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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६ ॥
सूक्ष्म प्रकृति जब लीलासे । पाती स्थूलके परिणामसे ।
निकलती है टंकसालसे । भूत सृष्टि ॥ २२ ॥
उद्बीज, जारज, स्वेदज, अंडज । टंकसालसे निकलते सहज ।
उसके मूल्य है समान महज । आकार भिन्न ॥ २३ ॥
होते हैं चौरासी लक्षके आकार । उसकी सीमा न जानता भांडार ।
भर जाता है आदिशून्यका घर । इन नाणोंसे ॥ २४ ॥
पंच भौतिक ऐसे बहुतसे । रंग रूप धरते हैं एकसे ।
उसको लिखती है नियमसे । स्वयं प्रकृति ही ॥ २५ ॥
नाण्य आकृतिका प्रसार करती । फिर उसको घट्या भी करती ।
कर्माकर्म व्यवहारमें कराती । प्रवर्तन स्वयं ॥ २६ ॥
जाने दो यह रूपक कुशल । कहता हूं तुझको मैं सरल ।
नाम रूपका विस्तार विशाल । करती है प्रकृति ॥ २७ ॥
तथा प्रकृति मुझमें बिंबित । इसमें नहीं है अन्यथा बात ।
तभी सृष्टिका आदि मध्य अंत । जानो मुझको ही ॥ २८ ॥
मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ ७ ॥
यह जो रोहिणीका जल । उसका देखनेसे मूल ।
रवि-रश्मि नहीं केवल । है वह भानु ॥ २९ ॥
इसी भांति सुन किरीटी । परा प्रकृतिसे जो सृष्टि ।
उस पार जाय तो दृष्टि । वहां हूं मैं ॥ ३० ॥
इन दोसे सभी भूत होते उत्पन्न जान तू ।
उसीसे विश्व है सारा मैं ही हूं मूल अंत भी ॥ ६ ॥
नहीं है दूसरा तत्व मुझसे पर जो रहे ।
पिरोया मुझमें सारा धागेमें मणि मान जो ॥ ७ ॥
२०३ ज्ञान-विज्ञानयोग

ऐसा हू मै सबका आधार । मुझमें सृष्टि स्थिति संहार ।
जैसा मणियोंमें होता डोर । आधार रूप ॥ ३१ ॥
जैसे सुवर्णके मणि किये । सुवर्ण सूत्रमें वे पिरोये ।
वैसे सृष्टिका धारण किये । रहा हूं मै ॥ ३२ ॥
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ ८ ॥
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ ९ ॥
इसीलिये उदकमें रस । अथवा पवनमें जो स्पर्श ।
तथा शशि सूर्यमें प्रकाश । वह मै ही जान ॥ ३३ ॥
वैसा ही नैसर्गिक शुद्ध । पृथ्वीमें रहता जो गंध ।
तथा गगनमें मै शब्द । प्रणव वेदमें ॥ ३४ ॥
नरमें जो होता नरत्व । अहंभावका जो है सत्व ।
वह पौरुष मैं औ' तत्व । कहता तुझे ॥ ३५ ॥
अग्निका भी अर्जुन ऐसा ही है । वह तेजका निरा कवच है ।
उसके परे जो निज तेज है । वह मै ही जान ॥ ३६ ॥
तथा जो नानाविध योनियोंमें । जनमके प्राणी त्रिभुवनमें ।
आचरण करते हैं जीवनमें । अपने पार्थ ॥ ३७ ॥
एक पवन ही है पीता । दूसरा तृणार्थ है जीता ।
कोई अन्नाधार रहता । जलपे एक ॥ ३८ ॥
सब भूतोंका जो है अन्न । प्रकृतिवश है जीवन ।
उन सबमें जो अभिन्न । मै ही केवल ॥ ३९ ॥
हुवा मैं रस पानीमें प्रकाश चंद्र-सूर्यमें ।
वेदमें ॐ 'ख' में शब्द नरोंमें पुरुषार्थ मैं ॥ ८ ॥
मैं पुण्य गंध पृथ्वीमें उष्णता अग्निमें बना ।
.आयुष्य प्राणि-मात्रोंमें तापसोंमें बना तप ॥ ९ ॥
ज्ञानेश्वरी २०४

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥
विश्वोत्पत्तिके कालमें जो था । गगन अंकुरसे खिलाथा ।
अंतमें अक्षर निगलाथा । प्रणव पटके ॥ ४० ॥
अब यह विश्वाकार रहता । विश्वके समानही है दीखता ।
महा-प्रलय दशामें है होता । निराकार ॥ ४१ ॥
ऐसा अनादि जो सहज । वह मैं ही हूं विश्व-बीज ।
हथेली पर वह आज । देता हूं तुझे ॥ ४२ ॥
इस पर पांडुकुमार । करेगा गंभीर विचार ।
इसका प्रभाव सुंदर । होगा श्रेष्ठ ॥ ४३ ॥
जाने दो अप्रासंगिक आलाप । अब न बोलूंगा ऐसा संक्षेप ।
जान तपस्वियोंमें है जो तप । वह रूप है मेरा ॥ ४४ ॥
बलियोंमें है जो बल । रहता है जो अचल ।
बुद्धिवंतोंमें केवल । बुद्धि है मैं ॥ ४५ ॥
भूतमात्रोंमें है जो काम । जिससे उत्कर्ष हो धर्म ।
मैं हूं कहता आत्माराम । जान निश्चल ॥ ४६ ॥
अन्यथा जो विकारोंके रूपमें । पडे इंद्रियानुकूल कर्ममें ।
किंतु धर्म-विरुद्ध पथमें । जाने नहीं देता ॥ ४७ ॥
शास्त्र निषिद्ध कर्मका जब कुपथ । तज चलता विहित कर्मका पथ ।
तब रहता नित मशालची साथ । धर्म-रूप ॥ ४८ ॥

