ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहदादि है यह मेरी माया । उसे पार करके धनंजय ।
होना है मद्रूपमें जो विलय । किस भांतिसे ॥ ६८ ॥
टूटे कगारसे जो ब्रह्माचलके । उमंगसे मूल संकल्प जलके ।
उठे हैं बुल्ले पंचमहाभूतोंके । छोटेसे वहां ॥ ६९ ॥
सृष्टि विस्तारके जो ओघसे । काल-ग्रास शक्तिके वेगसे ।
प्रवृत्ति निवृत्तिके कूलसे । बहती उमड़कर ॥ ७० ॥
जो गुण-घनकी महा-वृष्टिसे । भरी है मोहके महा-पूरसे ।
काटकर ले जाती है वेगसे । यम नियम नगर ॥ ७१ ॥
भरी है जो द्वेषावर्त्तोसे । मत्सरादि बडे मोड़ोंसे ।
तथा भयानक मीनोंसे । प्रलोभनके ॥ ७२ ॥
चक्कर हैं उसमें प्रपंचके । महापूर आते कर्माकर्मके ।
ऊपर तरते सुख दुःखके । झाग-पुंज ॥ ७३ ॥
वहां द्वीप पर हैं रतीके । टकराते तरंग कामके ।
दीखते हैं जीव समूहके । झाग पुंज ॥ ७४ ॥
अंतः प्रवाह अहंकारके । उबाल आते मदत्रयके ।
उठे तरंग विषयोर्मिके । पुनः पुनः ॥ ७५ ॥
जहां रेलेसे उदयास्तके । गढे पड़ते जन्म मृत्युके ।
बुल्ले उसमें पंच भूतके । उठते औ' फूटते ॥ ७६ ॥
संमोह विभ्रम हैं मीन जिसके । निगलते कौर सात्विक धैर्यके ।
वक्र गतिसे चलते अज्ञानके । भंवर भी जहां ॥ ७७ ॥
जहां भ्रांतिके गंदले जलमें । फंसता जीव आशाके पंकमें ।
रजोगुणकी खलबलीमें । गूंजता स्वर्ग ॥ ७८ ॥
वहां है तमकी तीव्रधार । सत्वकी है स्थिर औ' गंभीर ।
यह तैरनेमें भयंकर । माया-नदी ॥ ७९ ॥
पुनर्जन्मके उत्तंग तरंग । छूते सत्य-लोकके गिरिश्रृंग ।
ढलती जिससे शिला भी संग । ब्रह्मलोककी ॥ ८० ॥
महानदीका यह पूर । वह जाता जो भयंकर ।
करे कौन इसको पार । धनंजय ॥ ८१ ॥
ज्ञानेश्वरी २०८