ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 277त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ १३ ॥
मुझसे निर्मित त्रिगुणोंने मुझे ढक दिया है—
जलसे हुई जलकुंभी जैसे । छिपा देती है सलिलको वैसे ।
झूठे ही घटोंके आवरणसे । छिपता आकाश ॥ ६० ॥
अजी ! स्वप्न यह मिथ्या सब । आप हुआ निद्रावश तब ।
आती उसकी प्रतीति जब । समरसता है क्या ॥ ६१ ॥
अजी ! पानी ही जो आंखका । रूप लेता जब झिल्लीका ।
देखना ही वह आंखका । मिटा देता ॥ ६२ ॥
ऐसी ही यह मेरी माया । बनी त्रिगुणात्मक छाया ।
उसने मुझे है छिपाया । आवरण बन ॥ ६३ ॥
प्राणिमात्र तभी मुझे नहीं जानते । मेरे होकर भी मद्रूप नहीं होते ।
जल होकर जलमें न गलते । मोति जैसे ॥ ६४ ॥
माटीसे बनाया हुआ जो मटका । तुरंत मिलानेसे होता मृत्तिका ।
किंतु आगमें जला हुआ मटका । रहता खपरा बन ॥ ६५ ॥
वैसे भूतमात्र सर्व । हैं मेरे ही अवयव ।
किंतु अविद्यासे .जीव । बने हैं जो ॥ ६६ ॥
तभी ये मेरे होकर भी मैं नहीं । मेरे होकर भी मुझे जानते नहीं ।
अहं ममताकी भ्रांतिमें ही यही । हुए विषयांध ॥ ६७ ॥
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४ ॥
अहं ममताकी भ्रांतिके कारण जन्ममरण-चक्र—मायानदी—
इन्हीं त्रिगुण भावोंने किया है विश्व मोहित ।
जिससे मैं नहीं ज्ञात गुणातीत सनातन ॥ १३ ॥
दैवी गुणमयी माया मेरी है अति दुस्तर ।
मेरी शरण जो आते इसको तरते वही ॥ १४ ॥
२०७ ज्ञान-विज्ञानयोग