बीज जो सब भूतोंमें वह हूं मैं सनातन ।
तेज मैं तेजस्वियोंमें बुद्धि मैं बुद्धिमानमें ॥ १० ॥
वैराग्य-युक्त निष्काम बल मैं बलवानका ।
धर्मसे अविरोधी मैं भूतोंकी काम-वासना ॥ ११ ॥
२०५ ज्ञान-विज्ञानयोग

ऐसा काम तेज देता चलता । जिससे होती धर्मकी पूर्णता ।
संसारमें मुक्ताफल भोगता । मोक्षतीर्थका वह ॥ ४९ ॥
तब श्रुति-गौरवके मांडवेपर । बढ़ाता काम सृष्टि-लताका अंकुर ।
सुकर्म फल सह पल्लव सुंदर । पहुंचते मोक्षतक ॥ ५० ॥
ऐसा जो काम है धर्म विहित । जिसमें सृष्टिका बीज निहित ।
वह हूं मैं कहता जगन्नाथ । अर्जुनसे ॥ ५१ ॥
कहना कितना भिन्न भिन्न । वस्तुमात्र मुझसे उत्पन्न ।
जिससे भरा है त्रिभुवन । जान तू पार्थ ॥ ५२ ॥
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्चये ।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२ ॥
जो हैं ये सात्विक भाव । या रज-तमादि सर्व ।
वे मम रूप संभव । जान तू यहां ॥ ५३ ॥
हुए ये यदि मुझसे ही । इसमें मैं रहता नहीं ।
स्वप्न कुंडमें डूबे नहीं । जागृति जैसी ॥ ५४ ॥
नहीं तो बीज होता ठोस । जैसे जमा हुआ ही रस ।
फूटके कौपल सरस । बनता काष्ठ ॥ ५५ ॥
फिर कहो उस काष्ठमें सभी । बीजपन रहता है क्या कभी ।
वैसा दीखता विकार कर भी । नहीं मैं विकारमें ॥ ५६ ॥
अथवा गगनमें घिरते बादल । उनमें न रहता गगन केवल ।
अथवा बादलमें होता है सलिल । जलमें नहीं अभ्र ॥ ५७ ॥
फिर उस जलके आवेशसे । दीखता लखलख तेज जैसे ।
किंतु उस तेजमें जल वैसे । रहता है क्या ॥ ५८ ॥
जैसे अग्निसे है धूम होता । धूममें क्या अग्नि है रहता ।
वैसे विकरके भी नहीं होता । विकृत मैं कभी ॥ ५९ ॥
मुझसे हैं बने भाव सत्व राजस तामस ।
इनमें न रहता मैं रहते मुझमें यही ॥ १२ ॥
ज्ञानेश्वरी २०६

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ १३ ॥
मुझसे निर्मित त्रिगुणोंने मुझे ढक दिया है—
जलसे हुई जलकुंभी जैसे । छिपा देती है सलिलको वैसे ।
झूठे ही घटोंके आवरणसे । छिपता आकाश ॥ ६० ॥
अजी ! स्वप्न यह मिथ्या सब । आप हुआ निद्रावश तब ।
आती उसकी प्रतीति जब । समरसता है क्या ॥ ६१ ॥
अजी ! पानी ही जो आंखका । रूप लेता जब झिल्लीका ।
देखना ही वह आंखका । मिटा देता ॥ ६२ ॥
ऐसी ही यह मेरी माया । बनी त्रिगुणात्मक छाया ।
उसने मुझे है छिपाया । आवरण बन ॥ ६३ ॥
प्राणिमात्र तभी मुझे नहीं जानते । मेरे होकर भी मद्रूप नहीं होते ।
जल होकर जलमें न गलते । मोति जैसे ॥ ६४ ॥
माटीसे बनाया हुआ जो मटका । तुरंत मिलानेसे होता मृत्तिका ।
किंतु आगमें जला हुआ मटका । रहता खपरा बन ॥ ६५ ॥
वैसे भूतमात्र सर्व । हैं मेरे ही अवयव ।
किंतु अविद्यासे .जीव । बने हैं जो ॥ ६६ ॥
तभी ये मेरे होकर भी मैं नहीं । मेरे होकर भी मुझे जानते नहीं ।
अहं ममताकी भ्रांतिमें ही यही । हुए विषयांध ॥ ६७ ॥
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४ ॥
अहं ममताकी भ्रांतिके कारण जन्ममरण-चक्र—मायानदी—

इन्हीं त्रिगुण भावोंने किया है विश्व मोहित ।
जिससे मैं नहीं ज्ञात गुणातीत सनातन ॥ १३ ॥
दैवी गुणमयी माया मेरी है अति दुस्तर ।
मेरी शरण जो आते इसको तरते वही ॥ १४ ॥
२०७ ज्ञान-विज्ञानयोग

