ २४ ॥
२४३ वाक्यप्रबोध