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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 320

हिमकरको पंखा झलना । नाद-ब्रह्मको गाना सुनाना ।
अथवा भूषणको सजाना । होता क्या ऐसा ? ॥ १० ॥
कहिए सुगंधको क्या सूंघना । सागरको कहां स्नान कराना ।
आकाशको जिसमें समाना । क्या लावें ऐसा ॥ ११ ॥
आप सब जिससे तृप्त होंगे । जिसको सु-प्रवचन कहेंगे ।
सुनके मनमें प्रसन्न होंगे । ऐसा वक्तृत्व कहां ? ॥ १२ ॥
किंतु प्रकट होते ही गभस्ति । न उतारते क्या हाथ आरती ।
न देते क्या अर्ध्यांजलि स-भक्ति । महा-सागरको ॥ १३ ॥
आप हैं स्वामी महेशकी मूर्ति । दुबला मैं पूजता हूँ स-भक्ति ।
तभी बिल्व छोड़ दूं गंगावती । स्वीकार करेंगे ॥ १४ ॥
पिताकी थालमें हाथ डाल कर । खिलाता शिशु जब पिताको कौर ।
प्रेम-भरसे तब पिता सत्वर । झुकके खोलता मुख ॥ १५ ॥
वैसा मैं करता हूँ आपसे । तुतलाता हूँ बाल-मतिसे ।
तथा सुनते आप मोदसे । यह है प्रेम-भाव ॥ १६ ॥
ऐसी आत्मीयतासे मोहित । सन्त-समूह है अति-ग्रस्त ।
नहीं होगा स्नेहका किंचित् । भार आपको ॥ १७ ॥
आघात करता जब शिशुका मुख । प्रेमार्द्र-माता स्तन्य देती अधिक ।
रोषसे बढ़ता सदा प्रेम अधिक । प्रिय-वस्तुके ॥ १८ ॥
मुझ बालकका यह वचन । आपका निद्रस्त कृपालूपन ।
जागृत करेगा यह मैं जान । बोला हूँ आपसे ॥ १९ ॥
कार्यकी और गुरु-कृपाकी महत्ता—
पकाते क्या कभी पालमें चांदनीको । पंखेसे गति देते हैं क्या पवनको ।
खोल चढ़ाते कैसे कहो गगनको । मुझसे आप ॥ २० ॥
तरल नहीं करना पड़ता पानी । नवनीतमें नहीं पैठती मथनी ।
लज्जित हो अभिव्यक्त न होती वाणी । आपके सम्मुख ॥ २१ ॥
शब्द-ब्रह्म जिस खटौले पर । सोता है शब्द कुंठित हो कर ।
देश-भाषामें यह गीता-सार । कहनेकी योग्यता क्या ? ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी २५०