महदादि है यह मेरी माया । उसे पार करके धनंजय ।
होना है मद्रूपमें जो विलय । किस भांतिसे ॥ ६८ ॥
टूटे कगारसे जो ब्रह्माचलके । उमंगसे मूल संकल्प जलके ।
उठे हैं बुल्ले पंचमहाभूतोंके । छोटेसे वहां ॥ ६९ ॥
सृष्टि विस्तारके जो ओघसे । काल-ग्रास शक्तिके वेगसे ।
प्रवृत्ति निवृत्तिके कूलसे । बहती उमड़कर ॥ ७० ॥
जो गुण-घनकी महा-वृष्टिसे । भरी है मोहके महा-पूरसे ।
काटकर ले जाती है वेगसे । यम नियम नगर ॥ ७१ ॥
भरी है जो द्वेषावर्त्तोसे । मत्सरादि बडे मोड़ोंसे ।
तथा भयानक मीनोंसे । प्रलोभनके ॥ ७२ ॥
चक्कर हैं उसमें प्रपंचके । महापूर आते कर्माकर्मके ।
ऊपर तरते सुख दुःखके । झाग-पुंज ॥ ७३ ॥
वहां द्वीप पर हैं रतीके । टकराते तरंग कामके ।
दीखते हैं जीव समूहके । झाग पुंज ॥ ७४ ॥
अंतः प्रवाह अहंकारके । उबाल आते मदत्रयके ।
उठे तरंग विषयोर्मिके । पुनः पुनः ॥ ७५ ॥
जहां रेलेसे उदयास्तके । गढे पड़ते जन्म मृत्युके ।
बुल्ले उसमें पंच भूतके । उठते औ' फूटते ॥ ७६ ॥
संमोह विभ्रम हैं मीन जिसके । निगलते कौर सात्विक धैर्यके ।
वक्र गतिसे चलते अज्ञानके । भंवर भी जहां ॥ ७७ ॥
जहां भ्रांतिके गंदले जलमें । फंसता जीव आशाके पंकमें ।
रजोगुणकी खलबलीमें । गूंजता स्वर्ग ॥ ७८ ॥
वहां है तमकी तीव्रधार । सत्वकी है स्थिर औ' गंभीर ।
यह तैरनेमें भयंकर । माया-नदी ॥ ७९ ॥
पुनर्जन्मके उत्तंग तरंग । छूते सत्य-लोकके गिरिश्रृंग ।
ढलती जिससे शिला भी संग । ब्रह्मलोककी ॥ ८० ॥
महानदीका यह पूर । वह जाता जो भयंकर ।
करे कौन इसको पार । धनंजय ॥ ८१ ॥
ज्ञानेश्वरी २०८

यहां है एक और आश्चर्य । करते हैं जो तरणोपाय ।
होता है वह सब अपाय । वह कैसा जान ॥ ८२ ॥
बुद्धि बाहूसे जो तरने गये । पता नहीं चला वे कहां गये ।
अभिमान डोहमें डूब गये । ज्ञानमानी जो ॥ ८३ ॥
लिया जिन्होंने वेदोंका आश्रय । साथ ही दिया मानको प्रश्रय ।
हुए वे मद-मीनमें ही लय । पूर्ण रूपसे ॥ ८४ ॥
जिसने किया तारुण्यका साथ । उसपे पड़ा मन्मथका हाथ ।
उसे विषय मगरके दांत । चबाते सदा ॥ ८५ ॥
फिर वृद्धावस्थाका जाल । मति-भ्रम कंप जंजाल ।
कसता जाता पल पल । चहूं ओरसे ॥ ८६ ॥
पटकता फिर शोक तीर पर । क्रोधावर्तमें नित उलझाकर ।
जब उठाते हैं उसमेंसे सिर । कोंचते विपद्गृध्र ॥ ८७ ॥
रुते फिर दुःख पंकमें । फंसे नित मृत्यु-पाशमें ।
गये जो काम आश्रयमें । गये व्यर्थ ही जो ॥ ८८ ॥
यज्ञ-क्रियाके साधनसे । लैस होकर तरनेसे ।
स्वर्ग-कंदरामें जा फंसे । यकायक ॥ ८९ ॥
मुक्ति-किनारा जो पाने गये । कर्म-बाहूंका आसरा लिये ।
चक्करमें ही उलझ गये । विधि-निषेधके ॥ ९० ॥
वहां वैराग्य नांव नहीं जाती । विवेकको थाह नहीं मिलती ।
योग-विद्या भी यदि काम आती । यदाकदा ही ॥ ९१ ॥
अपना बल लगाकर । माया-नदीको तैर कर ।
पार करनेका विचार । व्यर्थ ही है ॥ ९२ ॥
कुपथ्यशीलकी मिटे व्याधी । साधु जाने दुर्जनकी बुद्धि ।
अथवा लोभी त्यजे श्रीसिद्धि । हाथमें जो आयी ॥ ९३ ॥
अथवा दंड डरे चोरसे । कांटा निगला जावे मीनसे ।
तथा काय लडे भूतसे । वैसे ही पार्थ ॥ ९४ ॥
या जाल कुतरे मृग-छौना । चींटीका हिमगिरि लांगना ।
तभी है माया नदी तैरना । जीवसे साध्य ॥ ९५ ॥
२०९ ज्ञान-विज्ञानयोग
(27)

