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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 323

अजी ! जानकारको वह ज्ञान । भवको करके भवमें लीन ।
देता मोक्ष-लक्ष्मीका सिंहासन । मोक्षार्थीको ॥ ४६ ॥
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥ २ ॥
ज्ञान जो विद्याओंके ग्राममें । गुरुत्वसे आचार्य-पदमें ।
सकल गुह्यके स्वामित्वमें । पवित्रम है ॥ ४७॥
तथा धर्मका जो निज-धाम । वैसे ही उत्तमका उत्तम ।
पानेसे जिसे नहीं है काम । जन्मांतरका ॥ ४८ ॥
दीखा अल्पसा गुरु-मुखसे उदित । तथा हृदयमें स्वयमेव स्थित ।
प्रत्यक्ष रूपमें होता है अनुभूत । अपने आप ॥ ४९ ॥
सुखकी पावरीसे हो उत्थान । जिससे करना होता मिलन ।
होनेसे अजी ! उससे मिलन । मिटता है भोग ॥ ५० ॥
किंतु भोगके इस तीर । चित्त खडा सुखसे भर ।
वैसे सुलभ औ' सुन्दर । तथा पर-ब्रह्म ॥ ५१ ॥
इसकी है एक महत्ता । पाने पर कभी नहीं खो जाता ।
अनुभवनेसे नहीं घटता । औ' बिगड़ता नहीं ॥ ५२ ॥
अर्जुन ! तू है तर्क-कुशल । यहां होकरके शंकाकुल ।
ऐसी वस्तु लोंगोंमें कुशल । रही कैसे जी ॥ ५३ ॥
वृद्धिके लिए एकोत्तरकी । गोदमें जाते जलती ज्वालाकी ।
वे क्या अनायाससे सु-सुखकी । छोड़ेंगे क्या माधुरी ॥ ५४॥
किंतु पवित्र तथा रम्य । वैसे सुखोपायसे गम्य ।
तथा स्वसुख परंतु धर्म्य । अपनेमें ही मिलता ॥ ५५ ॥
मूर्ख लोग हृदयको छोडकर बाहरी सुखके पीछे पडते हैं —
सब प्रकारसे ऐसा सुखकर । किंतु लोक सेवनसे बचकर ।
भ्रमका कारण यह धनुर्धर । रहा वह तज तू ॥ ५६ ॥
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राज-विद्या महा गुह्य उत्तमोत्तम पावन ।
प्रत्यक्ष बोध-दाता जो धर्म-सार सनातन ॥ २ ॥
२५३ राज-विद्या-समर्पणयोग