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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 317

अजी ! जब यह घंट फूटता । घटाकाश है राहमें लगता ।
वह महदाकाशमें मिलता । या रहता वहीं ॥ ५३ ॥
यहां है ऐसा प्रकार । मिटता मात्र आकार ।
गगन है एकाकार । सदा सर्वत्र ॥ ५४ ॥
होता है जब यह बोध । न रहता मार्गका द्वैध ।
बनने पर सोऽहं सिद्ध । योगियोंको ॥ ५५ ॥
इसका कारण पांडुसुत । तुम्हे बनना योग-युक्त ।
जिससे सर्वदा समता । रहगी अपनेमें ॥ ५६ ॥
तबहो कुछ भी कभी । देह बंध हो न हो तभी ।
अखंड ब्रह्म बोध कभी । न बिगडेगा ॥ ५७॥
सभी प्रकारके मोहसे मुक्त मनुष्य—
वह कल्पारंभमें न जनमता । कल्पांतमें भी वह नहीं मरता ।
स्वर्ग संसारादिमें नहीं फंसता । सृष्टि-कालमें ॥ ५८ ॥
जिस बोधसे वह योगी बनता । उसकी सरलता अनुभवता ।
अन्य भोगोंको तौलकर तजता । स्वरूपावस्थामें ॥ ५९ ॥
अर्जुन इंद्रादि देव । मानते अपना सर्वस्व ।
वह राज्य-भोग वैभव । मानता तुच्छ ॥ २६० ॥
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव
दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा
योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥ २८ ॥
जो वेदका यज्ञ तथा तपोंका
दानादिका पुण्य कहा गया है ।
जो लांघता सर्व हि जानके तो
योगी चढे आद्य महान धाम ॥ २८ ॥
२४५ शांतत्ययोग