अजी ! सुन तू पांडुसुता । कामी न जीतता वनिता ।
वैसी मायामय सरिता । न तैरता जीव ॥ ९६ ॥
किंतु सरते सहज लीलासे । भजते मुझे जो सर्व भावसे ।
सूखा उनके इसी तीरसे । मायाका जल ॥ ९७ ॥
सद्गुरु मांझी उनके साथ । प्रतीतिका बल उनके हाथ ।
आत्म-निवेदनकी है सतेज । डांगी ही जो ॥ ९८ ॥
अहंभावका जो तजकर भार । विकल्प आंधीका झांका ढालकर ।
अनुराग जलावेगका उतार । लेकर टोह ॥ ९९ ॥
फिर लिया ऐक्यका आधार । उसे जोडा बोधका उतार ।
तब निवृत्तिका पैल-तीर । जीत लिया ॥ १०० ॥
उपरतिका चप्पू मारकर । सोऽहंभावका साम्य साधकर ।
फिर चले निवृत्ति तट पर । सहज भावसे ॥ १ ॥
इस उपायसे जो मेरे हुये । वे सब मेरी माया तर गये ।
ऐसे भक्त भी क्वचित ही भये । नहीं अधिक ॥ २ ॥
न मां दुष्कृतिनो मूढाःप्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ १५ ॥
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ १६ ॥
सभी अहंकारकी भूत-चेष्टामें आते हैं—
अन्य जन हैं जो अवांतर । अहंकारका भूत संचार ।
होनेसे विस्मृत निरंतर । आत्म-बोधसे ॥ ३ ॥
हीन मूढ दुराचारी मेग आश्रय छोड़के ।
भ्रात होकर मयासे पाते हैं भाव आसुरी ॥ १५ ॥
भक्त चार सदाचारी भजते मुझको नित ।
ज्ञानी तथैव जिज्ञासू अर्थार्थी पार्थ विव्हल ॥ १६ ॥
ज्ञानेश्वरी २१०

होता नियम-पटका विस्मरण । अधोगतिका रहता नहीं भान ।
किया जाता शास्त्र-निषिद्ध ही जान । अकार्य सब ॥ ४ ॥
क्यों किया शरीरका आश्रय । भूलकर ही मूल उद्देश्य ।
तदर्थ करणीय जो कार्य । छोडकर ॥ ५ ॥
इंद्रिय-ग्रामके चौराहेपर । अहं ममताके गप्पोंमें भर ।
विकारोंके समुदाय अपार । जुटाते रहते ॥ ६ ॥
दुःख-शोकके घावोंसे । प्रहारोंके विचारसे ।
बेभान माया-तमसे । ग्रस्त हैं जो ॥ ७ ॥
इसीलिये वे बिछुडे मुझसे । अन्य जो भजते चतुर्विधसे ।
उन्होंने आत्महित है जिससे । किया वृद्धिगत ॥ ८ ॥
चार प्रकारके मेरे भक्त ---
पहला आर्त कहलाता । दूसरा जिज्ञासू बनता ।
तीसरा अर्थार्थी है होता । चौथा है जो ज्ञानी ॥ ९ ॥
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७ ॥
दुःखी होनेसे भजता आर्त । जिज्ञासु भजता है ज्ञानार्थ ।
तीसरा है भजता अर्थार्थ । धनंजय ॥ ११० ॥
मत्प्रिय ज्ञानी भक्त—
अब बात चौथेकी रही । उसको करणीय नहीं ।
वही एक भक्त है सही । ज्ञानी है जो ॥ ११ ॥
होता है जो ज्ञानके प्रकाशसे । मुक्त सदा भेदाभेद तमसे ।
रहता मद्रूप-समरससे । तथा भक्त भी जो ॥ १२ ॥
श्रेष्ठ है सबमें ज्ञानी नित्य-युक्त अनन्य जो ।
उसे मैं प्रिय अत्यंत वह भी प्रिय है मुझे ॥ १७ ॥
२११ ज्ञान-विज्ञानयोग

जैसे सामान्य दृष्टिसे स्फटिक । आभास होता है मानो उदक ।
वैसा लगता ज्ञानी सकौतुक । नहीं है ज्ञानी ॥ १३ ॥
पवन जब गगनमें घुल जाता । उसका अस्तित्व भिन्न नहीं रहता ।
ज्ञानीका समरसमें विलय होता । रहता जैसे ॥ १४ ॥
हिलकर देखा पवन । दीखता गगनसे भिन्न ।
वैसे स्वभावसे गगन- । जैसे रहता ॥ १५ ॥
ज्ञानी वैसे काया-कर्मसे । दीखता उपासक जैसे ।
आंतरिक अनुभावसे । मद्रूप है जो ॥ १६ ॥
किंतु वह ज्ञानके प्रकाशसे । अनुभवता तत्वमसि ऐसे ।
मैं भी कहता तब आनंदसे । है वह “मम आत्मा” ॥ १७ ॥
जो जीव भाव परका बोध पाकर । करना जानता शुद्ध व्यवहार ।
पानेसे वह केवल भिन्न शरीर । मुझसे भिन्न है क्या ॥ १८ ॥
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥१८॥
ऐसे अपने स्वार्थके लोभसे । भक्त बनकर चिपकते मुझसे ।
किंतु मैं प्रेम करता जिनसे । वह है ज्ञानी मात्र ॥ १९ ॥
अजी ! दूध पय घृतकी जो आशा । उलझाती लोगोंसे गयको फांसा ।
किंतु उस पाशके बिन भी कैसा । दूध पाता है बछड़ा ॥ १२० ॥
क्यों कि वह तन मन प्राणसे । न जाने अन्य कुछ भी जिससे ।
जो सामनेसे दीखता है उसे । मानता माय मेरी ॥ २१ ॥
इस भांति जो हैं अनन्य गति । तभी करती है गाय भी प्रीति ।
इसलिये कहता लक्ष्मीपति । वह है यथार्थ ॥ २२ ॥
रहने दो फिर वे बोले । अब तुझसे हम बोले ।
वे तीन भक्त भी भले । भाते हैं मुझको ॥ २३ ॥
हैं ये उदार सारे ही ज्ञानी तो स्व-समान है ।
मुझमें स्थिर जो युक्त गति अंतिम जानके ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी २१२

