ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह प्रकृति विषय संपूर्ण । सुना तूने पहले अर्जुन ।
इसीलिए कहता हूं सुन । अगली बात ॥ ९९ ॥
यह है मेरी प्रकृति । महा कल्पांतमें होती ।
ऐक्य-लीन भूत-जाति । मुझ अव्यक्तमें ॥ १०० ॥
ग्रीष्मके प्रखर तापमें । बीज सह दूब भूमिमें ।
ऐक्य होती पूर्ण रूपमें । धनुर्धर ॥ १ ॥
या वर्षा आडंबर मिटता । शरदका परदा खुलता ।
जैसे घन-जात लय होता । गगनका गगनमें ॥ २ ॥
अथवा आकाशका घर । नीरमें तरंग सुंदर ।
लोपता वायु औ' आकार । वैसे ही ॥ ३ ॥
तथा जागते ही जैसा स्वप्न । मनके मनमें होता लीन ।
प्राकृत प्रकृतिमें ही लीन । कल्पक्षयमें ॥ ४ ॥
जब फिर कल्पारंभ होता । कहते हैं मैं सृष्टि सृजता ।
इस विषयमें मैं कहता । सुन तू पार्थ ॥ ५ ॥
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ८ ॥
तब है यह जो प्रकृति । करती सहज स्वीकृति ।
तंतु समवाय दीखती । पटमें बुनायी जैसे ॥ ६ ॥
लेकर उस बुनायीका आधार । भरते वस्त्र बन छोटे चौकोर ।
प्रकृति पंचात्मक आकार । लेती है वैसे ॥ ७ ॥
लेकर जामूनका आधार । दूध लेता दहीका आकार ।
वैसे प्रकृति रूप सुंदर । लेती है सृष्टिका ॥ ८ ॥
बीज होता पानीके नजदीक । औ' वही होता शाखोपशाख ।
वैसा मेरा ही कारण देख । भूत जातका यह ॥ ९ ॥
प्रकृति हाथमें लेके जगाता मैं पुनः पुनः ।
भूतोंका संघ संपूर्ण प्रकृतिके अधीन जो ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी २५८