ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 322, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंसरल बुद्धिके जिज्ञासुके सम्मुख गुह्यका उद्घाटन—
अथवा जो है यह बीज । कहता हूँ मैं तुझे आज ।
मेरे हृदयका है गुह्य । जीवनका पार्थ ॥ ३४ ॥
हृदयका गूढ़ क्यों ऐसा खोलना । वह गूढ़ भी मुझसे क्यों कहना ।
आती ऐसी यदि मनमें कल्पना । है वह स्वाभाविक ॥ ३५ ॥
तो तू सुन ले हे प्राज्ञ । तू है आस्थाकी ही संज्ञा ।
कही बातकी अवज्ञा । जानता नहीं ॥ ३६ ॥
टूटा तब अपना गूढ़पन । कहें न कहने जैसे वचन ।
किंतु अपना जो अन्तःकरण । उतरे तुझमें ॥ ३७ ॥
अजी ! स्तनमें क्षीर गुप्त होता । स्तनको क्यों मधुर नहीं होता ।
आत्मीय मिलता तब स्रवता । सहज-भावसे ॥ ३८ ॥
खत्तीमेंसे बीज निकाला । जोती हुई भूमिमें डाला ।
“व्यर्थ गया वह” ऐसा भला । कह सकते क्या ? ॥ ३९ ॥
जब सुमन औ, शुद्ध मति । अनिंदक जो अन्यन-गति ।
गूढ़ बात भी उसके प्रति । सुखसे कहना ॥ ४० ॥
इन गुणोंसे संपन्न अब । बिना तेरे कोई नहीं तब ।
तुझसे अपना गुह्य सब । नहीं छिपाता ॥ ४१ ॥
गुरु-मुखसे श्रवण करनेके बादही पवित्र ज्ञानका अनुभव—
गूढ़ कहनेसे पुनः पुनः । चमत्कृत होगा तेरा मन ।
अब कहूँगा ज्ञान-विज्ञान । सहज-भावसे ॥ ४२ ॥
सत्य-असत्य सन जाने पर । उसका यथार्थ चुनाव कर ।
निकालना जैसे परख कर । कहूँगा मैं वैसे ॥ ४३ ॥
अपनी चोंचकी संडसीसे जैसे । विभेदता हंस नीर-क्षीर वैसे ।
कहूँगा ज्ञान-विज्ञान तुझसे । रहस्य मैं आज ॥ ४४ ॥
अनाजसे सना हुआ भूसा । हवासे उड़ाकर जैसा ।
धानका ढेर होता है आपका । वैसे ही पार्थ ॥ ४५ ॥
ज्ञानेश्वरी २५२