किंतु जिसने मुझे जानकर । मुड़कर देखा नहीं संसार ।
सरिता सागरको प्राप्तकर । न मुड़ती जैसे ॥ २४ ॥
जिसके हृदय गह्वरमें उगम । अनुभव गंगाका मुझसे संगम ।
कैसे गायें फिर महिमा अनुपम । शब्दोंसे उसकी ॥ २५ ॥
अजी ! जो ज्ञानी कहलाता है । वह तो मेरा चैतन्य ही है ।
यह बात कहनेकी नहीं है । कहता हूं तुझसे ॥ २६ ॥
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ १९ ॥
ज्ञानी भक्तिका महान् अनुभाव—
वह तो घने वनमें विषयोंके । आया है आतंकसे काम-क्रोधके ।
पाकर छुटकारा सद्वासनाके । पहाड़पर ॥ २७ ॥
फिर वह साधु-संगसे धनुर्धर । विहित कर्म-पथ पर चलकर ।
निषिद्ध-प्रवृत्ति पथ छोड़कर । कर्म-मार्गसे ॥ २८ ॥
शत-जन्मोंका है प्रवास करता । फलाशाका जूता नहीं पहनता ।
फल-हेतुका लेख कौन लिखता । ऐसी स्थितिमें ॥ २९ ॥
शरीर संयोगकी रातमें ऐसे । सर्व-संग त्यागकी सिद्धतासे ।
दौडनमें पौ फटी अनायाससे । कर्मक्षयकी ॥ १३० ॥
फिर चमकी उषा गुरु-कृपाकी । खिल फैली स्वर्ण-किरण ज्ञानकी ।
वहां प्रतीति हुई साम्य-सिद्धिकी । अंतर दृष्टिमें ॥ ३१ ॥
जिस ओर देखो तब मैं हूं । एकांत लोकांतमें मैं ही हूं ।
सदा सर्वत्र मैं एक ही हूं । मैं ही उसका ॥ ३२ ॥
उसके लिये सदा सर्वत्र कहीं । मैं छोड़कर अन्य कुछ भी नहीं ।
तलावमें डूबी गगरीको कहीं । जैसे जल सर्वत्र ॥ ३३ ॥
होता है वह मेरे भीतर । उसको मैं बाहर भीतर ।
इसको शब्दोंमें गूंथकर । कहा नहीं जाता ॥ ३४ ॥
अनेक जन्मके पीछे पायो हैं शरणागति ।
विश्व देखें वासुदेव संत है अति दुर्लभ ॥ १९ ॥
२१३ ज्ञान-विज्ञानयोग

ऐसा होता वह ज्ञान-सागर । जिससे सदा बाहर भीतर ।
देखता आत्म-रूप निरंतर । विश्वमें आप ॥ ३५ ॥
यह समस्त है श्रीवासुदेव । प्रतीति रससे ढला है भाव ।
इसीलिये भक्तमें वह राव । तथा ज्ञानियोंमें भी ॥ ३६ ॥
उसका अनुभव भंडार । भरता है जंगम स्थावर ।
ऐसा महात्मा हे धनुर्धर । दुर्लभ मिलना ॥ ३७ ॥
नाशवंत वस्तुओंकी इच्छासे आराधना करनेवाले अनेक—
ऐसे बहुत आते हैं अर्जुन । करते हैं जो भोगार्थ भजन ।
आशा तमसे जिनके नयन । हुए अति-मंद ॥ ३८ ॥
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताःस्वया ॥ २० ॥
होती जब फलकी तीव्र आस । हृदयमें होता काम प्रवेश ।
बुझाता है उसका सहवास । ज्ञान-दीपको ॥ ३९ ॥
पडनेसे ऐसा उभय अंधार । समीपस्थ मुझको वे भुलाकर ।
होते हैं सर्व भावसे अनुचर । देवताओंके ॥ १४० ॥
पहलेसे जो दास है प्रकृतिके । उसीमें वश है भोग लालसाके ।
लोलुपतासे रचते हैं पूजाके । महोत्सव ॥ ४१ ॥
क्या है उसकी नियम-बुद्धि । कैसी है उपचार-समृद्धि ।
अर्पण करते हैं यथाविधि । विहित रूपसे ॥ ४२ ॥
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१ ॥
भ्रांत जो कामना ग्रस्त पूजते अन्य दैवत ।
स्वभाव वश अज्ञानी उनके ही विधानसे ॥ २० ॥
पूजना चाहते जैसे श्रद्धासे जिस रूपको ।
जैसी है जिसकी श्रद्धा करता स्थिर मैं स्वयं ॥ २१ ॥
ज्ञानेश्वरी २१४

