ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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पृष्ठ 316, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 316इसीलिये अर्जुन प्रथम । जानना उत्तम अधम ।
इसीलिये अर्जुन प्रथम । जानना उत्तम अधम ।
जाननेसे समयमें काम । होगा सब व्यर्थ ॥ ४२ ॥
वैसे देहांतमें बडा विषम । इन मार्गोंका है बडा संभ्रम ।
जीवन भर अभ्यासका काम । होगा सब व्यर्थ ॥ ४३ ॥
अर्चिरा मार्ग भूलकर । पडे तो धूम्र पथपर ।
पडेंगे संसार-सागर । भंवर-चक्रमैं ॥ ४४ ॥
देख कर ये बडे सायास । किस भांति मिटेंगे त्रास ।
सोचकर यह पथ खास । कहा जायेगा ॥ ४५ ॥
ऐसे ब्रह्मपद महान । दूसरेसे पुनरावर्तन ।
वैसे अंतकालका क्षण । जैसा हो वैसा मिलेगा ॥ ४६ ॥
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥ २७ ॥
तब कहे देव यह नहीं ऐसा । कब क्या मिलेगा जाने कोन कैसा ।
देह-पातसे ब्रह्म बनता जैसा । रहा मार्गसे ही ॥ ४७ ॥
तब रहे या जाये यह तन । हम वह ब्रह्म है यह जान ।
डोरीपे सर्पत्वका आरोपण । मिथ्या है इसलिये ॥ ४८ ॥
मुझे तरलपन है या नहीं । भासता क्या यह पानीको कहीं ।
पानी जो है पानी ही कभी कहीं । वैसे ही पार्थ ॥ ४९ ॥
तरंगाकारसे न जन्मता । तरंग लोपसे न मरता ।
देहमें रहते ब्रह्म होता । देहसे जो ॥ २५० ॥
शरीरत्व नहीं रहा खास । अब उन तत्वज्ञोंके पास ।
भला होगा क्या किसका नाश । इसमें क्या रहा ॥ ५१ ॥
देशकालादि यदि संपूर्ण । भये आपही जब तत्क्षण ।
फिर पथका अनुसंधान । रहा किसके लिये ॥ ५२ ॥
ऐसे जो जानके मार्ग योगी होता न मोहित ।
तभी तू सर्वदा पार्थ योगसे युक्त हो रह ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी २४६