ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजहां मन-बुद्धि-करण । डूबा धूम कुलावरण ।
वहां अनुभवका ज्ञान । डूबा जीवनका ॥ ३१ ॥
जहां हाथका भी जाता । वहां लाभकी क्या कथा ।
प्रयाणकाल अवस्था । होती ऐसे ॥ ३२ ॥
यहां देहमें ऐसी स्थिति । वहां कृष्ण पक्ष औ' रात ।
षण्मासमें घटिका आती । दक्षिणायनकी ॥ ३३ ॥
जब पुनरावर्तनका घर । प्रयाण समयमें जाता भर ।
तब स्वरूप-सिद्धि समाचार । सुने कौन ॥ ३४ ॥
ऐसा जिस योगीका शरीर पडता । योगी होनेसे चंद्रलोक ही मिलता ।
वहांसे फिर पुनरावर्तन होता । संसारमें ॥ ३५ ॥
कहा मैने अनाल अर्जुन । वह यही है इसको जान ।
धूम्रमार्ग पुनरावर्तन । यही है जो ॥ ३६ ॥
यहां वह अर्चिरामार्ग । चलता हुआ औ' सलग ।
सहज सुलभ सुभग । मोक्ष-दायक ॥ ३७ ॥
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥ २६ ॥
किंतु जो सद्रूप है वह किसी मार्गसे आय तो भी ब्रह्मपद पाता है -
ये दो ऐसे अनादि पथ । सरल तथा टेढा पार्थ ।
तभी बताये मैंने सार्थ । तुझको अब ॥ ३८ ॥
क्यों कि मार्ग अमार्ग देखना । सच्चा झूठा यह जान लेना ।
हित अहित समझलेना । अपने हितार्थ ॥ ३९ ॥
कोई भली नांव छोडकर । कूदेगा क्या नदीके भीतर ।
तथा सीधी राह जानकर । चलेगा क्या कुपथ ॥ २४० ॥
जानता जो विष औ' अमृत । छोडता है क्या वह अमृत ।
वैसा कोई छोड सीधा पथ । चलें क्यों टेढा ॥ ४१ ॥
प्रकाश और अंधार दोनों मार्ग अनादि हैं ।
निस्तार करता एक घेरेमें एक डालता ॥ २६ ॥
२४५ आत्मबोध