किंतु जो है अन्य देवता । भजनेकी चाह करता ।
इच्छा पूर्तिमें ही करता । उनकी भी ॥ ४३ ॥
देव-देवीमें मैं ही रहता । यह भी वह नहीं जानता ।
सबमें वह भाव धरता । भिन्न भिन्न ॥ ४४ ॥
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥ २२ ॥
फिर है वह श्रद्धायुक्त । आराधनामें जो उचित ।
सिद्धि तक सब समस्त । करता रहता है ॥ ४५ ॥
जैसा है जिसका भाव । वैसा फल देता देव ।
मिलता वह सदैव । मेरे ही कारण ॥ ४६ ॥
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजोयान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३ ॥
अन्य देवताओं द्वारा पाये गये भोग नाशवंत होते हैं
किंतु भक्त वे मुझे नहीं जानते । कल्पनाके बाहर नहीं पड़ते
इसीलिये कल्पित फल हैं पाते । नाशवंत जो ॥ ४७ ॥
अजी ! ऐसा जो यह भजन । वह है संसारका ही साधन ।
यहां फल भोगका ही स्वप्न । दीखे क्षणभर ॥ ४८ ॥
फिर जो भाता है दैवत । जिसका यजन सतत ।
होता है वही जिसे प्राप्त । धनंजय ॥ ४९ ॥
यहां जिसके तनमन प्राण । करता सतत मेरा स्मरण ।
होता है जब उसका निर्वाण । पाता मद्रूप ॥ १५० ॥
उसी श्रद्धा-शक्तिसे तो पूजते उस रूपको ।
मांगे जो उससे भोग पाते मेरे विधानसे ॥ २२ ॥
नाशवंत फल पाते जन जो अल्प बुद्धिके ।
देवोंके भक्त देवोंको मेरे जो मुझसे मिले ॥ २३ ॥
२१५ ज्ञान-विज्ञानयोग

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ २४ ॥
किंतु ऐसा न करके प्राणिजात । व्यर्थ ही खोता है जो अपना हित ।
मानो तैरते हैं जलमें सतत । हथेलीके ही ॥ ५१ ॥
या अमृतकुंडमें डूबकर । होठोंको दृढतासे दबाकर ।
स्मरण करता है निरंतर । डबरेका पानी ॥ ५२ ॥
किसलिये यह ऐसा करना । अमृतमें डूबकर मरना ।
सुखसे अमर क्यों नहीं होना । अमृतमें ही ॥ ५३ ॥
फलशाका पिंजडा तजकर । अनुभव पंखसे धनुर्धर ।
क्यों न करें चिदंबर संचार । समर्थ भावसे ॥ ५४ ॥
चिदाकाशमें ऊंचाई पर । करें सुखसे उन्मुक्त संचार ।
उसका है अनंत विस्तार । अपनाही ॥ ५५ ॥
असीम पर क्यों सीमाका नियमन । मुक्त निराकारको आकार बंधन ।
स्वयंसिद्धका करना क्यों बलिदान । साधन पर ॥ ५६ ॥
किंतु मेरा यह कथन । विचारान्तमें भी अर्जुन ।
न करेगा जीवोंका मन । इसका स्वीकार ॥ ५७ ॥
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोऽयं नामिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ २५ ॥
मैं सर्वव्यापी हूं किंतु --
क्यों कि योगमायाके परदेसे । अंधत्व आनेके कारणसे ।
न देखता प्रकाश बलसे । मुझको कभी ॥ ५८ ॥
पूजते व्यक्त हो रूप बुद्धि-हीन न जानके ।
अव्यक्त श्रेष्ठ जो रूप मेरा अंतिम शाश्वत ॥ २४ ॥
घिरा मैं योग मायासे न हूं प्रकट विश्वसे ।
अजन्मा नित्य मैं ऐसा न जाने मूढ लोग जो ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी २१६

ऐसा देखे तो मैं नहीं । ऐसी वस्तु नहीं कहीं ।
जैसा पानी होता नहीं । रसके बिना ॥ ५९ ॥
पवन किसको नहीं छूता । आकाश कहां नहीं रहता ।
वैसी ही सर्वत्र व्यापकता । एक मात्र मेरी ॥ ६० ॥
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६ ॥
अतीतमें जितने भूत । मैं ही वे जान तू सतत ।
आज हैं विश्वमें जो पार्थ । वे भी मैं हूं ॥ ६१ ॥
भविष्यमें होंगे जितने ही । अलग मुझसे वे भी नहीं ।
यह बात है कहनेकी ही । वैसा न होता कछु ॥ ६२ ॥
अजी ! रज्जूके भुजंगको जैसे । काल पीला न कह सके ऐसे ।
भूतमात्र सब मिथ्यापनसे । हैं अनिश्चित ॥ ६३ ॥
सदा मैं सुन पांडुसुत । होने पर भी अखंडित ।
संसार ग्रस्त सब भूत । अन्य प्रकारसे ॥ ६४ ॥
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परंतप ॥ २७ ॥
कहता हूं इसका कारण । अब तू ध्यान देकर सुन ।
अहंकार-तनका वरण । हुआ तब ॥ ६५ ॥
जन्म हुआ कुमारीका । आया उसे यौवन कामका ।
हुआ द्वेषसे ब्याह उसका । सुनो तब ॥ ६६ ॥
आपत्य हुआ उन दोनोंके । द्वंद्व मोह नाम हैं उनके ।
बड़े वह प्यारमें दादाके । जो था अहंकार ॥ ६७ ॥
हुये जो और जो होंगे भूत हैं आज जो यहां ।
सबको जानता हूं मैं मुझे कोयी न जानते ॥ २६ ॥
राग औ' द्वेषसे उठे चित्तमें मोह-द्वंद्व जो ।
जगतके सभी प्राणि घिरे हैं इससे यहां ॥ २७ ॥
२१७ ज्ञान-विज्ञानयोग
(28)

धृतिका जो प्रतिकूल रहता । आशा-रससे परिपुष्ट होता ।
नियमका अनादर करता । द्वंद्व-मोह ॥ ६८ ॥
असंतुष्टताकी मदिरा । मत्त होकर धनुर्धर ।
विकार स्त्री-सह संसार । करता विषयोंमें ॥ ६९ ॥
जिससे भाव-शुद्धिकी राह पर । फैलाये विकल्पके कांटे अपार ।
खुल जाते सब कुपथ दो चार । अप्रवृत्तिके ॥ ७० ॥
इसने प्राणि गड़बड़ाये । संसार खडियामें फंसाये ।
फिर डंडुकेसे पिटवाये । महा-दुःखके ॥ ७१ ॥
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ २८ ॥
भाव-शुद्धिकी राह पर । विकल्प-शूल देखकर ।
नहीं आते जो लौट कर । बुद्धि-भ्रमसे ॥ ७२ ॥
थोडेसे जो मद्रूप होते हैं उनको अंतकालमें दुःख नहीं होता--
पगसे ही एक-निष्ठाके । शूलांकुरोंको विकल्पके ।
रौंध छोडे महा-पापके । वन-प्रांत ॥ ७३ ॥
सत्कर्मकी फिर दौड़-लगायी । मेरे सामिप्यकी मंजिल पायी ।
महा-विपत्तिसे जान बचायी । बटमारोंके ॥ ७४ ॥
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २९ ॥
सहज ही सोचने पर पार्थ । जन्म मरणकी मिटती कथा ।
इस भांतिके प्रयत्नोंमें आस्था । उत्पन्न होती ॥ ७५ ॥
गँवाये जिसने पाप अपने पुण्य कर्मसे ।
दृढतासे भजते वे द्वंद्व मोह हटाकर ॥ २८ ॥
जुटे मेरे सहारे जो जीतते जन्म मृत्युको ।
जानते ब्रह्म वे पूर्ण तथा अध्यात्म-कर्म भी ॥ २९ ॥
ज्ञानेश्वरी ३१८

उनका वह यत्न ही एक काल । देता समय पर-ब्रह्मका फल ।
पक्वतामें चूता रस पल पल । तब पूर्णताका ॥ ७६ ॥
कृतार्थतासे विश्व जब भरता । मिटती है अध्यात्मकी अपूर्णता ।
तथा कर्मका काम नहीं रहता । होता मन विलय ॥ ७७ ॥
उसकी ऐसा अध्यात्म लाभ । होता है सुन पुरुषर्षभ ।
उसका पूंजी हूं मैं सुलभ । इस उद्यममें ॥ ७८ ॥
साम्यके वृद्धिसे उसके । संधते व्यापार उसके ।
वहां दारिद्र्य जो द्वैतके । रहता नहीं ॥ ७९ ॥
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥ ३० ॥
सब अधिभूत मुझको । प्रतीतिसे अधिदैवको ।
जिन्होंने जाना यथार्थको । धनंजय ॥ १८० ॥
अनुभवके ज्ञान बलसे । जानता मैं अधियज्ञ इसे ।
वह शरीरके वियोगसे । अकुलाता नहीं ॥ ८१ ॥
अन्यथा आयुष्य सूत्र जब टूटता । प्राणियोंका तब हृदय तड़पता ।
सजीवके चितमें भी युगांत आता । देखकर यह ॥ ८२ ॥
किंतु यह नहीं जाने कैसा । ज्ञानियोंका नहीं होता ऐसा ।
अंतकालमें भी वह सहसा । मुझे भूलते नहीं ॥ ८३ ॥
अन्यथा तू यह जान । ऐसे जो महा-निपुण ।
औ' युक्त अंतःकरण । योगी हैं वही ॥ ८४ ॥
सातवे अध्यायका ज्ञानेश्वर कृत उपसंहार और आठवेकी भूमिका—
तब यह शब्द कूपका तल । न पहुंचा पार्थ कर-कमल ।
पल एक पार्थ था उस काल । पिछडा हुआ ॥ ८५ ॥
अधिभूताधि दैवोंमें मुझे जो अधि-यज्ञमें ।
प्रयाण-कालमें भी जो जानते रह सावध ॥ ३० ॥
२१९ ज्ञान-विज्ञानयोग

जहां तद्ब्रह्मवाक्फल । जो ज्ञानार्थसे रसाल ।
साभिप्राय परिमल । भावोंके हैं ॥ ८६ ॥
जो सहज कृपामंदानिल । कृष्णाद्रुमका वचन-फल ।
लाया अर्जुन श्रवण-तल । अकस्मात ॥ ८७ ॥
जो ये तत्व सिद्धांतसे बनाये । ब्रह्म-रस सागरमें हैं डुबोये ।
फिर वैसे ही ये जो पगाये । परमानंदमें ॥ ८८ ॥
उसके निर्मल सौंदर्यसे । ज्ञान-उन्मेशकी वासनासे ।
चूने लगा पार्थकी जिव्हासे । विस्मयामृत ॥ ८९ ॥
लाभसे उस सुख-संपत्तिके । सुरसुराहटसे हृदयके ।
व्यंग दिखाकर स्वर्ग-सुखके । हंसने लगा ॥ २९० ॥
फलका बाह्य सलोनापन । अनुभव करके अर्जुन ।
रस-स्वादमें रसना मन । खो बैठा सहज ॥ ९१ ॥
उठाकर वह वाक्फल । अनुमानका करतल ।
प्रतीति-मुखमें तत्काल । भरने लगा ॥ ९२ ॥
किंतु विचार मुखमें न समाता । हेतुका दांत नहीं काट सकता ।
इसलिये पार्थ मुख न लगाता । उस फलको ॥ ९३ ॥
कहता तब अर्जुन हो चमत्कृत । तारागण ये जलमें प्रति-बिंबित ।
ऐसे हैं तेरे ये वाक्फल सुशोभित । इसमें मैं उलझा ॥ ९४ ॥
नहीं ये तेरे साधारण शब्द । है अनुभव-गगन विषद ।
थाह न पाती बुद्धि भाव-पद । डूब जाती है ॥ ९५ ॥
मनमें जान यह गोष्ट । कृपार्थ पुनः किरीटी ।
पुनरपि घुमाता दृष्टि । कृष्ण चरणमें ॥ ९६ ॥
विनय करता अर्जुन । ये सात ही पद नवीन ।
ग्रहण न करते कान । आश्चर्यकारक ॥ ९७ ॥
श्रवण करके ही ये केवल । इनके प्रमेयोंका जो है जाल ।
करेगा मन इन्हें करतल । ऐसे लगा था ॥ ९८ ॥
ऐसा नहीं यह निश्चय । देख अक्षर समुदाय ।
है साश्चर्य-जीव आश्चर्य । देव मेरा ॥ ९९ ॥
ज्ञानेश्वरी २२०

कानोंके इन गवाक्षोंसे । शब्द-किरण प्रवेशसे ।
मन हुआ चमत्कृतिसे । चकित मेरा ॥ २०० ॥
चाहता मैं भावको जानना । कहनमें समयको खोना ।
कष्ट कर प्रभु निरूपण । कर तू सत्वर ॥ १ ॥
पीछेका कर अवलोकन । अगले पर रख नयन ।
स्व-इच्छाका भी कर दर्शन । पूछना चतुराइसे ॥ २ ॥
देख अर्जुनका चतुरपन । न कर मर्यादाका उल्लंघन ।
करता हृदयका आलिंगन । श्रीकृष्णके ॥ ३ ॥
कैसे पूछना है प्रश्न । रखकर अवधान ।
जानता यह अर्जुन । भली भांति ॥ ४ ॥
अर्जुनका है ऐसा पूछना । श्रीकृष्णका भाव समझाना ।
संजयको भाये ये वचन । कहेगा वह प्रेमसे ॥ ५ ॥
सुनो उस संवादको दे ध्यान । करूंगा देश भाषामें कथन ।
कानसे आगे करके नयन । जानेंगे वह ॥ ६ ॥
बुद्धि-जिव्हासे चखनेसे पूर्व अक्षर । देखकर नयन उनका अलंकार ।
अनुभवेंगे इंद्रिय अपरंपार । सुख संतोषको ॥ ७ ॥
जैसे मालतीका फूल । घ्राणसे है परिमल ।
लेनेसे पूर्व कोमल । सुख लेते नयन ॥ ८ ॥
वैसे है देशीका जो सौंदर्य । करायेगा इंद्रियसे राज्य ।
फिर करेगा वह प्रमेय- । सुधा-पान ॥ ९ ॥
जहां होती है वाचा मौन । वह करूंगा मैं कथन ।
यह ज्ञानदेव-वचन । जो हैं निवृत्ति-दास ॥ २१० ॥
गीता श्लोक ३०
ज्ञानेश्वरी ओवी २१०.

८
सातत्ययोग
अर्जुन उवाच
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ १ ॥
अर्जुनके सात प्रश्न --
फिर कहा अर्जुनने । जी सुनलिया मैंने ।
अब जो पूछा मैने । कहो वह ॥ १ ॥
कहो क्या है वह ब्रह्म । किसका नाम है कर्म ।
अथवा क्या है अध्यात्म । कहो मुझे ॥ २ ॥
प्रभो ! अधिभूत यह है कैसे । औ' अधिदैवत कहते किसे ।
यह सुनाओ प्रकट रूपसे । जो मैं समझूं ॥ ३ ॥
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ २ ॥
प्रभो अधियज्ञ क्या है । इस देहमें कौन है ।
समझमें न आता है । अनुमानके भी ॥ ४ ॥
अर्जुनने कहा
किसको कहते ब्रह्म तथा अध्यात्म-कर्म क्या ।
अधिभूत कहो क्या है तथा क्या अधिदैव भी ॥ १ ॥
अधियज्ञ यहां कौन कैसा है इस देहमें ।
कैसे प्रयाणमें योगी निग्रही जानते तुझे ॥ २ ॥